बबीता झा
जून, 2024
तरुण एक पारिवारिक व्यक्ति थे। शाम को कार्यस्थल से जल्दी घर लौटना, परिवार के साथ समय बिताना और बच्चों से बातें करना उन्हें प्रिय था। एक दिन वे आते समय जलेबी खरीद लाए और अपनी 6-7 वर्ष की पुत्री स्नेहा को दे दी। स्नेहा ने प्लेट में जलेबी सजाकर माता-पिता और भाई-बहन को दी। सभी बैठकर खाने लगे। स्नेहा ने सबको देने के बाद अपनी प्लेट उठाई और उत्सुकतावश जल्दी-जल्दी खाने लगी। यह देखकर तरुण ने उसके गाल पर एक हल्का थप्पड़ जड़ दिया।
तरुण ने बच्चों को कठोर ‘टेबल मैनर्स’ (Table Manners) सिखाए थे और स्नेहा जलेबी देखकर उस नियम को भूल गई थी। तरुण चाहते थे कि उनके बच्चे पूर्णतः अनुशासित और सुसंस्कृत बनें। बच्चों के अध्ययन सामग्री (Study Material), पाठ्यक्रम, विद्यालय-महाविद्यालय के चयन से जुड़े सभी निर्णय तरुण स्वयं ही लेते थे। यद्यपि वे बच्चों से परामर्श करते थे, किंतु बच्चों ने सब कुछ पिता पर ही छोड़ दिया था। तरुण की मंशा थी कि वे बच्चों की समस्त व्यवस्थाएँ कर दें ताकि बच्चे अपना पूरा समय अध्ययन में लगा सकें।
दुष्परिणाम:
किंतु एक दिन चिकित्सक ने बताया कि स्नेहा गहरे अवसाद (Depression) की शिकार है। अत्यधिक कठोर अनुशासन के कारण उसके अवचेतन मन में परिजनों के प्रति अनजाने में ही आक्रोश और दूरी पनप गई थी। प्रत्येक कार्य माता-पिता द्वारा तय किए जाने के कारण वह स्वयं निर्णय लेने में कभी सक्षम ही नहीं हो सकी; उसने केवल आज्ञा का पालन करना सीखा था।
कहाँ हुई चूक?
कहाँ चूक हुई तरुण से? क्या माता-पिता का बच्चों के विषय में सोचना अनुचित है? क्या उन्हें अनुशासन में रखना गलत है?
वास्तव में, अधिकतर माता-पिता बच्चों के विषय में सोचते समय ‘संतुलन’ (Balance) के सिद्धांत को भूल जाते हैं। वे बच्चों पर जबरन नियम और गुण थोपने का प्रयास करते हैं, जबकि उन्हें गुणों को स्वाभाविक रूप से विकसित होने का अवसर देना चाहिए।
बच्चों में संस्कार विकसित करने के 8 व्यावहारिक उपाय
स्वयं आदर्श बनें: बच्चे उपदेशों से अधिक आचरण से सीखते हैं। यदि आप बच्चों से संयमित व्यवहार की अपेक्षा करते हैं, तो सर्वप्रथम स्वयं वैसा आचरण करें। घर का वातावरण शांत और व्यसनमुक्त रखें।
कहानियों को माध्यम बनाएँ: बच्चों को नैतिक शिक्षा देने के लिए पौराणिक एवं लोक कथाएँ अत्यंत प्रभावी माध्यम हैं। कहानियों को इस प्रकार सुनाएँ कि बच्चे उसे मनोरंजन समझें, पढ़ाई का बोझ नहीं। इसमें दादा-दादी और नाना-नानी की भूमिका महत्वपूर्ण हो सकती है।
स्वाध्याय (पढ़ने) की आदत डालें: वीडियो या स्क्रीन देखने से मस्तिष्क विचार प्रक्रिया में उतना सक्रिय नहीं रहता, किंतु पुस्तकें पढ़ते समय मस्तिष्क में चित्र बनते हैं, जिससे कल्पनाशीलता और सोचने की क्षमता बढ़ती है। बच्चों में पाठ्यपुस्तक के अतिरिक्त अन्य ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ने की आदत विकसित करें।
व्यावहारिक जगत से जोड़ें: बच्चे अत्यंत जिज्ञासु होते हैं। उनके प्रश्नों के उत्तर दें और उन्हें स्वयं भी समाधान खोजने के लिए प्रेरित करें। प्रकृति (पेड़-पौधे, पशु-पक्षी) और दैनिक जीवन की घटनाओं (वर्षा, बिजली का चमकना, घरेलू उपकरण) के माध्यम से व्यावहारिक ज्ञान दें।
नकारात्मकता से बचाएँ: बच्चों के सामने किसी व्यक्ति, रिश्तेदार या मित्र की बुराई न करें और न ही उनकी तुलना दूसरों से करें। उनमें भय या पूर्वाग्रह भरने के बजाय स्वयं सही और गलत में अंतर करने की क्षमता का विकास करें।
उत्तरदायित्व सौंपें: बच्चों को उनकी आयु के अनुसार छोटे-छोटे दायित्व दें; जैसे—पौधों में पानी देना, पक्षियों को दाना डालना, वस्तुएँ यथास्थान रखना आदि। उनके सतत् प्रयासों के लिए उन्हें प्रोत्साहित करें।
पाठ्येतर गतिविधियाँ (Co-curricular Activities): अध्ययन के साथ-साथ उन्हें कला, खेल, संगीत, चित्रकारी, नाटक या बागवानी के लिए प्रोत्साहित करें। इससे उनका तनाव कम होता है और समय प्रबंधन की प्रेरणा मिलती है।
संवेदना और सहभागिता (‘Care & Share’) सिखाएँ: एकल परिवारों में बच्चों को अत्यधिक लाड़-प्यार मिलने से वे हठी और आत्मकेंद्रित होने लगते हैं। उन्हें दूसरों की सहायता करना और अपनी वस्तुओं को साझा करना सिखाएँ।
संस्कार देने का दायित्व किसका है?
परिवार: बालक की पहली पाठशाला उसका घर और पहली शिक्षिका उसकी माता होती है। अतः प्राथमिक दायित्व परिवार का ही है।
विद्यालय: बाह्य जगत से जुड़ने का पहला अनुभव विद्यालय में होता है, इसलिए शिक्षकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है।
समाज: बच्चे देश का भविष्य हैं; अतः एक सुसंस्कृत वातावरण का निर्माण करना संपूर्ण समाज का सामूहिक दायित्व है।
निष्कर्ष:
संस्कार ही वह माध्यम हैं जिनसे व्यक्ति अपनी प्रतिभा और उपलब्धियों का समाज हित में सम्यक उपयोग कर पाता है। बच्चों को उचित संस्कार देकर ही हम समाज को अपराध, भ्रष्टाचार और वृद्धाश्रम जैसी समस्याओं से मुक्त कर सकते हैं। वास्तव में, संस्कार ही वह सबसे अमूल्य उपहार हैं जो माता-पिता अपनी भावी पीढ़ी को दे सकते हैं।
