दिसंबर, 2025

गुरुग्राम, हरियाणा
मित्रों! कहा जाता है कि हम निरंतर प्रगति के पथ पर हैं। दुनिया तेजी से आगे बढ़ रही है परंतु क्या कारण है कि इस प्रगति के साथ-साथ हत्या, आत्महत्या, तनाव, अवसाद की घटनाएं भी बढ़ रही हैं? दुनिया की नज़र में सफल कहलाने वाले व्यक्ति, स्वयं अपने जीवन का अंत कर रहे हैं। इसका मुख्य कारण है कि हम अपने जीवन में संतुलन नहीं रख पाते।
आज प्रत्येक व्यक्ति अपने किसी-न-किसी लक्ष्य की ओर भाग रहा है। कभी सफलता, कभी मान-सम्मान और कभी उस भविष्य की ओर जिसे वह अपने प्रियजनों के लिए सुरक्षित बनाना चाहता है। यह दौड़ मानव जीवन का स्वभाविक हिस्सा है। दौड़ आवश्यक है। दौड़ आपको आगे पहुंचा सकती है लेकिन यह तभी संभव है जब आपके भीतर संयम और शांति हो।
ऐसा न हो कि आप अपने करियर की सीढ़ियों चढ़ते जाए परंतु आपके अपने पीछे छूट जाए। उनकी पुकार भी आप तक न पहुँच पाए। महाराष्ट्र के एक शहर में एक बेटे को भारत में रह रही अपनी माँ की मृत्यु के विषय में एक वर्ष बाद पता चला। बेटा विदेश की चकाचौंध, अपनी सुख सुविधाओं और विदेशी पत्नी के साथ इतना मस्त हो गया कि विधवा और अकेलेपन से जूझ रही माँ की कुशलक्षेम जानने का उसके पास समय ही नहीं था। यहाँ तक कि उसने अपना फ़ोन नंबर और कंपनी भी बदल ली और माँ को सूचित करने की आवश्यकता भी नहीं समझी।
सफलता के पीछे भागते-भागते हम अक्सर भूल जाते हैं कि जीवन का असली मूल्य गति में नहीं, संतुलित में है। जीवन रूपी तराज़ू का पलड़ा एक तरफ झुका रहे तो यह सफलता नहीं कहलाती। यह सच है कि परिश्रम, संघर्ष एवं निरंतर प्रयास ही प्रगति का मूल आधार हैं लेकिन समस्या तब होती है, जब हम इस अंधी दौड़ को अपने जीवन का उद्देश्य समझ बैठते हैं और निरंतर भागते ही रहते हैं।
नवतकनीक, दुनिया और प्रगति के बढ़ते सुअवसरों को देखते हुए यह बात भी सत्य है कि इस दौड़ को कोई रोक नहीं सकता। लेकिन इस दौड़ का हिस्सा बनी युवा पीढ़ी को मैं कहना चाहूंगी कि यह चुनना तो उनके हाथ में है कि वह कितना दौड़ें और किस गति से दौड़े।
हर जीत के पीछे किसी अपने का त्याग एवं सहयोग भी अवश्य होता है। माता-पिता अपनी जगह बच्चों के सपनों को प्राथमिकता देते हैं। सपनों के साकार होने पर बच्चे अपनों के इस त्याग और सहयोग को न भूलें। उनकी संवेदनशीलता बनी रहे, यह कृतज्ञता का भाव हम अपनी भावी पीढ़ी को विरासत में दे सके तो यह हमारी बहुत बड़ी उपलब्धि होगी।
जीवन की हर दौड़ में जीत मिले, यह आवश्यक नहीं है। इस दौड़ में यदि गिर भी पड़े तो नई उम्मीद के साथ उठकर, फिर दौड़ना भी जरूरी है। धैर्य और आशा रूपी गुण भी व्यक्तिगत विकास के लिए आवश्यक हैं।
राजस्थान के कोटा शहर में हजारों छात्र-छात्राएं प्रतियोगिता परीक्षाओं के लिए कोचिंग करने जाते हैं। उनमें से अनेक छात्रों की परीक्षा में असफल होने पर फांसी के फंदे को गले लगा, जान देने की हृदय विदारक दुर्घटनाएं सुनने को मिलती हैं। संघर्षों के बीच जीवन में संयम, संतुलन और धैर्य भी आवश्यक हैं। सफलता की सीढ़ियाँ चढ़ते हुए रास्ते में मिलने वाले तनाव एवं दबाव आपका मानसिक संतुलन न बिगाड़ पाए, यह जानना और सीखना भी बहुत आवश्यक है।
अविवेकशील दौड़ एवं उद्देश्यहीन गति अंत में थकान और निराशा ही देती है जबकि नियंत्रित गति जीवन में सफलता का आनंद देती है। आज जिन वैश्विक संघर्षों तथा शक्ति संघर्षों में मानवता उलझी है उसे संतुलन एवं संवेदनशीलता ही बचा सकती है।
हम बचपन से सुनते आए हैं कि परिश्रम सफलता की कुंजी है परंतु इस कुंजी को सही ताले में डालने का काम आपका विवेक ही करता है। विवेक का दामन ना छोड़ने वाला कभी असंतुलित नहीं रहता। वह अपनी विभिन्न भूमिकाओ के साथ न्याय कर पाता है।
अतः जीवन की इस दौड़ में अपने मन की शांति को बचाए रखें। आगे बढ़े परंतु अपने मनुष्य होने की कोमलता को बनाए रखें। अनियंत्रित महत्वकांक्षाओं को अपने जीवन का संतुलन न बिगाड़ने दें।
