साहित्य में बाज़ारवाद : शब्दों का सौदा या समाज का आईना

जून, 2026

अमन शर्मा
अमन शर्मा
कनिष्ठ अनुवाद अधिकारी,
पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्रालय
लखनऊ, उत्तर प्रदेश

आधुनिक भारत में साहित्य एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ उसकी आत्मा और उसका बाज़ार आमने-सामने दिखाई देते हैं। एक ओर वह परंपरा है जिसमें साहित्य समाज का मार्गदर्शक, संवेदनाओं का वाहक और नैतिक मूल्यों का संरक्षक रहा है वहीं दूसरी ओर आज का समय है, जहाँ वही साहित्य तेजी से एक उत्पाद में परिवर्तित होता जा रहा है। मुंशी प्रेमचंद ने समाज में साहित्य के महत्व को दर्शाते हुए कहा था कि “साहित्य समाज का दर्पण ही नहीं, उसका मार्गदर्शक भी है” और यह कथन आज भी उतना ही प्रासंगिक है, परंतु प्रश्न उठता है कि क्या आज का साहित्य वास्तव में मार्गदर्शन कर रहा है या केवल बाज़ार की माँग को ही पूरा कर रहा है।
वर्तमान में भारतीय साहित्य केवल भारतीय बाज़ार के घेरे में ही दिखाई दे रहा है, पिछले तीन दशकों में वैश्वीकरण और उदारीकरण ने भारतीय समाज की संरचना को गहराई से बदला है तथा इसका सीधा प्रभाव साहित्य पर भी पड़ा है। अब पुस्तकें केवल विचारों की अभिव्यक्ति नहीं रहीं, बल्कि एक “मार्केट प्रोडक्ट” बन चुकी हैं, जिन्हें पैकेजिंग-ब्रांडिंग के तहत तैयार किया जाता है, प्रचारित किया जाता है और बाज़ार में अधिक दामों पर बेचा जाता है। विडंबना यह है कि मूलतः साहित्य सृजन का प्रयोजन ज्ञान-विज्ञान का प्रचार-प्रसार, अभिव्यक्ति का आदान–प्रदान या मनोरंजन का साधन था लेकिन अब यह उद्देश्य न होकर साहित्य, मौद्रिकरण के एक घटक के रूप में उभर कर सामने आ रहा है। नामवर सिंह ने अपने आलोचनात्मक विचारों में यह संकेत दिया था कि साहित्य के मूल्यांकन के मानदंड बदल रहे हैं क्योंकि अब यह देखा जाता है कि कोई भी रचना अथवा कृति कितनी बिकती है, न की वह कितनी सार-गर्भित है।
प्रकाशन के उद्योग जगत में “बेस्टसेलर” शब्द का महत्व इतना बढ़ गया है कि साहित्यिक गुणवत्ता अक्सर पीछे छूट जाती है और केवल लोकप्रियता, कॉपी प्रिन्ट की संख्या तथा कितनी कॉपियाँ कितनी तेजी से बाज़ार में बिक रही हैं, इसे ही सफलता का मानक माना जाता है। आज के साहित्य में गुणवत्ता और लोकप्रियता के बीच एक स्पष्ट द्वंद्व दिखाई देता है। रोमांस, थ्रिलर और हल्के-फुल्के विषयों पर आधारित पुस्तकें थोड़ी आसानी से बिक भी जाती हैं, जबकि सामाजिक, दार्शनिक या वैचारिक गहराई वाली रचनाएँ केवल सीमित पाठकों तक सिमटकर रह गई हैं। आज पाठक भी तेजी से बदलती दुनिया के ट्रेंड के हिसाब से अपनी पढ़ने की रुचि को बदल रहे हैं। नामचीन साहित्यकार रामधारी सिंह दिनकर ने अपने समय में ही चेताया था कि “साहित्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानवता का उत्थान करना है” लेकिन वर्तमान प्रवृत्तियाँ इस उद्देश्य को भूलती दिखाई दे रही हैं और उनका ध्येय केवल लोगों की लोकप्रियता को बटोरना तथा आर्थिक रूप से स्वयं को पुष्ट करना बनकर रह गया हैl
