यकीन कीजिए मेरा, मौत बहुत अच्छी चीज़ है। जो आपको जीते-जी नहीं मिल पाता, वह मरने के बाद मिल जाता है। यह मैं अपने अनुभव से बता रहा हूँ। रुकिए-रुकिए! आप पूछेंगे कि मैं मरा कैसे? यह मैं बाद में बताऊँगा। पहले शुरुआत मेरे जीवन से।
मेरी शादी लव मैरिज थी। शादी से पहले वह मुझे वैसी ही लगती थी जैसे प्रेम में पगे हुए सभी लड़कों को हर लड़की लगती है—प्यारी, स्वीट, केयरिंग और हाँ, सबसे अलग! जैसी खुद प्यारी थी, वैसा ही प्यारा सा नाम था उसका—श्रेया।
फिर मेरी शादी हो गई। अब वह मुझे वैसी ही लगने लगी जैसे सभी पतियों को अपनी पत्नी लगती है— हेडमास्टर टाइप! लगता था जैसे हम फिर से स्कूल या हॉस्टल में आ गए हों। हर समय ‘यह करो’, ‘वह करो’, ‘यह मत करो’, ‘तुम्हें तो कोई तमीज़ ही नहीं है’… इत्यादि-इत्यादि।
हर मध्यमवर्गीय माता-पिता की तरह मेरे माता-पिता को भी मेरी लव मैरिज पसंद नहीं थी। वे चाहते थे कि लड़की अपनी बिरादरी की हो—पढ़ी-लिखी, सुशील, सुसंस्कारी और सुसभ्य टाइप! यह अलग बात है कि मेरी बहनों को भी पता नहीं था कि ऐसी लड़की आख़िर मिलती कहाँ है।

हर मध्यमवर्गीय माता-पिता की तरह मेरे सास-ससुर को भी यह शादी पसंद नहीं थी। बेटी को इतना पढ़ाया-लिखाया इसलिए थोड़ी न था कि केमिस्ट की दुकान में काम करने वाला दामाद मिले! वे तो चाहते थे कि उनकी बेटी किसी बड़े घर में जाए, वहाँ राज करे और उसके एक इशारे पर सारी ख़ुशियाँ हाथ जोड़े आ खड़ी हों। यह अलग बात है कि उनके घर में भी उनकी बेटी अपने हाथों से ही सारा काम करती थी और घर का हर सामान पैसे जोड़-जोड़कर ही आया था।
पता नहीं आप लोग कैसे संभालते हैं, मैं तो रोज़-रोज़ के इस बखेड़े से बिल्कुल थक गया था। दुकान से आकर माँ के पास बैठूँ तो बीवी नाराज़, बीवी के पास बैठूँ तो माँ नाराज़। माँ के हाथ का बना खाना चाव से खा लूँ तो बीवी गाल फुला लेती और बीवी के हाथ का बना खाऊँ तो माँ को लगता कि जब से बहू आई है, उसकी तो कोई पूछ ही नहीं है! सच मानिए, माँ और पत्नी में संतुलन बनाना बिल्कुल वैसा ही है जैसे तराजू में रखकर मेंढक तौलना। कभी कोई मेंढक इधर उछल जाता तो कभी उधर।
पिताजी के अलग ही क़िस्से थे। वे चाहते थे कि मैं पैसे बचाकर रखूँ, अपनी सारी कमाई तुरंत न ‘लुटा’ दूँ। माँ और पिताजी दोनों की नज़रों में बहू तो पैसे उड़ाती ही थी, उसे समझाने के बजाय मैं भी उड़ाने लगा था। “रोज़-रोज़ बहू न जाने क्या-क्या ऑनलाइन ऑर्डर करती रहती है। बाहर का खाना रास आता है उसे, घर का बना नहीं। घर का काम करने में तो उसका मन ही नहीं लगता। जब भी घर में रहती है, फोन पर ही लगी रहती है…” इत्यादि।
श्रेया का तर्क भी अपनी जगह सही ही था। सारा दिन ऑफिस में काम करके घर आने के बाद सब उससे उम्मीद करते कि वह घर का सारा काम करे। वह भी तो इंसान है, कोई मशीन नहीं। वह भी थकती है। रिलैक्स होने के लिए टीवी या मोबाइल पर कुछ देख लेती या किसी से बात कर लेती, तो इसमें कौन सा पहाड़ टूट पड़ता था! इंसान दिन भर मेहनत करके कमाए और थोड़ा सा ज़िंदगी का आनंद लेने के लिए बाहर चला जाए या बाहर खाना खा ले, तो यह भी लोगों से बर्दाश्त नहीं होता था।
