दिसंबर, 2023

शिवपुरी, मुरादाबाद, उ.प्र., यूट्यूब चैनल- योग, साहित्य, संस्कृति।
वर्तमान में गाँव तीव्र गति से शहरों में परिवर्तित हो रहे हैं और शहर महानगरों (मेट्रो सिटी) में। पश्चिमी सभ्यता का प्रभाव हमारी युवा पीढ़ी पर सिर चढ़कर बोल रहा है। इसके परिणामस्वरूप हमारी सनातन भारतीय संस्कृति हिचकोले खा रही है और अपनी अंतिम साँसें गिनती प्रतीत हो रही है। युवा पीढ़ी की सोच, चिंतन और जीवनशैली में पूर्णतः बदलाव आ चुका है। एकल परिवारों की संस्कृति ने समाज में पूरी तरह पाँव जमा लिए हैं और संयुक्त परिवार टूट रहे हैं। ऐसी स्थिति में वृद्ध माता-पिता स्वयं को छला हुआ और असहाय महसूस कर रहे हैं कि वे आखिर जाएँ तो कहाँ जाएँ?
फादर्स डे और मदर्स डे का बढ़ता चलन
पाश्चात्य संस्कृति युवा पीढ़ी पर इस कदर हावी है कि उन्होंने पश्चिम की तर्ज़ पर ‘फादर्स डे’ और ‘मदर्स डे’ जैसे दिवस मनाना प्रारंभ कर दिया है। सोशल मीडिया पर माता-पिता के चित्र साझा कर औपचारिक शुभकामनाओं और बधाइयों का तांता लग जाता है।
जिन संतानों में थोड़ा-सा ममत्व शेष है, वे वर्ष में एक-दो बार इस दिन माता-पिता के पास जाकर या उन्हें अपने पास बुलाकर इस ‘पर्व’ को मना लेते हैं। वहीं अधिकांश युवा पीढ़ी केवल मोबाइल पर संदेश भेजकर अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर लेती है, जबकि कुछ तो यह औपचारिकता भी पूरी नहीं करते।
बुजुर्गों के प्रति बहुओं का अविश्वास और स्वछंदता
आज स्वयं को शिक्षित कहने वाली कई युवतियाँ विवाह से पूर्व ही यह मानकर चलती हैं कि वे विवाह के उपरांत अपने पति के साथ पूर्ण स्वतंत्रता (स्वछंदता) से अकेली ही रहेंगी। उन्हें जीवन में किसी का हस्तक्षेप स्वीकार्य नहीं होता। यही स्वछंदवादी सोच उन्हें पृथक परिवार बसाने के लिए प्रेरित करती है।
ऐसी सोच रखने वाली नारियाँ साम, दाम, दंड और भेद की नीति अपनाकर पति को पृथक (एकल) परिवार बनाने पर विवश कर देती हैं। विवश पति पारिवारिक कलह और विघटन से बचने के लिए जिद्दी पत्नी के समक्ष समर्पण कर देता है। यहाँ तक कि वृद्ध माता-पिता भी अपने बेटे के गृहस्थ जीवन को बचाने हेतु स्वयं ही चुपचाप अलग होना स्वीकार कर लेते हैं।
इसके अतिरिक्त, कुछ बहुओं को अपने सास-ससुर पर केवल इसलिए भरोसा नहीं होता क्योंकि वे कम पढ़े-लिखे या ग्रामीण परिवेश से होते हैं। उन्हें भय रहता है कि बुजुर्ग उनके बच्चों को पुरानी बातें सिखाएँगे, उनकी मौज-मस्ती व स्वतंत्रता में बाधा डालेंगे और पारिवारिक जीवन में बंधन उत्पन्न करेंगे।
बेटे-बहुओं की व्यावहारिक मजबूरियाँ
यद्यपि समाज में ऐसे बेटे-बहुएँ भी हैं जो अपने माता-पिता को सहर्ष अपने साथ रखना चाहते हैं, किंतु परिस्थितियों के आगे विवश हैं।
कार्यस्थल की सीमाएँ: वे ऐसी स्थानों पर नौकरी करते हैं जहाँ माता-पिता को रखना कठिन होता है।
साधनों का अभाव: मकान अत्यधिक छोटा होना, सीमित आय होना या विदेश में कार्यरत होना।
ऐसी विषम परिस्थितियों में माता-पिता स्वयं भी बच्चों के साथ जाने से बचते हैं ताकि उनकी वजह से संतानों को कोई कष्ट न हो।
