दिसंबर, 2023

भारत विश्व की सबसे प्राचीन और समृद्ध सांस्कृतिक नींव पर खड़ा देश है। किंतु आज हमारे समाज का यथार्थ दोहरे चरित्र को प्रदर्शित करता है—एक ओर जहाँ कन्या पूजन होता है, वहीं दूसरी ओर कन्या भ्रूण हत्या जैसी कुरीतियाँ भी दिखाई देती हैं। यहाँ नारियों को ‘देवी’ मानकर पूजने की परंपरा भी है और दुर्भाग्यवश उनका अनादर तथा उत्पीड़न भी होता है।
सांस्कृतिक आदर्श: पितृभक्ति का गौरवशाली इतिहास
हमारी संस्कृति में माता-पिता की आज्ञा और सेवा को सर्वोच्च स्थान दिया गया है:
श्रीराम का त्याग: भगवान श्रीराम अपने पिता राजा दशरथ के वचन और आज्ञा का पालन करने के लिए सहर्ष १४ वर्षों के वनवास पर चले गए। उनके साथ भ्राता लक्ष्मण और माता सीता ने भी इस त्याग पथ को अपनाया।
श्रवण कुमार की पितृभक्ति: श्रवण कुमार के माता-पिता दृष्टिहीन थे। वे उन्हें काँवड़ में बिठाकर स्वयं अपने कंधों पर उठाकर भारत के तीर्थ स्थलों की यात्रा कराते थे। एक दिन जब वे नदी तट पर जल भर रहे थे, तब अयोध्या के राजकुमार दशरथ का शब्दवेधी बाण भूलवश उन्हें लग गया। अपने अंतिम क्षणों में भी श्रवण कुमार ने केवल अपने प्यासे माता-पिता की चिंता व्यक्त की।
श्रीराम का वनगमन हो या श्रवण कुमार का चरित्र—दोनों ही कथाएँ अनन्य पितृप्रेम और कर्तव्यों के निर्वहन की प्रेरणा देती हैं।
कलियुग का प्रभाव और एकल परिवारों का संकट
आज के समय में सामाजिक और पारिवारिक मूल्यों का क्षरण स्पष्ट दिखाई देता है:
बुजुर्गों की अवहेलना: घरों में बड़े-बुजुर्गों को वह सम्मान नहीं मिल पा रहा है जिसके वे हकदार हैं। इस उपेक्षा के कारण ही आज हमारे देश में मजबूरीवश वृद्धाश्रम (Old Age Homes) खोलने पड़ रहे हैं।
पारिवारिक ढाँचे में बदलाव: जहाँ कभी “यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः” का आदर्श वाक्य गूँजता था, वहाँ आज नारियों और बुजुर्गों दोनों के सम्मान में कमी आई है।
रोज़गार और एकाकीपन: एक ओर देश विकास पथ पर अग्रसर है, वहीं पाश्चात्य संस्कृति के प्रभाव से बड़े (संयुक्त) परिवारों की अवधारणा समाप्त हो रही है। आधुनिक युग में पति-पत्नी दोनों ही कामकाजी हैं। ऐसे में दिनभर घर पर वृद्धजन अकेले रह जाते हैं, जो उन्हें मानसिक रूप से अवसाद और एकाकीपन की ओर धकेलता है।
एक नवीन और व्यावहारिक विचार: डे-केयर सेंटर (दिनकालीन केंद्र)
वृद्धाश्रमों को पूर्णतः अपनाने के बजाय अब एक नया और सकारात्मक विचार उभरकर सामने आया है—वृद्धजनों का दिनकालीन केंद्र (Day-Care Center)।
जिस प्रकार बच्चे सुबह स्कूल जाते हैं और शाम को घर लौट आते हैं, ठीक उसी तरह वृद्धजन दिन में अपने समवयस्कों (साथियों) के केंद्र में जाएँ। वहाँ वे अपनी उम्र के लोगों के साथ बातचीत करें, विचार साझा करें और शाम को पुनः अपने परिवार के बीच अपने घर लौट आएँ। इससे वृद्धों का आत्मसम्मान भी सुरक्षित रहता है, एकाकीपन भी दूर होता है और परिवार के साथ उनका जुड़ाव भी बना रहता है।
वृद्धाश्रम: एक लाचारी या आवश्यकता?
वृद्धाश्रम निसंदेह हमारी महान संस्कृति के माथे पर एक काला धब्बा प्रतीत होते हैं, किंतु आधुनिक जीवनशैली और परिस्थितियों के कारण यह कई लोगों की मजबूरी बन चुका है।
प्राचीन वानप्रस्थ बनाम आधुनिक वृद्धाश्रम: प्राचीन काल में लोग अपनी इच्छा से आध्यात्मिक शांति हेतु वानप्रस्थ आश्रम स्वीकार करते थे, किंतु आज वृद्धजन अपनों के दुर्व्यवहार या लाचारी के कारण विवश होकर वृद्धाश्रम जाते हैं।
सकारात्मक पक्ष: इस मजबूरी का एक व्यावहारिक पक्ष यह भी है कि यहाँ बुजुर्गों को समान आयु, समान विचारधारा और समान मनोभाव वाले साथी मिल जाते हैं, जिससे उनकी हताशा कुछ कम होती है।
समाधान: सुखद वृद्धावस्था हेतु व्यावहारिक सुझाव
वृद्धावस्था को बोझ बनने से रोकने और जीवन को आनंदमय बनाने के लिए व्यक्ति को स्वयं भी मानसिक रूप से तैयार रहना चाहिए:
समवयस्कों से संपर्क: वृद्धावस्था आने से पूर्व ही अपने हमउम्र मित्रों और रिश्तेदारों से संपर्क बनाए रखें। महीने में कम से कम एक-दो बार फोन पर वार्तालाप करें और हाल-चाल जानते रहें।
समान अभिरुचि (Hobbies) वाले समूह: पुस्तकें पढ़ने, भ्रमण करने, संगीत, चित्रकला या अन्य ललित कलाओं में समान रुचि रखने वाले लोगों के साथ छोटे-छोटे समूह (Clubs) बनाएँ।
सामाजिक दायित्व: यद्यपि वृद्धाश्रमों की आवश्यकता जितनी कम हो उतना ही समाज के लिए अच्छा है, किंतु जहाँ ये चल रहे हैं, वहाँ समाज के सभ्य और सक्षम नागरिकों को अपना कर्तव्य समझते हुए तन, मन और धन से यथाशक्ति सहयोग प्रदान करना चाहिए।
