खिड़की

दिसंबर, 2025

renu shrivastav
रेनू श्रीवास्‍तव
शहडोल, जिला— शहडोल मध्य प्रदेश

(लेखिका परिचय: ‘यक्ष प्रश्न’ और ’खुले द्वार अब कहाँ’ नामक दो कहानी संग्रह, बारह साझा संग्रह सहित पत्र-पत्रिकाओं में अनवरत लेखन।)

कितनी अहमियत हैं उसके जीवन में खिड़की की ये किसी को कैसे समझाये? जब आज उसने हॉस्पिटल में खिड़कियों के पास वाले बेड की जिद पकड़ी तो हाय तौबा मच गई।
उसके लाडले और आज्ञाकारी बेटे ने बड़े दुलार से बालों को सहलाते हुये समझाया था- ‘मम्मी अभी आप यहाँ रहो जैसे ही बेड खाली होगा आपको शिफ्ट कर देगें।’
वो शिफ्ट तो कर दी गई पर एक पिंजरे में कैसी घुटन थी! उस पंलग के चारो तरफ पर्दे को स्प्रिंग से साधता पूरा पार्टीशन, बेड, एक ट्राली एक टेबल। उफ! उसे घुटन हो रही थी। सांस लेते नही बन रही थी। उसे बेड पर लिटाकर सब इधर-उधर होते रहे। उसने ढूँढने वाली नजर डाली, तो नर्स ने पूछा लिया- ‘कुछ चाहिये?’ ‘मेरा बेटा’ ‘हाँ माँ क्या हुआँ?’
‘मेरा बेड बदलवा दे’
‘हाँ जैसे खाली होगा करवा देगें’ कहकर बेटे ने आश्वस्त किया। दिन-से-रात हो गई, डियूटी वाली नर्से बदल गईं। जाने कितने इंजेक्शन उसकी त्वचा से नीचे नसों में सनसनी फैलाते, उसके पूरे वजूद पर तारी होते रहे। पर पंलग न बदला। शिथिल पड़े शरीर पर जाने कितने दर्द उभर आय थें। पैर के तलवो से लेकर सिर की नसों तक दर्द ही दर्द उफ्… वो मर क्यों नही रही?
कौन सी जिजिविषा है जो उसकी सांसों की डोर बांधें है?
किससे पूछे क्या पूछे? बस एक अनर्गल प्रार्थना! स्वर हीन, भावपूर्ण पूरी शिद्धत से की गई याचना ‘‘मृत्यु दो सर्वशक्तिमान निबार दो, इस शरीर के बन्धन से, मेरे जीवन में एक भी अच्छा कर्म किया तो उसके बदले उबार दो प्रभु! बस तार दो। कौन सी वह शुभ घड़ी होगी, जब उसकी आँखे नहीं खुलेगी, उसकी जर्जर, बीमार, क्लांत देह का अन्त होगा। आँख खुलने पर चारो तरफ वहीं सब – टेबल, दवायें, पलंग, जेलको की चुभन, ड्रिप से नसों में समाता जीवन दृव्य, पोर-पोर से उठती दर्द की अलग-अलग किस्म की चीखें, जिन्हें वो बामुश्किल दबाती। उफ्… अभी भी नही मरी! एक बेचारगी फिर जीवन का श्राप अपनी असमर्थता और दैव की निष्ठुरता पर दो बूंद बेचारगी के आंसू टपक पड़े! नर्स शायद इंजेक्शन दे रही की उसके हाथ में ऑसू की गर्म बूदें गयी। उसने पलकें उठा कर पूछा ‘‘कुछ चाहिये?’’