साहित्य हमेशा से समाज में नैतिकता और संवेदनशीलता का प्रतीक रहा है। किन्तु आज, बाज़ारवाद के प्रभाव में, कई रचनाएँ केवल सनसनी, मनोरंजन या त्वरित लोकप्रियता तक संकुचित होकर रह गई हैं। कब किसी रचना या उसके लेखक की लोकप्रियता बाज़ार में आई और कब चली गई इसका बहुत ही कम लोगों को पता चल पाता है तथा जितनी जल्दी पता चलता और लोकप्रिय बनता है उतनी ही तेजी से किसी और साहित्य अथवा कृति द्वारा दर-किनार किया जाता है। महादेवी वर्मा लिखती हैं कि साहित्य, संवेदनाओं की आत्मा है। उनका मानना था कि यदि संवेदनाएँ समाप्त हो जाएँ, तो साहित्य भी खोखला हो जाता है, जिसे कई साहित्य आलोचकों ने ‘ऐब्सर्ड लिटरेचर’ की संज्ञा दी। यही खतरा वर्तमान के साहित्य के सामने भी खड़ा है—जहाँ शब्द तो हैं, लेकिन उनमें संवेदना का अभाव है, बात तो है पर मार्मिकता का भाव नहीं तथा विषय तो है लेकिन उनके वाक्यों में सांस्कृतिक शालीनता और भारतीय सभ्यता को संजोने की क्षमता नहीं है।
यह कहना गलत होगा कि बाज़ारवाद केवल भारत की ही समस्या है। अमेरिका, यूरोप और अन्य देशों में भी साहित्य पर बाज़ार का प्रभाव साफ दिखाई दे रहा है। दूसरे शब्दों में कहें, तो भारत, ऐसे विभिन्न विदेशी चलन को वर्षों से अपनी संस्कृति में इतनी सूक्ष्मता से बखूबी उतारता चला आ रहा है कि इन घटकों को विदेशी प्रभाव कहना भी अतिशयोक्ति लगता है। भारत में यह संतुलन अपेक्षाकृत कमजोर होता दिखाई देता है, जहाँ साहित्य तेजी से उपभोक्तावादी संस्कृति का हिस्सा बनता जा रहा है। फिर भी सभी स्थानों पर साहित्यिक गुणवत्ता और व्यावसायिकता के बीच संतुलन बनाए रखने के हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं।
रवीन्द्रनाथ ठाकुर ने साहित्य को “मानव आत्मा की अभिव्यक्ति” के रूप में परिणत किया, एक ऐसी अभिव्यक्ति जो किसी भी आर्थिक सीमा से परे होती है। परंतु वर्तमान के परिदृश्य में ऐसे विचार केवल लेशमात्र कथनी के रूप में भले ही दिखाई पड़ते हों, यद्यपि, वास्तविकता से इनका संबंध दुर्लभ प्रतीत होता है। एक वो भी समय था जब पाठक साहित्य को आत्म-विकास और ज्ञान का स्रोत मानते थे, वहीं वर्तमान में साहित्य के पाठक तेज़ी से बिकने वाले, सरल और मनोरंजक साहित्य की ओर अधिक आकर्षित होते हैं। डिजिटल युग में इस परिवर्तन ने और तूल पकड़ा है, अब लंबी रचनाओं की जगह छोटे लेख, ब्लॉग और सोशल मीडिया पोस्ट अधिक लोकप्रिय हो गए हैं।
साहित्य में बाज़ारवाद ने केवल रचनाओं को ही नहीं, बल्कि पीढ़ियों के विचारों को भी प्रभावित किया है। मुंशी प्रेमचंद का मत है कि “पाठक साहित्य का अंतिम निर्णायक होता है, जो आज और भी अधिक सत्य और प्रासंगिक प्रतीत होता है। जहाँ पुरानी पीढ़ी, साहित्य को समाज सुधार और नैतिकता का माध्यम मानती हैं वहीं, नई पीढ़ी साहित्य को अभिव्यक्ति, करियर और लोकप्रियता का सुलभ पायदान मानती है। यह अंतर स्वाभाविक है, लेकिन जब व्यावसायिकता रचनात्मकता पर हावी हो जाती है, तब यह चिंता का विषय बन जाता है।