मेरी हालत तो ‘एक तरफ कुआँ, दूसरी तरफ खाई’ वाली थी, इसलिए मैं चुप ही रहता था। लेकिन मेरे चुप रहने से क्या होता? एक दिन चेतावनी मिल ही गई—”या तो तुम इस घर में माँ-बाप के साथ रह लो या मेरे साथ चलो।” पिताजी ने भी कह दिया कि रोज़-रोज़ के झगड़े से अच्छा है तुम इसे लेकर कहीं अलग चले जाओ। माँ ने भी उनकी बात में सहमति जताई।
उस दिन से मैं और श्रेया एक अलग फ्लैट लेकर रहने लगे। माँ-पिताजी ने कह तो दिया कि अलग हो जाओ, लेकिन उनके मन में तीन बातें खटक रही थीं— पहली, बेटा पत्नी के साथ अलग हो गया, यानी हमारी तुलना में पत्नी का महत्व उसकी नज़रों में ज़्यादा है। दूसरी, बहू पढ़ी-लिखी है, कहीं केस करके हमारी संपत्ति में से हिस्सा न मांगने लग जाए और बेटा भी उसका विरोध नहीं कर पाएगा। तीसरी, बहू कहीं केस करके हम सबको फँसा न दे। आस-पास के लोगों ने भी उनके इन अंदेशों को और हवा दी। आखिरकार उन्होंने फ़ैसला कर लिया कि वे मुझे घर सहित अपनी तमाम जायदाद से बेदख़ल कर देंगे और मुझसे कोई संबंध नहीं रखेंगे। अख़बार में बेदख़ली का कानूनी नोटिस देकर उन्होंने मुझसे सारे रिश्ते ख़त्म कर लिए। इसके बाद अगर मैं कभी मिलने भी चला जाता, तो उनकी अंतहीन शिकायतें शुरू हो जातीं। वे मुझसे कुछ पैसों की उम्मीद भी करते थे, लेकिन मेरे पास पैसे बचते ही नहीं थे, इसलिए चाहकर भी नहीं दे पाता था।
इधर, जब से मैं और श्रेया अलग फ्लैट में रहने लगे थे, कुछ दिन तो सब ठीक रहा। श्रेया ने पूरे घर को अपने हिसाब से सजाया-संवारा। उसके सारे पैसे इन चीज़ों में ख़त्म हो गए और मेरे पैसे श्रेया की ज़रूरतें पूरी करने में। फिर धीरे-धीरे उसका मुझे निर्देश देना बढ़ने लगा—”तुम्हें तो कोई तमीज़ नहीं है”, “तुम्हारा ड्रेसिंग सेंस कितना घटिया है”, “यह क्या रंग पहन लिया है!”, “ऐसी शर्ट पहनकर आज तुम मेरे दोस्तों के सामने आ गए?”, “यह हेयरस्टाइल सही नहीं है”… इत्यादि। “तुम जल्दी घर नहीं आ सकते? मैं शाम से अकेले घर में क्या करूँ?”
मैं उसे समझाना चाहता था कि उसका ऑफिस सुबह 9 बजे शुरू होकर शाम 6 बजे ख़त्म हो जाता है, इसलिए वह 7 बजे तक घर आ जाती है। लेकिन मेरी केमिस्ट की दुकान तो सुबह 11 बजे खुलती है, तो बंद भी रात 10 बजे के बाद ही होती है। लेकिन उसका जवाब होता—”तो छोड़ दो यह नौकरी, कोई दूसरी नौकरी कर लो! यह कैसा काम है जहाँ रविवार की छुट्टी भी नहीं मिलती?” उसका ऑफिस रविवार को बंद रहता था और मेरी दुकान सोमवार को। हमारे मार्केट की सभी दुकानें रविवार को खुली रहती थीं, क्योंकि उसी दिन ज्यादातर लोगों की छुट्टी होती थी और वे ख़रीदारी करने निकलते थे। श्रेया कहती—’तुम सिर्फ एक केमिस्ट बनकर ही रह जाओगे क्या?’ और मैं सोचता— ‘इसी केमिस्ट की दुकान से तुम्हारे ऑनलाइन ऑर्डर के बिल जा रहे हैं।’
दिन भर दुकान में खड़े-खड़े थककर जब रात को घर आता, तो शिकायतों और फ़रमाइशों का बाज़ार सजा मिलता। मैं कभी-कभी झुँझला उठता। फिर एक दिन आखिरी नोटिस मिल ही गया—”अब हम साथ नहीं रह सकते, हमें तलाक ले लेना चाहिए।” मैं भी रोज़-रोज़ के झगड़ों से तंग आ चुका था, इसलिए तैयार हो गया। लेकिन अगली शर्त यह थी कि तलाक के लिए मैं उसे दस लाख रुपये दूँ।
अजीब रिश्ता है यह शादी भी! रिश्ता बनाने की क़ीमत होती है, रिश्ता निभाने की क़ीमत होती है और रिश्ता ख़त्म करने की भी क़ीमत होती है! पर इतने पैसे मेरे पास थे कहाँ? इसलिए श्रेया ने कोर्ट में तलाक का मुकदमा दायर कर दिया।