‘‘मेरा बेटा’’ थोड़ी देर में बेटे ने उसके बालो में हाथ फेरा ‘क्या है माँ’- वो कहना कुछ और चाह रही थी पर जुबान और दिमाग दोनों काम नहीं कर रहे थे… कुछ शब्द यूं ही, फिसल गये ‘‘खिड़की’’। ‘माँ… आप भी ना! कभी-कभी हद कर देती हो। बेड खाली होते ही वहाँ शिफ्ट कर देगें। एकदम ही जिद पकड़ लेती हो! ये अपना घर तो नही है ना। जहाँ हर बात आपकी इच्छानुसार होगी।’ बेटे का खीजा स्वर! शायद वो सो रहा होगा, जब उसे नर्स ने उठाया होगा। उसका खीजना स्वाभाविक है।
एक यही तो है जो उसे ढ़ो रहा है। उसके देह की तकलीफ के साथ, अन्दर कितनी शर्मिन्दा होती है यूं। वो जब घर से निकलते एम्बुलेंस के स्ट्रेचर से शिफ्ट होते वक्त बहू पोते-पोतियों के चेहरे पर आश्वस्त वाले भाव देखती, तो हर बार अपनी मृत्यु की निरन्तर प्रार्थना करती रहती है। जब तक होश रहता, कहती ‘प्रभु इस बार उन लोगों की कामना फलीभूत करो हे परमपिता अब न लौटाना….! अब और त्रास न दूँ किसी को।’ पर हमेशा ढीठ शैतान बच्चे की तरह वापस घर आती। उदासीन उपेक्षित कमरा, जहाँ पर आना सबके लिये एक सजा सा होता होगा। ऐसा उसका अनुमान था। बस बेटा ही उसके कमरे, उसकी चीजों से परेहज नहीं करता था। ऑफिस से आकर उसके पंलग में बैठकर उसे सहलाता’ – ‘कैसी हो? क्या चाहिये बताओ’
वे झिझकती सोचती कह दे ‘मौत!’ पर बेटा दुःखी होगा सोचकर चुप रहती। बस जबरन होंठों को फैलाकर एक मुस्कान परोसती ‘कुछ नहीं।’ पर जब आज उसने खिड़की की मांग करी तो बेटा खीज से भर गया। उसे पता था जब वो अपनी पत्नी को ये बतायगे तो वो कैसे तमग कर बोलेगी – ‘मम्मी तो शुरू से ऐसी ही जिद्दी है, आप ही हो जो उनकी हर ज़िद पूरी कर रहे वर्ना!’’ उसे घुटन हो रही थी। मध्यम प्रकाश में ही दूधिया रोशनी में दिन-रात का ज्ञान ही नहीं हो रहा था। तभी तो वो खिड़की वाला बेड चाह रही थी। जहाँ से वो परदे हटा कर समय मौसम सब का अनुमान लगा लेती। खिड़की से आती रोशनी और हवा उसके लिये अनिवार्य है। उस ऑक्सीजन मास्क और टप-टप, बूंद-बूंद नसों में जीवन देते ग्लूकोज और दवाओं से बहुत ज्यादा। पर किसी से कहने सुनने की समार्थ्य शेष नहीं थी। ये हॉस्पिटल उसका चिर परिचित था। साफ-सुथरा, शान्त, घर के भी नजदीक सभीं को आने-जाने की सुविधा थी। पहली बार लगभग 6 साल पहले जब वो सीने के तेज दर्द और माथे पे चुहचुहाती पसीने की बूदों के साथ यहाँ दाखिल हुई थी तो लगभग अचेत थी। पर जब होश आया, तो चारों तरफ नलियों से आच्छांदित उसका शरीर एकदम निर्जीव हो रहा था। बस आँखे खुली थीं। सामने एक स्वस्थ, खूब गठे बदन की औरत मुस्तैद थी। उसे आँखें खोलते देख हॉले से मुस्कुराई थी- ‘‘कैसी हैं अम्मा’’? उसने अच्छी की मुद्रा मे सिर हिलाया। उस दवाइयों की खुशबू से भरे वातावरण मे तैरती मनहुसियत उसके मुस्कान से पस्त हो रही थी। सारी शक्ति जुटा कर अपने परिवार के विषय में पूछा था। ‘‘सब आते ही होगें मैं फोन करती हूँ।’’ उसने मुस्कुरा कर बोला था।
धक्….! से कुछ हुआ! सब मुझे अकेला छोड़कर गये। पर ज्यादा सोचने की शक्ति नहीं थी। नशा था दवाओ का, या कमजोरी, आँखें खुल ही नहीं रही थी। जब बेटे की आवाज कान में आई तो वो भारी पलकों से अच्छे का इशारा, बेटे ने बोला सिर पर हाथ फेरा ‘‘तुम जल्दी अच्छी हो जाओगी और मेर साथ रहोगी।’’
‘सब कहाँ है?’ – बहुत मेहनत से शक्ति जुटा कर पूछ पाई थी।