वृद्धाश्रमों की बढ़ती संख्या और कटु यथार्थ
देश में वृद्धाश्रमों की निरंतर बढ़ती संख्या इस कटु सत्य को उजागर कर रही है कि वृद्धजन परिवार में मिल रही उपेक्षा और अपमान से टूटकर वहाँ रहने के लिए विवश हो रहे हैं। वृद्धावस्था में जिस सम्मान, सेवा और प्रेम की उन्हें आवश्यकता थी, वह अपनी ही संतानों से प्राप्त नहीं हो पा रहा है।
इसके साथ ही, कुछ बुजुर्गों की मजबूरी यह भी है कि उनका कोई सहारा (बेटा या बेटी) नहीं है। भारतीय सामाजिक व्यवस्था में माता-पिता सामान्यतः केवल बेटी के घर रहना स्वीकार नहीं करते, भले ही कुछ बेटियाँ और दामाद अत्यंत संवेदनशील और सहृदय हों।
हृदयविदारक वास्तविक उदाहरण
केस १ (सेवानिवृत्त प्रोफेसर): एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर जिन्हें डेढ़ लाख रुपये प्रतिमाह पेंशन मिलती है, फिर भी बहू के अनादर और अपमान के कारण उन्हें वृद्धाश्रम में शरण लेनी पड़ी। बेटा विवश है और प्रोफेसर साहब पोते-पोतियों की याद में दिन काट रहे हैं।
केस २ (पूर्व शिक्षक): एक वृद्ध शिक्षक के तीन बेटे और छह पोते-पोतियाँ हैं, किंतु उनका हाल पूछने वाला कोई नहीं। बेटों ने उनका सारा जमा-पूँजी कारोबार में लगवा लिया और सेवानिवृत्ति से पूर्व ही उनकी नौकरी छुड़वा दी। इसके उपरांत तीनों बेटों में से किसी ने उन्हें अपने घर में स्थान नहीं दिया।
केस ३ (पूर्व पुलिसकर्मी): पुलिस विभाग से सेवानिवृत्त एक वृद्ध के दो बेटे हैं। दोनों बेटे और बहुएँ उनके साथ दुर्व्यवहार करते थे तथा मारपीट कर उनकी पेंशन छीन लेते थे। अंततः वे वृद्धाश्रम रहने लगे।
केस ४ (असहाय माँ): एक वृद्धा का बेटा अपनी माँ से अगाध प्रेम करता है और उन्हें साथ रखना चाहता है, किंतु बहू अत्यंत झगड़ालू है। घर और व्यवसाय में दस नौकर-चाकर होने के बावजूद वृद्धा को बहु के दुर्व्यवहार के कारण वृद्धाश्रम में जीवन व्यतीत करना पड़ रहा है।
ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहाँ वृद्धजन असहनीय पीड़ा का घूँट पीकर जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे सोचती हैं कि जिस संतान के उज्ज्वल भविष्य के लिए उन्होंने अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया, आज वही संतान उन्हें विस्मृत कर चुकी है।
वानप्रस्थ आश्रम बनाम वृद्धाश्रम
आर्य समाज के संस्थापक महर्षि दयानंद सरस्वती जी ने वेदों की संस्कृति के आधार पर प्रतिपादित किया था कि मनुष्य को ६० वर्ष की आयु के पश्चात पारिवारिक मोह का त्याग कर वानप्रस्थ आश्रम में प्रवेश करना चाहिए। इस अवस्था में ईश्वर भक्ति, स्वाध्याय और समाज सेवा में मन लगाना चाहिए।
वृद्धाश्रम: यहाँ वृद्धजन मजबूरी, अपमान, हताशा और निराशा के भाव के साथ रहते हैं।
वानप्रस्थ आश्रम: यहाँ व्यक्ति स्वेच्छा, प्रसन्नता और ईश्वर-चिंतन के भाव से रहता है। वे अपने परिजनों से मिलने आते-जाते रहते हैं और मन में कोई घुटन या हीनभावना नहीं होती।
समस्या का मूल कारण और समाधान के उपाय