चलिए, अब मैं बताता हूँ कि मैं मरा कैसे।
श्रेया से अलग होने के बाद मैंने एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और वहीं रहने लगा। वह बेहद तंग और भीड़भाड़ वाला मोहल्ला था। वहाँ कमरा सस्ते में मिल गया था, इसलिए ले लिया ताकि पैसे बचाकर कर्ज़ा चुका सकूँ और एक छोटा सा घर ख़रीद सकूँ। फिर श्रेया को भी तो कुछ पैसे देने ही थे, जैसा कि वकील ने कहा था।
एक दिन सुबह जब मैं कमरे से निकलकर दुकान जा रहा था, तभी एक कार ने मेरे स्कूटर को टक्कर मार दी। लेकिन मैं उससे नहीं मरा। कार की टक्कर से मैं सड़क के बीचों-बीच जा गिरा, तभी पीछे से आती एक तेज़ रफ़्तार बस मेरे ऊपर से गुजर गई। कार से टक्कर खाकर जब मैं बस के नीचे आया, तो मुझे दर्द तो हुआ… पर सुकून इस बात का था कि अब मुझे न तो दुकान की चाबी संभालनी है, न किसी का फ़रमान सुनना है।
कानून के मुताबिक उस बस वाले और कार वाले— दोनों को मेरी मृत्यु का जिम्मेदार मानते हुए मुआवजा देना था। दोनों की बीमा कंपनियां इसके लिए राज़ी भी हो गईं। लेकिन अब असली समस्या यह खड़ी हुई कि यह मुआवजा किसे दिया जाए— मेरी पत्नी को या मेरे पिता को? आखिरकार मेरे मुआवजे का केस कोर्ट में पहुँच गया।
कोर्ट का दृश्य बहुत मजेदार था! काश, आप वहाँ होते और मेरे पिता व पत्नी के चेहरे देखते! मेरे पिता जज साहब से कह रहे थे—”वह मेरा बेटा था। मैंने उसे जन्म दिया, पाला-पोसा, पढ़ाया-लिखाया… इस दुर्घटना ने मेरा लाल हमसे छीन लिया! जज साहब, हमने बुढ़ापे की लाठी खोई है। इसके बिना हमारा बुढ़ापा कैसे कटेगा?” पत्नी के साथ तो उसका तलाक का केस चल रहा था, यह तो उसे छोड़कर चली गई थी… अब मुआवजे की रकम ऐंठने आई है! इस रकम पर इसका कोई हक नहीं है, यह हमें दी जाए।”
दूसरी तरफ मेरी पत्नी रुआँसी होकर कह रही थी—”जज साहब! हमारी लव मैरिज थी। मैंने उनके लिए अपना घर-परिवार तक छोड़ दिया। सास-ससुर इस शादी से खुश नहीं थे, इसलिए हम दोनों को घर से निकाल दिया। इन्होंने अपने बेटे को कानूनी रूप से बेदख़ल कर दिया है। जब इनकी संपत्ति पर बेटे का कोई अधिकार नहीं रहा, तो बेटे की संपत्ति पर इनका अधिकार कैसे हो सकता है? मुआवजे की रकम पर इनका कोई हक नहीं है! “जज साहब, मैं इसकी कानूनी पत्नी हूँ। मेरा पूरा जीवन अब इसके बिना अंधकार में डूब गया है… इस मुआवजे से ही मेरी आगे की ज़िंदगी संभलेगी!”
जज साहब किसे और कैसे पैसा देंगे, यह तो मैं नहीं जानता, पर मौत कितनी फायदेमंद होती है— यह मैंने आज देख लिया। कोर्ट में यह सब देखकर मुझे बड़ा सुकून मिल रहा था। जब तक ज़िंदा था, तब तक सिर्फ ‘तुम्हारा पति’ और ‘तुम्हारा बेटा’ था… आज अचानक ‘मेरा पति’ और ‘मेरा बेटा’ बन गया! ज़िंदगी में पहली बार पिताजी और मेरी पत्नी किसी एक बात पर पूरी तरह सहमत थे— कि मेरी मौत उनके लिए बहुत क़ीमती है!”
पत्नी मुझसे तलाक के लिए 10 लाख रुपये मांग रही थी, जो मैं जीते-जी उसे नहीं दे पाया था, लेकिन मेरी मौत की क़ीमत आज पूरे 20 लाख रुपये लग चुकी थी। मैं जीते-जी कभी अच्छा बेटा नहीं बन पाया क्योंकि माता-पिता को पैसे नहीं दे पाता था, पर आज मरने के बाद… शायद मैं एक अच्छा बेटा बन जाऊँ!