‘सब थोड़ी देर में आयेगें। माँ आप 5 दिनों से हॉस्पिटल में हो, मैं कल घर गया था। ये शकुन है, आपकी देख-भाल के लिये रखा है।’
‘‘हाँ’’ उसने स्वीकारोक्ति में सिर हिलाया। बहू पोता- पोती सब आये पर सिर्फ औपचारिकता उसने महसूस किया कि उसको इस तरह जिंदा बचने की किसी को भी खुशी नहीं है! वो भी अस्पताल में ज्यादा खुश थी।
जब सुबह-सुबह शकुन ने बड़ी सी खिड़की के परदे सरकाकर उसे धूप दिखाई तो उसकी आँखें चौधियाँ गई थी। आहा… कितनी स्वच्छ निर्मल, मासूम सी धूप, हल्की नरम सी, प्रेम से गलबहियाँ देती, किसी पुरानी सहेली की तरह जब उससें लिपटी तो वो एकदम तरोताजा हो गई। एकदम बच्ची की तरह हुलस कर बोली- कितनी सुन्दर खिड़की है – कितनी प्यारी धूप। ‘हाँ मॉं आप उठो मुँह हाथ धुलाकर आपको चाय पिलाऊंगी।’
वे एकदम चट्-पट् उठ गई थी। फिर उस खिड़की और शकुन दोनों ने उसे दोबारा जीवनदान दिया – व्यर्थ का दान अनावश्यक – अनुपयोगी।
उस खिड़की से बाहर दूर-दूर तक खेत दिखते थे। खेत के बीच में घर, बगल से कुछ हरे नन्हें पौधों? कुछ हिस्सा सड़क का भी दिखता, चौडी़ सपाट चिकनी सड़क। आदमियों, गाड़ियों, से भरी निर्जीव सड़क। जीवन्तता से भरा लहलहाता खेत। शायद उन दिनो धान की फसल खेत में पानी से तर लहलहाते हरे नन्हे पौधे। उसे लगता वो दौड़कर जाये उस हरे नन्हे पौधे को दुलारे। उस कच्चे मिट्टी से भरे खेत में नंगे पैर दौड़ जाये। कभी-कभी कितनी छोटी बातें कितने बडे स्वप्न का आकार ले लेती है। कितना आसान होता है किसी के लिये यूं कही भी चले जाना। पर उसके लिये आज मिट्टी पानी का स्पर्श सपना हो गया।
पंलग पर तो बिना सहारे के साथ बैठ नहीं सकती, खेत…?
शकुन ने जब खिड़की के परदे बन्द करने चाहे तो उसने रोक दिया ‘‘रहने दो मुझे खुली खिड़कियाँ पसंद हैं’’
अस्पताल प्रवास काल उसे वरदान सा लगा था। सिर्फ उस खिड़की और शकुन के कारण।
उसे खिड़कियों से लगाव बचपन से था, उसके अपने घर में थी, जो कालांतर में मायके में तब्दील हो गया। उसके कमरे में बड़ी सी खिड़की थी। संकरी गली के किनारे पर खुलती, लोहे की मजबूत सलाखों वाली, पुरानी लकड़ी के मोटे-मोटे पल्लों वाली प्यारी सी खिड़की, उसकी जान से प्यारी खिड़की….।
उस खिड़की से उचक-उचक कर उसने फेरीवालो के ठेले, साइकलों पर फेरी वालों को रोकने के न जाने कितने सफल-असफल प्रयास किये थे। सबकी मनुहारो, मांग पर खिड़की की सलाखों को पकड़कर जोर से चीखती ‘‘ऐ…..भाईया रूको…हम लोग आ रहे है’।’
समय के साथ गुजरे बचपन और किशोरवय के कितने प्यारे-प्यारे मीठे-मीठे सपने उसी खिड़की के संरक्षण में देखें।
उचक कर स्टूल सरकाकर, किवाड़ बंद करते-करते सहजता से पल्ले बन्द करने से लेकर हर जीवन के क्षण में वो खिड़की साक्षी रही। स्कूल की खट्टी मिठ्ठी इमली, अमिया, रसीले बेरों से लेकर कॉलेज की तीखी, चटपटी, चाट, मेल सबके स्वाद की साक्षी।
वहीं पर उसने अपने विवाह की चर्चा सुनी। और-तो-और उसी खिड़की में खड़ी होकर अपने दूल्हे का प्रथम दर्शन किया था। शहर, गली, घर, खिड़की सब छूटी। बिछड़ते वक्त वो उन निर्जीव सलाखों और लकड़ी को छू-छूकर रोई। क्या मालुम ससुराल में कैसा कमरा मिलेगा, पता नहीं अपने घर सा एकांत वहाँ होगा या नहीं ताजी हवा की घूप, रोशनी, सबकी खबरी खिड़की होगी या नही …? मेंहदी, महावर से रची हुमकती-ठुमकती जब ससुराल में आई तो घूँघट के पार से कुछ समझ ही नहीं आया कि घर कैसा है?
