शब्दों के उस पार

सितंबर 2026

कल्पना झा 'कीर्ति'
कल्पना झा ‘कीर्ति’
रोहिणी, उत्तर-पश्चिम दिल्ली

आज की दुनिया बहुत तेज़ी से बदल रही है। तकनीक ने जीवन को सरल, सुविधाजनक और गतिशील बनाया है। मोबाइल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और डिजिटल माध्यमों ने न केवल हमारे रहन-सहन को बदला है, बल्कि हमारी भाषा और संवाद करने के तरीके को भी गहराई से प्रभावित किया है।
नई पीढ़ी की बातचीत में हिंदी के साथ अंग्रेज़ी के शब्दों का सहज प्रयोग, छोटे-छोटे वाक्य, इमोजी, संदेश और संक्षिप्त अभिव्यक्तियाँ सामान्य हो गई हैं। यह बदलाव स्वाभाविक है, क्योंकि भाषा समय के साथ निरंतर बदलती रहती है। किंतु प्रश्न यह है कि क्या शब्दों के बदलने के साथ हमारी संवेदनाएँ भी बदल रही हैं? क्या हमारी भावनाएँ भी बदल रही हैं?


इसी प्रश्न के साथ, इस कहानी के माध्यम से एक माँ और उसके बेटे के संबंधों को दर्शाया गया है।
“माँ, कृपया! आप मेरी ज़िंदगी को इतना जटिल मत कीजिए।” आर्यन ने झुंझलाकर अपना मोबाइल मेज़ पर रख दिया।
सामने बैठी उसकी माँ कुछ क्षण उसे देखती रहीं। वह कुछ कहना चाहती थीं, पर शब्द जैसे गले में अटक गए हों।
“ठीक है,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा— “अब मैं कुछ नहीं कहूँगी।”
आर्यन अपने कमरे में चला गया। घर में फिर वही खामोशी उतर आई, जो पिछले कुछ महीनों से धीरे-धीरे गहराती जा रही थी।
आर्यन पढ़ाई के लिए दूसरे शहर में रहता था। आधुनिक जीवन की भागदौड़ में वह पूरी तरह व्यस्त हो चुका था। कॉलेज, मित्र, प्रोजेक्ट, सोशल मीडिया और मोबाइल—इन सबने उसकी दिनचर्या को घेर रखा था। जब वह घर आता तो कानों में ईयरफोन, हाथ में मोबाइल और आँखें हमेशा किसी न किसी स्क्रीन पर टिके रहतीं।
माँ उससे कुछ पूछतीं तो उत्तर मिलता— “हाँ”, “नहीं”, “ठीक है”, “बाद में”, “चिंता मत कीजिए।”
माँ को लगता कि उनका बेटा बहुत बदल गया है। उन्हें उसकी भाषा भी बदलती हुई दिखाई देती थी। कभी वह कहता— “मॉम, मैं बहुत बिज़ी हूँ।” कभी— “प्लीज़, मुझे स्पेस चाहिए।” कभी— “डोंट वरी, मैं मैनेज कर लूँगा।”
माँ इन शब्दों के शाब्दिक अर्थ तो समझती थीं, लेकिन उन शब्दों के पीछे छिपे भावों को समझ नहीं पाती थीं। उन्हें लगता था कि बेटा उनके सामने होते हुए भी उनसे बहुत दूर चला गया है।
एक दिन माँ उसके कमरे की सफ़ाई कर रही थीं। किताबों और पुराने कागज़ों के बीच उन्हें आर्यन के बचपन की एक कॉपी मिली। उन्होंने उत्सुकतावश कॉपी खोली। पहले पन्ने पर आर्यन की टेढ़ी-मेढ़ी लिखावट में लिखा था—
“मेरी माँ दुनिया की सबसे अच्छी माँ हैं।”
