दिसंबर, 2023
बबीता झा
एक कमरे में चार दिये जल रहे थे। उस समय परिवार का कोई भी सदस्य कमरे में उपस्थित नहीं था। घर के सभी सदस्य अक्सर आपस में लड़ते-झगड़ते रहते थे। उस दिन भी एक बड़ी बहस के बाद सभी अत्यंत क्रोधित थे और कोई किसी से बात नहीं कर रहा था। घर का ऐसा अशांत और तनावपूर्ण वातावरण देखकर दीयों को बहुत दुख हुआ, वे सभी उदास थीं।
शांति का दीया: पहली दीया बोली, “मैं शांति हूँ। इस घर में शांति की अब किसी को कोई आवश्यकता नहीं रह गई है, इसलिए अब मेरा यहाँ बने रहना व्यर्थ है।” इतना कहकर वह दीया बुझ गई।
विश्वास का दीया: दूसरी दीया भी बहुत दुखी थी। उसने कहा, “मैं विश्वास हूँ। इस घर में सभी एक-दूसरे पर क्रोध और संदेह करते हैं, किसी को किसी पर रत्ती भर भी भरोसा नहीं है। अब यहाँ मेरा क्या काम?” ऐसा कहते हुए विश्वास की दीया भी बुझ गई।
प्रेम का दीया: दो दीयों के बुझ जाने से कमरे में उजाला बहुत कम हो गया था। शांति और विश्वास के चले जाने से प्रेम की दीया और भी अधिक व्यथित हो गई। वह बोली, “जहाँ शांति और विश्वास ही न हों, वहाँ प्रेम का क्या अस्तित्व?” इतना कहकर वह भी बुझ गई।
तीनों दीयों के बुझने से कमरे में अंधकार गहरा गया। किंतु चौथी दीया—जिसका नाम आशा था—वह अभी भी निरंतर जल रही थी। उसे दृढ़ विश्वास था कि एक न एक दिन इस घर में सब कुछ ठीक हो जाएगा और परिवार के सभी सदस्य पुनः प्रेमपूर्वक और खुशी से रहेंगे।
यद्यपि वह अकेली दीया पूरे कमरे को पूर्णतः रोशन नहीं कर पा रही थी, फिर भी टिमटिमाते हुए ही सही, उसने अंधकार को रोक रखा था।
तभी घर का एक छोटा बच्चा दौड़ता हुआ कमरे में आया। उसने देखा कि कमरे में लगभग अँधेरा है और केवल एक ही दीया टिमटिमा रहा है। बच्चे को तुरंत बोध हुआ कि यद्यपि इस अकेले दीये का प्रकाश पूरे कमरे के लिए पर्याप्त नहीं है, किंतु इस दीये की लौ से बुझे हुए बाकी दीयों को पुनः प्रज्वलित किया जा सकता है। उस निष्पाप बच्चे ने आशा के उसी दीये से शांति, विश्वास और प्रेम के दीयों को एक-एक करके फिर से जला दिया। देखते ही देखते पूरा कमरा पुनः प्रकाश और सकारात्मकता से जगमगा उठा।