बस एक अजनबी के साथ मजबूत डोर से बंधी पीछे-पीछे चलती गई। देर रात उसे अपने कमरे के दर्शन हुये। तीसरी मंजिल में छत के किनारे बने अपने गरम कमरे में, वो सहमी सकुचाई बैठी रही। पति ने आते ही दरवाजा बन्द करने के बाद – ‘‘बहुत गर्मी है’’ कहकर खिड़की की सिटकनी खोल दी, दो लकड़ी के पल्ले एक बंधन से आजाद हुये और एक ताजी हवा कमरे में आई। वो खुशी से बौरा गई, ऐसे हुलसी जैसे कोई छोटा बच्चा प्रिय मनोवांछित खिलौना पा गया हो।
जब अगले दिन उसे एकांत का सुयोग जुटा तो सबसे पहले उसने खिड़की से बाहर निहारा। उसका घर बाजार के बीच में था। नीचे तल्ले पर दुकानें, दूसरी मंजिल पर पूरा परिवार और तीसरे मंजिल पर एकांत में बना कमरा और उसके हिस्से आई मनभावन खिड़की। मायके की तरह वो खिड़की उसके सारे दुख-सुख की साक्षी बनती गई। पति का प्रेम, बच्चे के जन्म पर और पालन-पोषण में कठिन परिश्रम की। उसने व्यवसाय वाले घर में रहकर सरकारी नौकरी करी। पढ़ाना उसका पेशा नहीं बल्कि उसका जुनून था, उसका शौक था, पूजा थी।
एक लम्बा अन्तराल… गहन आपा-धापी भरा युग गुजर गया। नौकरी परिवारिक जिम्मेदारियाँ सब साथ-साथ चला वो कदम ताल मिलाकर चली। बच्चों को सक्षम बनाया। मान और गौरव बने बच्चे। फिर पति का विछोह जीवन में पक्षघात सा हो गया। 30 वर्षों के सुदीर्घ साथ के बाद उनका जाना पंगु कर गया। उस दुख को भी उसने सहा। हर बार उसकी आत्मीय स्वजन बनी खिड़की उसका संबल रही।
बड़ा बेटा अपने ख्वाहिशों के पंख लगाकर सपने पूरा करने सात समन्दर पार उड़कर जा बैठा। सबसे पराया हो गया, दूर हो गया। उससे सम्बन्ध बस वीडियो कॉल और फोटो के लेने-देने में सिमट कर रह गया। छोटे बेटे ने अपने भाई की तरह सिर्फ अपना ना सोचकर, सबका सोचा। पढ़ लिखकर वो भी ऊँची तनख्वाह वाली नौकरी में लगा और रिटायरमेन्ट के बाद माँ को अपने साथ ले आया।
कष्ट हुआ उस पुस्तैनी खिड़की से बिछड़ते हुये। जहाँ रहकर उसने बजार के उठते-गिरते भाव और तेजी से जीवन बदलते मूल्य निहारे। जहाँ बैठकर उसने पति, बच्चों की राह तकी, तो बहुओं के शुभ कदम बहोरे। अब वो घर की मालकिन से अलग जिम्मेदारी बन कर रही गई। अपने ससुराल के पुस्तैनी घर को भी छोड़ते हुये उसे अनंत कष्ट हुआ। पर बेटे की खुशी और अपनी असमर्थता देखते हुये चुपचाप बेटे के निर्णय को स्वीकारने मे ही भलाई समझ कर उस महानगर में चली आई।