ऐसे परिवेश में जो प्रश्न व्यक्तिगत रूप से किसी एक साहित्य प्रेमी के मन में उजागर होते हैं, खासकर ऐसे साहित्य प्रेमी जिसने प्राचीन भारतीय साहित्य को पढ़ रखा है तथा वर्तमान साहित्य को पढ़ रहा है, कि क्या साहित्य का भविष्य केवल बाज़ार पर निर्भर होगा? क्या लेखक अपनी रचनात्मक स्वतंत्रता को बनाए रख पाएँगे, या उन्हें बाज़ार की माँग के अनुसार लिखना पड़ेगा? यदि साहित्य केवल लाभ का साधन ही बनकर रह गया है तो उसकी आत्मा, उसकी संवेदना, उसका उद्देश्य सब क्या होगा। एक ओर से देखा जाए तो धीरे-धीरे साहित्य की आत्मा को समाप्त करने वाला समय चक्र अपना व्यापक रूप भारतीय समाज में बाज़ार में गिनती की तरह दृष्टिगोचर है जो किसी चेतावनी से कम नहीं है। यह ग्रन्थि मानव समाज की उपज ही है तथा इसके मूल तत्व का संरक्षण, अभिरक्षण और उद्देश्य की पूर्ति भी उस समाज की जिम्मेदारी है।
निकर्षत: समकालीन समय में साहित्य और बाज़ार के संबंधों को लेकर जो बहस चल रही है, वह केवल साहित्यिक विमर्श का विषय नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और नैतिक संकट का भी संकेत है। वैश्वीकरण, उपभोक्तावाद और डिजिटल माध्यमों के तीव्र विस्तार ने साहित्य को एक ओर जहाँ अभूतपूर्व पहुँच प्रदान की है तो वहीं दूसरी ओर उसे “उत्पाद” में बदल देने का खतरा भी उत्पन्न किया है। साहित्य का मूल उद्देश्य मानव जीवन के सत्य, संवेदना और संघर्ष को अभिव्यक्त करना रहा है। जहाँ वह समाज का दर्पण ही नहीं, उसका पथ-प्रदर्शक भी रहा है। यह आज और अधिक अर्थपूर्ण प्रतीत होता है, क्योंकि वर्तमान समय में साहित्य का एक बड़ा हिस्सा बाज़ार की माँग के अनुसार निर्मित किया रहा है। मनोरंजन, तात्कालिक लोकप्रियता और बिक्री की संस्कृति ने गंभीर साहित्यिक सृजन को हाशिए पर धकेलना प्रारंभ कर दिया है, प्रकाशन उद्योग में वही रचनाएँ अधिक प्रोत्साहित की जाती हैं जो शीघ्र बिक सकें, जिनमें सनसनी, रोमांच या त्वरित भावनात्मक आकर्षण हो। परिणामस्वरूप साहित्य का मूल्यांकन उसकी वैचारिक गहराई से अधिक उसकी “मार्केट वैल्यू” से होने लगा है। यह स्थिति चिंताजनक है, क्योंकि साहित्य का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य को भीतर से समृद्ध करना है, न कि केवल क्षणिक मनोरंजन प्रदान करना। आज का साहित्य स्थायी मानवीय मूल्यों का वाहक बने, यही समाज का उद्देश्य होना चाहिए और वर्तमान साहित्य की सार्थकता भी इसी में है।
समकालीन साहित्य में सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण पायी गई है। इंस्टैंट साहित्य, वायरल कविताएँ और त्वरित प्रसिद्धि ने साहित्यिक प्रक्रिया को सरल-सुलभ तो बनाया है, परंतु उसकी गंभीरता को भी प्रभावित किया है। आज लेखक के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह लोकप्रियता और प्रामाणिकता के बीच संतुलन कैसे स्थापित करे। यदि साहित्य केवल “लाइक” और “फॉलोअर” की संस्कृति तक सीमित हो जाए, तो उसकी आत्मा क्षीण हो जाएगी। इसलिए भारतीय परिवेश में सांस्कृतिक और साहित्यिक चेतना को तभी बचाया जा सकता है जब उसे साहित्य बाज़ार की अंधी प्रतिस्पर्धा से स्वयं को पूरी तरह नियंत्रित न होने दिया जाए।