नगरों में संयुक्त परिवारों के विखंडन का मुख्य कारण स्वार्थपरता, स्थान का अभाव, आधुनिक जीवनशैली और पाश्चात्य संस्कृति का अंधानुकरण है।
सहनशीलता और विनम्रता का ह्रास: युवाओं में सहनशक्ति की कमी और अत्यधिक ‘ईगो’ (अहंकार) के कारण न केवल संयुक्त परिवार टूट रहे हैं, बल्कि दंपतियों में तलाक के मामले भी बढ़ रहे हैं।
मायके का अत्यधिक हस्तक्षेप: विवाहित बेटियों का बात-बात पर मायके (विशेषकर माँ) से फोन पर घंटों परामर्श लेना और माँ द्वारा सही मार्गदर्शन देने के बजाय बेटी को उकसाना भी परिवार टूटने का बड़ा कारण है।
संस्कारहीन शिक्षा प्रणाली: बाल्यकाल में नैतिक शिक्षा का अभाव। पहले विद्यालयों में श्रवण कुमार, बालक ध्रुव, प्रह्लाद, राम, कृष्ण तथा कबीर, तुलसी, सूरदास व मीराबाई की रचनाएँ पाठ्यक्रम का हिस्सा होती थीं, जो बच्चों में संस्कारों का बीजारोपण करती थीं। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर इन्हें हटाए जाने से नैतिक पतन हुआ है।
समाधान एवं भावी दिशा
पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा की पुनर्स्थापना: प्राथमिक स्तर से ही विद्यालयों में नैतिक शिक्षा, पौराणिक एवं प्रेरक कथाओं को पुनः शामिल किया जाए।
दहेज प्रथा एवं खर्चीली शादियों पर रोक: आडंबरयुक्त और खर्चीली शादियाँ परिवार को दरिद्र बनाती हैं। जहाँ लेन-देन और लालच होता है, वहाँ सेवा-भाव समाप्त हो जाता है।
युवा पीढ़ी के लिए आत्मचिंतन: विवाहित युवाओं को यह समझना होगा कि बुढ़ापा एक प्राकृतिक चक्र है, जो उन पर भी आएगा। वे आज अपने माता-पिता के साथ जैसा व्यवहार करेंगे, उनकी संतान भी कल उनके साथ वही दोहराएगी।
माता-पिता द्वारा अच्छे संस्कार देना: केवल धन-संग्रह में न लगकर बच्चों को बुजुर्गों का सम्मान करने की सीख देना अत्यंत आवश्यक है।
संकल्प-गीत:
घर पावन संसार
दिव्य प्रेम परिभाषित होता,
घर पावन संसार।
भारत की माटी में बसता,
मिला-जुला परिवार॥
घर का पूरा आँगन चहके,
चहके है कोना-कोना।
सबके मन भी एक सुमन हैं,
घर लगता चाँदी-सोना॥
चिंतन, चिंता एक सभी की,
पायल खनके प्यार।
दिव्य प्रेम परिभाषित होता,
घर पावन संसार॥
हो अपनत्व भाव हर दिल में,
जीवन नित्य सरसता है।
संपत्ति में हक सबका होता,
स्वर में घुली मधुरता है॥
दादा-दादी, पोता-पोती,
गाएँ गीत मल्हार।
दिव्य प्रेम परिभाषित होता,
घर पावन संसार॥
दृढ़ होती है नींव प्रेम की,
प्राण-प्राण हर्षाता है।
रिश्तों की मजबूत डोर है,
बने सुखों से नाता है॥
घर का मुखिया एक रीढ़ हो,
वही सुखी परिवार।
दिव्य प्रेम परिभाषित होता,
घर पावन संसार॥
ताई-ताऊ, चाची-चाचा,
बहना-भाई हैं मिलते।
बुआ-फूफा, जेठ-जिठानी,
मुन्ना-मुन्नी सब हँसते॥
दृढ़ रिश्तों के पुष्प महकते,
बिखरे हरसिंगार।
दिव्य प्रेम परिभाषित होता,
घर पावन संसार॥
भारत की माटी से जुड़कर,
युग-निर्माण करेंगे हम।
मिल-जुलकर परिवार हँसेगा,
एकल नहीं बनाएँगे हम॥
योग, यज्ञ, प्रातः-वंदन हो,
मिटते हृदय-विकार।
दिव्य प्रेम परिभाषित होता,
घर पावन संसार॥