उम्र की इस वय मे फिर एक परिवर्तन। पर ये परिवर्तन बहुत कष्टकारी रहा? जब दुल्हन बनकर आई थी तब तो उम्र एक नाजुक लचक में थी। जैसा चाहा वैसे ढर्रे में ढल गई। फिर उन दिनों की आपा-धापी ने नदी को जिस दिशा में मोड़ा, मुड़ती गई। बहती गई, वक्त की अविरल धार में। जब बेटे के फ्लैट में आई तो भी उसके हिस्से खिड़की आई, बल्कि यूँ कहे बेटे से आत्मीय इच्छा प्रगट की और बेटे ने इच्छा का मान रखा। उसकी सोसायटी शहर से दूर थी, वहाँ अभी बहुत सी इमारतें बन रही थी। उसकी खिड़की खुलते ही एक नया संसार खुल जाता था। ईट, गारे, सीमेंट से गढ़ती बनती एक इमारत और उससे जुड़े जाने कितने चिन्हे-अनचीन्हे चेहरों से एक अनजान रिश्ता जोडती, सेहती, पालती और एक काल्पनिक दुनिया में मगन रहती। बेटे-बहू की नौकरीपेशा, अति व्यस्तता वाली जिदंगी में भरपूर सहयोग देती। घर में काम के लिये बाइयाँ थी। उन सब के सहयोग से बच्चों की परवरिश की, पूर्ण मनोयोग से बच्चों को गढ़ने में पूरा सहयोग दिया। पर जाने क्यों, कोई आत्मीय तंतु जुड़ न सका। कहाँ क्या कमी थी वो समझ नही सकी? जैसे उसकी बहू भी उससे जुड़ नही पाई वैस ही बच्चे रहे। सारा स्नेह प्रेम अकारथ रहा।
ठीक-ठाक दस साल रिटायरमेन्ट के बाद वो स्वस्थ, घर की मुख्य धुरी बनी रही। बच्चों के टिफिन से लेकर किचन की सारी की सारी उसी की जिम्मेदारी रही। उसे उसमें खुशी ही होती थी, समय भी कट जाता था। बचा-खुचा समय अपनी प्रिय संगनी के साथ बोलते-बतियाते एक अनजान संसार से रिश्ता गढ़ते बीता जा रहा था।
पर समय का फेर उस पक्षघात ने उसका पूरा जीवन बदल दिया। जहाँ वो अपनी इच्छानुसार भोर में उठकर बच्चों के उठने के पहले आधा से ज्यादा काम निपटा डालती थी। वहीं अब बिस्तर पर पड़ी-पड़ी बाट जोड़ती कि कब बेटा उठे और उसे उठाकर व्हील चेयर में बिठाकर बाथरूम में पहुंचा दे। बस वहाँ तो वो अपना काम कर लेती थी, फिर आवाज देती कई बार आवाजों का सिलसिला चलता ही रहता। 2 मिनट से 20 मिनट गुजर जाते, उसे यूं लगता बेटा भूल गया क्या?
जब वो खीज कर अनवरत आवजें देती तो किसी का खीजा स्वर सहमा डालता ‘‘रूक जाओ आ रहे हैं।’’
वह सोचती रूकी ही तो हूँ घंटे भर से, पर कौन सुनता, किससे कहती?