माँ के चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान आ गई। उनकी आँखों के सामने आर्यन का बचपन घूम गया। यही आर्यन कभी स्कूल से लौटकर बिना रुके पूरे दिन की बातें सुनाया करता था। स्कूल में किसने उसे चिढ़ाया, अध्यापक ने क्या कहा, किस मित्र ने उसकी पेंसिल ले ली—हर छोटी-बड़ी बात माँ को बताना उसके लिए ज़रूरी होता था।
छोटी-सी चोट लगती तो माँ की गोद में सिर रखकर रोता और कहता— “माँ, दर्द हो रहा है।”
माँ उसके सिर पर हाथ फेरकर कहतीं— “कुछ नहीं हुआ, मेरा बेटा ठीक हो जाएगा।”
आज वही बेटा बड़ा हो गया था। उसके पास दुनिया से बात करने के लिए अनेक माध्यम थे, हज़ारों शब्द थे, सैकड़ों संपर्क थे; लेकिन माँ से बात करने के लिए उसके पास समय नहीं था।
माँ ने कॉपी बंद कर दी। उन्होंने सोचा— “क्या आधुनिकता का अर्थ यही है कि हम अपने सबसे निकट के लोगों से संवाद करना भूल जाएँ?”
कुछ दिनों बाद माँ अचानक बीमार पड़ गईं। आर्यन को उसकी बहन ने फोन किया— “भैया, माँ की तबीयत ठीक नहीं है। वे बहुत बीमार हैं, उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया है।”
यह सुनते ही आर्यन के चेहरे का रंग उड़ गया। जिस मोबाइल में वह घंटों व्यस्त रहता था, उसी मोबाइल ने उस दिन उसे भीतर तक हिला दिया। उसने तुरंत टिकट बुक किया और रातों-रात घर पहुँच गया।
माँ अस्पताल में थीं। आर्यन धीरे से उनके पास जाकर बैठ गया। माँ ने आँखें खोलीं और उसे देखकर धीमे से पूछा— “आ गए?”
आर्यन ने उनका हाथ पकड़ लिया। उसकी आँखें नम हो रही थीं। “हाँ, माँ,” उसने कहा।
कुछ देर दोनों चुप रहे। आर्यन की आँखों से आँसू बह निकले। उसके मन में पिछले कई महीनों की सारी बातें घूमने लगीं—माँ का बार-बार फोन करना, उसका फोन काट देना, माँ का पूछना कि उसने खाना खाया या नहीं और उसका झुंझलाकर कहना— “माँ, मैं बच्चा नहीं हूँ।”
उसने धीरे से पूछा— “माँ, मैं आपसे ठीक से बात क्यों नहीं कर पाता था?”
माँ ने हल्की मुस्कान के साथ कहा— “तुम्हारी भाषा मुझे पूरी तरह समझ नहीं आती थी, बेटा।”
आर्यन चौंक गया— “मेरी भाषा?”
“हाँ,” माँ बोलीं— “तुम कहते थे— ‘चिंता मत कीजिए’, ‘मैं व्यस्त हूँ’, ‘ध्यान रखिए’—लेकिन माँ तो बस यह सुनना चाहती है— ‘माँ, मैं आपके साथ हूँ।’”
आर्यन का सिर झुक गया।
माँ ने आगे कहा— “बेटा, मुझे तुम्हारे नए शब्दों से कोई शिकायत नहीं है। समय बदलता है तो भाषा भी बदलती है। तुम अंग्रेज़ी बोलो, नए शब्द इस्तेमाल करो, मोबाइल पर संदेश भेजो—मुझे कोई आपत्ति नहीं। लेकिन भाषा चाहे कितनी भी आधुनिक हो जाए, उसमें अपनापन बना रहना चाहिए। शब्द बदलने से कोई रिश्ता नहीं टूटता, लेकिन जब शब्दों से संवेदना निकल जाती है, तब दूरी पैदा हो जाती है।”
आर्यन की आँखें भर आईं। उसने माँ का हाथ अपने दोनों हाथों में थाम लिया और कहा— “माँ, अब मैं आपकी भाषा सीखूँगा।”
माँ मुस्कुराईं और बोलीं— “और वह भाषा क्या है?”