हालाँकि यह भी सत्य है कि बाज़ार को पूर्णतः नकारा नहीं जा सकता। किसी भी साहित्यिक कृति को पाठकों तक पहुँचाने के लिए प्रकाशन, वितरण और प्रचार आवश्यक हैं। आर्थिक संरचना के बिना साहित्य का व्यापक प्रसार कठिन है। इसलिए समस्या बाज़ार के अस्तित्व में नहीं, बल्कि उसके वर्चस्व में है। जब लाभ की मानसिकता साहित्यिक गुणवत्ता पर हावी हो जाती है, तब संकट उत्पन्न होता है। यही कारण है कि आज प्रकाशकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाती है। उन्हें केवल लाभ अर्जित करने वाले व्यवसायी के रूप में नहीं, बल्कि सांस्कृतिक उत्तरदायित्व निभाने वाले माध्यम के रूप में कार्य करना होगा।
प्रकाशकों को यह समझना होगा कि साहित्य समाज की वैचारिक पूँजी है। यदि वे केवल बिकाऊ सामग्री को बढ़ावा देंगे, तो गंभीर चिंतन, वैचारिक गहराई और सामाजिक सरोकारों से युक्त साहित्य धीरे-धीरे समाप्त हो जाएगा। साहित्य की आत्मा को बाज़ार की वस्तु नहीं बनाया जा सकता है, जो प्राय: हो रहा है। अतः गुणवत्ता, भाषा की गरिमा और सामाजिक प्रतिबद्धता को प्राथमिकता देना समय की माँग है।
लेखकों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है। साहित्यकार समाज का संवेदनशील प्रहरी होता है। यदि वह स्वयं लोकप्रियता और आर्थिक लाभ के लिए अपने मूल्यों से समझौता करने लगे, तो साहित्य की नैतिक शक्ति समाप्त हो जाएगी। लेखक यदि बाज़ारवादी प्रवृत्तियों के प्रति तटस्थ रहेगा, तो वह भी इस सांस्कृतिक अवमूल्यन का सहभागी माना जाएगा।
समकालीन भारतीय साहित्य में कुछ लेखक ऐसे भी हैं जिन्होंने लोकप्रियता और गंभीरता के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है। उन्होंने यह सिद्ध किया है कि साहित्य जनसुलभ होते हुए भी वैचारिक और संवेदनात्मक रूप से समृद्ध हो सकता है। यही संतुलन साहित्य की वास्तविक शक्ति है। साहित्य को न तो केवल बौद्धिक अभिजात्य का माध्यम बनना चाहिए और न ही मात्र उपभोक्तावादी मनोरंजन का साधन।
इस पूरे विमर्श में पाठकों की भूमिका भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। साहित्य केवल लेखक और प्रकाशक के प्रयासों से जीवित नहीं रहता; उसकी आत्मा पाठकों की चेतना में बसती है। यदि पाठक केवल हल्के और तात्कालिक मनोरंजन की ओर आकर्षित होंगे, तो गंभीर साहित्य स्वाभाविक रूप से कमजोर पड़ेगा। इसलिए समाज को पुनः पढ़ने की संस्कृति विकसित करनी होगी। नई पीढ़ी को यह समझना होगा कि साहित्य केवल परीक्षा या मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि आत्मचिंतन और सामाजिक जागरूकता का साधन है। जब पाठक गंभीर साहित्य की ओर लौटेंगे, तभी साहित्यिक गुणवत्ता को वास्तविक प्रोत्साहन मिलेगा। अन्यथा बाज़ार वही प्रस्तुत करेगा जिसकी माँग अधिक होगी।
अंततः साहित्य और बाज़ार के बीच संघर्ष का समाधान किसी एक पक्ष की विजय में नहीं, बल्कि संतुलन में निहित है। बाज़ार साहित्य के प्रसार का माध्यम बने, उसका नियंत्रक नहीं। साहित्य को आर्थिक संरचना की आवश्यकता है, किंतु उसकी आत्मा मानवीय मूल्यों, संवेदनाओं और सामाजिक प्रतिबद्धता में ही निहित है। यदि साहित्य अपनी नैतिक चेतना खो देगा, तो समाज भी अपनी दिशा खो देगा।
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