बेटा भी आकर चिल्लाता ‘‘मम्मी तुम्हें थोड़ा भी सबर नहीं है, मैं भी तो अपना काम कर रहा होता हूँ, मैं बाथरूम में था, आप सांस ही नहीं लेती।’’
अन्दर -ही अन्दर जोर की रूलाई फूटती पर सारी शक्ति लगाकर उसे घुटकती – बेटा कमरे में लाकर खिड़की के सामने व्हील चेयर लगा देता – बहू आकर चाय बिस्किट रख जाती। पटकती या रखती उसे तो पटकना ही दिखता। बहरहाल पूरी जिन्दगी अपने हाथ की बनाई अपनी रूचि की चाय पीती रही। वो एक कप चाय उसकी संजीवनी होती थी। पर अब बेस्वाद ठंडी चाय, बस वो जल्दी-जल्दी घूंट भरती।
भागते दौड़ते बहू, बेटे, बच्चों को देखती, सोचती कितना अवश हो जाता है इन्सान। अपने ही शरीर से। उसी देह के बल पर उसने एक युग जिया और आज उसी देह ने उसे परवश कर रखा है। अपनी व्हील चेयर घसीट कर दरवाजे में बैठी सबको देखती रहती, जाते हुये सब कहते ‘मम्मी जा रहे…..’ ‘दादी बॉय …’
बस इतना ही वार्तालाप आने पर ‘‘ठीक है आप? हाँ बेटा? आ गई तुम?’’ बेटा छुट्टियों में उसके पास बैठता तब वो अपने दिन-दिन बचाए सहेजे शब्द निकालती, बोलती, खूब बोलती- पता नही क्या-क्या अर्नगल। अब उसका संसार सीमित था। सारी दुनिया से नाता कट गया था। पेपर पूरा दिन पढ़ती ‘एक-एक खबर पूरी-पूरी। पोता-पोती हंसते दादी तो विज्ञापन तक पूरा पढ़ती है। ‘‘पेपर में क्या आया, ये पूछना हो तो बस दादी से पूछ लो पूरा डिटेल बता देगी’’। कई बार बेटे से कहकर पुस्तके भी मंगवा लेती पर अक्षर बहुत छोटे होने से पढ़ने में नही आते। चश्में का भी नम्बर अब कैसे टेस्ट हो, कैसे चश्मा बदले समस्याएँ ही समस्याएँ….।
महानगर की अजीब जीवनशैली कोई किसी के घर नही जाता, वो बात भी करे तो किससे और क्या? बाई आती तो ऐसी घोड़े पर सवार उससे पाँच मिनट भी बात कर लो, तो वो ऐसे भागती कि जाने कितना समय बर्बाद हो गया।
ऐसे ही बेरंग बेरौनक जीवन जिये जा रही थी वो। कैलेण्डर बदलते गये। नया कैलेण्डर आते ही वो एक-एक तिथि त्यौहार, ग्रहण, सब देख डालती, पर किसलिये?
न तो अब उसे होली पर गुजिया, पापड़ी, नमकीन बनाने होते, न दीवाली की सफाईयों में दमपश्त होना पड़ता- फिर वो क्यों देखती, तीज त्यौहार।
अब तो सारे त्यौहार सोसायटी में ही मनाये जाते। खूब रौनक होती, डी.जे. में कानफोड़ू संगीत बजाया जाता, सब थिरकते। फिर सब साथ मिलकर खाना खाते। उसके लिये भी कोई थाली ला देता। उसके कमरे, खिड़की में बस बाहर पीछे का वीरान भाग दिखत था। एक सूनसान निर्विकार दुनिया! बिल्डिग का काम जब चलता खूब रौनक लगती मशीनों का रिदम, मजदूरों का शोर, गिट्टी, रेत, सीमेंट, मशीनों से मिलाने का लयबद्ध स्वर, उसे बहुत आनंद आता। उसके लिये तो तभी त्यौहार होते। दिन भर भागते-दौड़ते जब ढ़लती शाम को सब साथ शांत हो जाता। उसी खुले आसमान के नीचे पसरता एक नया जीवन। चूल्हे में खदबदाती भगोनी लकडी़ के डंडे पर बंधा कपड़े का झूला, सिल्वर की थालियाँ लिये कतार बॉधे मैले कुचैले बच्चे और एक आहलाद के साथ प्रेमसहित अन्न परोसती माँ। उसे भी अपना समय याद आता कैसे पहले उस बड़े से पुस्तैनी मकान के सामूहिक रसोई घर में वो जुटती थी। भतीजे-भतीजी, भाँजें-भाँजी, सास-ननद, जेठ-जेठानी कितने लोगों का जमावड़। कितना कठिन होता था उन दिनो दस मिनट की फुर्सत भी अपने लिये निकालना और अब ….. फुर्सत-ही-फुर्सत है। हे ईश्वर! उसके बच्चे कहाँ गये?
उसका बेटा जाने किस धरती पर बैठा क्या कर रहा अकेला! उसे अपने सीने में तेज दर्द महसूस हआ, मेरा बच्चा कहाँ है? जैसे वो 48 साल का पूर्ण परिपक्व इंन्सान न होकर उसकी गोद में हुलसने वाला छोटा सा शिशु हो। आँसू यूँ ही निकलने लगते टप-टप बेटा शायद आया था, उसके बाल सहला रहा था। गर्म तरलता ने उसे चेताया- ‘‘क्या है माँ कुछ चाहिये? कोई तकलीफ है?’’