आर्यन ने कुछ क्षण सोचा, फिर बहुत धीरे से बोला— “समय की भाषा… अपनत्व की भाषा… सम्मान की भाषा… और शायद बिना कहे समझ लेने की भाषा।”
माँ की आँखों से भी आँसुओं की धारा बहने लगी।
अस्पताल से लौटने के बाद आर्यन कुछ दिनों तक घर पर रहा। उसने पहली बार महसूस किया कि घर में बैठकर परिवार के साथ भोजन करना भी किसी बड़ी उपलब्धि से कम नहीं है। माँ के साथ चाय पीना, उनके पुराने किस्से सुनना और पिता की पुरानी तस्वीरों को देखना—इन सबमें उसे एक ऐसी शांति मिली, जो उसे सोशल मीडिया की आभासी दुनिया में कभी नहीं मिलती थी।
कुछ दिनों बाद आर्यन वापस शहर चला गया। लेकिन इस बार जाते समय उसने माँ से कहा— “माँ, मैं अब से रोज़ फोन करूँगा।”
माँ हल्के से मुस्कुरा दीं— “रोज़? देखूँगी।”
आर्यन ने आत्मविश्वास से कहा— “इस बार केवल कहूँगा नहीं, निभाऊँगा भी।”
पूरे रास्ते आर्यन बीते दिनों की स्मृतियों में खोया रहा। उस दिन के बाद से आर्यन के फोन नियमित आने लगे। कभी पाँच मिनट, तो कभी आधा घंटा। वह माँ को अपने कॉलेज की बातें बताता और माँ उसे घर की छोटी-छोटी ख़बरें सुनातीं।
कभी माँ कहतीं— “आज तुम्हारे पापा ने तुम्हारी पुरानी किताब निकाली।”
कभी आर्यन कहता— “माँ, आज कॉलेज में बहुत अच्छा कार्यक्रम हुआ।”
धीरे-धीरे उनके बीच पुराना संवाद फिर से लौटने लगा।
एक दिन माँ ने हँसते हुए पूछा— “बेटा, तुम्हारी पीढ़ी की भाषा में माँ के लिए क्या शब्द है?”
आर्यन कुछ क्षण मौन रहा। फिर बोला— “माँ तो माँ ही होती है। उसके लिए कोई नया शब्द हो ही नहीं सकता।”
फोन के उस पार माँ कुछ क्षण चुप रहीं। लेकिन इस चुप्पी में इस बार दूरी नहीं थी; वहाँ एक संपूर्ण संवाद था—एक ऐसी भाषा का संवाद, जिसके लिए न अंग्रेज़ी की आवश्यकता थी, न कठिन हिंदी की, न ही किसी इमोजी की।
वह भाषा थी— “ममता की।”
निष्कर्ष
नई पीढ़ी की भाषा बदल रही है और बदलना स्वाभाविक भी है। भाषा में नए शब्दों का आना समाज के विकास और समय के परिवर्तन का संकेत है। समस्या नए शब्दों से नहीं, बल्कि तब उत्पन्न होती है जब भाषा से संवेदना, सम्मान और आत्मीयता समाप्त होने लगे।
नई पीढ़ी को पुरानी भाषा के प्रत्येक शब्द को ज्यों का त्यों अपनाने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन उसे उन शब्दों के पीछे छिपे संस्कार और भाव अवश्य समझने चाहिए। क्योंकि—
“भाषा केवल बोलने का माध्यम नहीं, बल्कि संबंधों को जोड़ने का सेतु है।”
समय बदलता है, शब्द बदलते हैं, भाषा बदलती है—लेकिन रिश्तों की वास्तविक भाषा वही रहती है, जिसमें एक मनुष्य दूसरे मनुष्य को सच में महसूस कर सके। और शायद यही नई पीढ़ी की सबसे सुंदर भाषा हो सकती है— “आधुनिक शब्दों के साथ पुरानी संवेदनाओं का मेल।”

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