नन्ही प्रीति का साहस (वीर बालक)

सितंबर 2026

रजनीकान्त शुक्ल
रजनीकान्त शुक्ल, गाजियाबाद, उत्तर प्रदेश

प्रीति की उम्र अभी सिर्फ दस साल ही थी मगर वह अपनी माँ के काम में पूरा हाथ बँटाती थी। उसका घर मणिपुर की राजधानी इम्फाल में था। उसकी माँ भी बहुत मेहनती थी। वे घर की तो जिम्मेदारी सँभालती ही थीं उसके बाद इम्फाल के बाजार में दुकान भी चलाती थीं। उनकी किराने के सामान की दुकान बाजार के बीच में थी। प्रीति अपनी मम्मी के साथ दुकान पर जाती और दुकानदारी में उनका हाथ बँटाती थी।

अक्सर जब उसकी मम्मी दुकान में सामान खत्म होने पर थोक दुकान से अपनी दुकान के लिए और सामान लेने जाती तो वह पूरी जिम्मेदारी से दुकान को चलाती थी। समय और परिस्थितियों ने उसे वक्त से पहले समझदार बना दिया था। सिर्फ दस साल की उम्र होती ही क्या है? पाँच साल में बच्चे को पहली कक्षा में दाखिला मिलता है। इस तरह से दस साल का बच्चा पाँचवीं या छठी कक्षा का छात्र होता है।

मगर उन जैसे सभी बच्चों से कहीं ज्यादा समझदार थी मायबम प्रीति देवी। इस बात को साबित करती है वह घटना जो तीस मार्च 2009 को इम्फाल बाजार में घटी थी, जिसने सारे देश के सामने प्रीति के नाम को ला दिया। इम्फाल के एक छोटे से बाजार से निकलकर प्रीति को देश की राजधानी दिल्ली के राजपथ पर बैठा दिया।

उस दिन प्रीति अपनी माँ हेमावती देवी के साथ दुकान में थी। उनकी दुकान मयांग बाजार में थी और उस मयांग बाजार में कोई भी पक्की दुकान नहीं थी। सारी दुकानें लकड़ी की बनी हुई थीं। वह शाम का समय था। तभी एक ग्राहक दुकान में आया। उसने एक बिस्कुट का पैकेट माँगा। प्रीति उसे बिस्कुट का पैकेट देने लगी। मगर जो ब्रांड उसे चाहिए था उसका खुला पैकेट सामने के रखने वाले खाने में नहीं था। वह उसे लेने के लिए अन्दर रखे स्टॉक की ओर गई।

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तभी दो और ग्राहकों ने दुकान में प्रवेश किया। वे अन्दर आए और उन्होंने अपनी जेब से सामान का पर्चा निकाला। वे उस पर्चे में लिखे सामान को प्रीति की दुकान से लेना चाहते थे। उन्होंने वह पर्चा प्रीति की मम्मी हेमावती को दिया। इस बीच प्रीति अन्दर से बिस्कुट का पैकेट ले आई थी। अभी उस ग्राहक ने पैसे देने के लिए अपनी जेब में हाथ डाला ही था।

तभी अचानक बाहर की ओर से बहुत शोर आता सुनाई दिया। शोर इतना तेज था कि उन्हें न चाहते हुए भी उस ओर देखना पड़ा। कई लोग बड़े गुस्से में एक-दूसरे से भिड़े हुए थे। वे आपस में एक-दूसरे को गालियाँ भी दे रहे थे। उनका आपस में किस बात पर झगड़ा हो रहा था इसे कोई समझ नहीं पाया। वे आपस में बेहद उग्र हो रहे थे।

अचानक उनमें से किसी ने दूसरे गुट को लक्ष्य करके कुछ फेंका, जो उसे न लगकर तेजी से प्रीति की दुकान की ओर आया और सीधा अन्दर आकर गिरा। दुकान में खड़े तीनों ग्राहक और प्रीति तथा उसकी मम्मी एक दम से कुछ समझ नहीं पाए।

हेमावती देवी की नज़र उस ओर गई तो उनके होश उड़ गए। वह हथगोला था, जो दुकान में रखे एक गैस सिलेंडर के पास जाकर गिरा था। कुछ भी हो सकता था। हेमा के मुँह से अचानक जोर से निकला—अरे! यह तो बम है, अगर यहाँ फट गया तो गजब हो जाएगा।

स्थिति की गम्भीरता को समझते हुए प्रीति आगे बढ़ी और उसने फुर्ती से उस हथगोला को उठाया और दुकान से बाहर की ओर भागी। तीनों ग्राहक तो इसके पहले ही हेमावती की ‘बम’ कहने की आवाज और सामने सिलेंडर को रखे देख सिर पर पैर रखकर भाग चुके थे।

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प्रीति ने दुकान से निकलकर बाहर की ओर कुछ दूरी पर जाकर उसे फेंक दिया। जमीन पर गिरते ही हथगोला बड़े जोर की आवाज करता हुआ फट गया। इस धमाके से पूरा बाजार दहल गया। इस विस्फोट के टुकड़े दूर-दूर तक फैल गए और इसकी चपेट में आकर करीब आठ लोग मामूली रूप से घायल हो गए। प्रीति के भी बाएं पैर में चोट आई।

कुछ ही देर में पूरे इलाके को पुलिस कमांडो और सेना ने घेर लिया। तहकीकात करने पर सारी जानकारी सामने आई। निसंदेह अगर वह हथगोला दुकान में भरे रखे उस सिलेंडर के पास फटा होता, तो इसके भीषणता का अनुमान लगाया जा सकता है कि इससे कितनी जान और माल का नुकसान हो सकता था।

पुलिस और सेना के जवानों को नन्हीं प्रीति के साहस को देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने बहादुर प्रीति की बहुत प्रशंसा की और उसके लिए वीरता पुरस्कार की सिफारिश की। प्रीति को वर्ष 2009 का राष्ट्रीय बाल वीरता पुरस्कार देश के प्रधानमंत्री जी द्वारा दिया गया।

नन्हे दोस्तों—

दिखने में हम लगें जरा से, है हममें अकूत बल, रोक सके ना राह हमारी अग्नि समीर और जल। हमें बाँध सकते दुनिया में, हैं बस प्रेम के धागे, यही शक्ति जो हमको तुमको रक्खे सबसे आगे!

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