यदि कह सकती तो घंटों बोलती कि हाँ चाहिये मुझे मेरे बच्चे, मेरा घर, मेरा शरीर, मेरा व्यस्ततम दिन चाहिये।
बेटे के लिये मन कितना विकल है। यूँ लगा पंख लगाकर उड़ जाये, दूर विदेश पता नहीं किन समुन्दरों के पार किस धरती पर बैठा हो। उसे समेट ले अपनी कमजोर बाँहों में। उसे सीने से लगाकर कहे – ‘बेटा तू मेरा हिस्सा है, मै तेरे बिना मर भी नही पा रही। मेरे पास रह इस जाती की बेला मेरा हाथ पकड़, मेरी निःसक्त कमजोर शरीर का सहारा बन, छोटे ने तो बड़े का फर्ज किया पर तू इतना निर्मोही क्यों हो गया? आ…..जा बेटा।’
सारे वाद-संवाद अन्दर ही अन्दर बनते- बिखरते रहे। मुँह से बस इतना ही निकला ‘‘विधु………’’। ‘‘माँ भइया से मिलना है?’’ ‘हाँ’ ‘‘रूको कॉल करता हूँ।’’ फिर एक स्क्रीन पर आँखे गड़ाये बच्चे से परिपक्व पुरुष में परिणित उसका जाया। उसके रक्त मांस का अंश। एक छवि उभरी। चश्मा संभालता धीमा स्वर ‘माँ आप अच्छी हो जाओगी।’ उसकी आत्मा कराहती कहती – ‘‘मुझे अच्छी नही होना बस मुक्त होना चाहती हूँ इस शिथिल क्लान्त देह से हूँ। मुक्त करना चाहती हूँ, प्राणप्रिय बेटे को उसकी जिम्मेदारियों से। पर न तो शक्ति शेष! न शब्द। ऑक्सीजन मास्क होने से ठीक से दिख भी तो नही रहा। बेटा देा मिनट में फोन लेकर पयताने आ गया। उसने आँखे बन्द कर ली, पर स्वर अन्दर आ रहा था ‘‘भाईया आ जाओ …. आपको बहुत याद कर रही हैं।’’
‘‘भाई आना मैं भी चाहता हूँ मेरी भी इच्छा है, पर छुट्टी कितने दिन की कैसे लूँ ये तो बता। यदि कुछ हो गया तो मुझे लम्बा रूकना पडेगा, फिर बीच में छोड़कर तो नही आ सकता। सब लोग क्या कहेगें मै इसी चिन्ता में हूँ कि कैसे छुट्टी मिले पर दिन निश्चित होते तो अवश्य ही पहुँच जाता, और छुट्टी भी मिल जाती पर यूँ …सब …कुछ निश्चित….तो नही।’’
अन्दर शब्द घुटते…. क्या निश्चित करना चाहता है बेटा? कि उसकी साँसों की डोर टूट जाये? 15 दिन की छुट्टी ले कर आ सके, क्या आवाश्यक है? मृत्यु के बाद क्रिया कर्म, विधान में उपस्थिति क्यो? क्यों नहीं इस वक्त जब मेरी आशक्त देह और मन अपने अंश को तलाश रही, उसके स्पर्श को विकल है, उसे एक बार छुकर आश्वस्त होना चाहती, है कि उसका सृजित वृक्ष सुरक्षित है। क्यों नहीं कोई उसके भाव समझ रहा? उसका दम फिर घुटने लगा – छटपटाने लगी हवा के लिये। बहुत मुश्किल से हाथ उठाकर मास्क उठाया। बेटा फोन लेकर बाहर निकल गया था। इधर-उधर देखा चारों तरफ पर्दो से आच्छादित पलंग, कितनी घुटन है! उसकी साँसे रूक रही, काश उड़ जाती तो खिड़की ढूंढ़ कर ताजी हवा ढूंढ़ लाती। अवश होठ काँप रहें। शब्द निकल नही रहे। पर मन पता नही क्या-क्या सोंच रहा।
हृदय कैसा होता होगा? कैसा होगा? न कोई आकार न स्वरूप बस इच्छाएं। एक मात्र इच्छा उसे ताजी हवा मिल जाये। जीवन भर जिस आसमान से घिरते छोटे से धूप के टुकड़े के अपना मान कर जीती रही, जिस धूप की गुनगुनाहट को भीतर संजो उर्जान्वित होती रही, उमस भरी गीली-गीली हवा को अपने भीतर सेहती पालती, उसी के सहारे जीती गई। आज छटपटा रही उस एक टुकड़े आसमान को देखने को उस ताजी हवा के स्पर्श को तरस रही। हाथ की क्लिप भी निकाल दी। उंगलियो का एक क्लिप ……..उसकी श्वासों का प्रवाह नापा जा रहा था, उसकी नाड़ी की गति देखी जा रही, शायद बीप–बीप की आवाजें बंद हुई तो नर्स की नींद खुल गयी वो हड़बड़ाती हुई बेड के पास आई, ‘‘क्या करती हो अम्माँ, सब निकाल डाला’’ खीजती हुई वो फिर उसके मुँह में मास्क लगा रही थी। उंगलियों को क्लिप की जद के ले रही थी, उससे धीमे स्वर में बहुत मुश्किल से पूछा – ‘‘मेरा बेटा….। ‘हाँ बुलाती हूँ।’
थोड़ी ही देर में बेटा उपस्थित, हताश, निराश उसके पास आकर खड़ा हो गया। नम आँखों से उसे ताक रहा था, ठीक वैसी ही मासूमियत से जब वो उसे पहली बार अपने से अलग कर स्कूल छोड़कर आई थी। जब वो पहली बार उसे छोड़कर शहर से बाहर पढ़ने गया था। अब तो वो जा रही पता नहीं किस अनंत यात्रा पर …. उसे अकेला छोड़कर। उसके भरे पूरे परिवार जिम्मेदारियों के साथ धन कमाने की रौ में पिसते अस्तित्व के साथ। वो उसे सक्षम बनाकर जा रही। उसने पूरी ममता के साथ अपना कमजोर हाथ उसके हाथ में रखा था। गर्म-गर्म टप-टप टपकते आँसू उसके लगाव के हस्ताक्षर प्रमाण कि वो उतनी भी अनुपयोगी आवाछिंत नही हैं? कोई है जो उसके साथ है। जाती कि बेला ये दो ऑसू एक स्पर्श में एक आश्वासन – ‘माँ मैं हूँ ना—तुम्हें क्या चाहिये?’
जैसे वो छोटी सी बच्ची हो और वो अलादीन का चिराग! जो पल भर में सारी फर्माईसे पूरी कर देगा। बेटे के आँसुओं के स्पर्श से पुनर्जीवित हो गई। हुलसकर स्वर फूटा- खिड़की ‘‘अच्छा माँ रूको मै करता हूँ व्यवस्था’’ नर्स पर झल्ला रहा था। ‘‘आप लोग व्यवस्था क्यों नहीं कर रहे प्लीज… कुछ कीजिये वो कुछ नही माँग रही यदि आप खिड़की वाला बेड अरेंज नही कर सकते तो मैं अपना पेसेन्ट ले जाऊँगा, फिर चाहे जो भी हो। ‘‘जी सर मैं बात करती हूँ बहुत जल्द व्यवस्था करवाती हूँ।’’ नर्स बच कर निकल गई।
वो आश्वस्त एक जिद्दी बच्चे की तरह उसकी जिद किसी ने सही मान ली। उसकी जिद को पूरा किया, उसे अब ताजी हवा मिले न मिले धूप दिखे न दिखे वर्षा की बूंदे तन-मन भिगोये न भिगोये पर आश्वस्त हो गई कि उसका बेटा उसकी इच्छा का मान रख रहा है। एक दृढ़ आवलंब, श्वास-निश्वास की निर्धारित लय कम हो रही थी। नसों में प्रवाहित गर्म तरलता जर्द हो रही थी। बस ईश्वर अब इस बार विश्वासघात मत करना। अमरण के रण में मृत्यु की चिरवांदित प्रतीक्षा का अब अन्त करो। स्वतः पलकें मूंद रही थी।
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