संस्कार क्या है और क्यों आवश्यक है?

बबीता झा
जून, 2024

आधुनिक जीवन की त्रासदियाँ: केस स्टडीज़
प्रभा जी (65 वर्ष): विवाह के पश्चात उन्होंने अपने मायके और ससुराल—दोनों पक्षों के संबंधियों से दूरी बना ली। पड़ोसियों और मित्रों से भी कोई संपर्क नहीं रखा। पति-पत्नी दोनों उच्च पदों पर कार्यरत थे, अतः दोनों बच्चों के पालन-पोषण और उनके करियर निर्माण में ही लीन रहे। उन्होंने न तो कभी माता-पिता या सास-ससुर की चिंता की और न ही किसी रिश्तेदार का हाल-चाल लेना आवश्यक समझा। जब बच्चे अपनी गृहस्थी में व्यस्त होकर दूर चले गए और पति का निधन हो गया, तब उन्हें एकाकीपन सालने लगा। आज उन्हें शिकायत है कि कोई संबंधी या मित्र उनके साथ नहीं है, किंतु वे यह नहीं सोचतीं कि उन्होंने स्वयं कभी किसी के सुख-दुख में सहभागिता नहीं की थी। उनके बच्चों ने भी अपने माता-पिता के आचरण से यही सीखा कि अपनों के अतिरिक्त किसी से संबंध रखने की आवश्यकता नहीं है; परिणामस्वरूप वे भी सामाजिक व पारिवारिक संबंधों के महत्त्व को कभी समझ ही नहीं पाए।
सत्येंद्र जी: अपने बड़े भाई से संपत्ति विवाद के कारण वर्षों तक उनका मुकदमा चलता रहा। उनके अनुसार पिता ने हमेशा बड़े भाई का पक्ष लिया था, इसी रोष में उन्होंने माता-पिता से भी संबंध तोड़ लिए। बहनों, अन्य रिश्तेदारों या मित्रों से भी वे दूरी बनाकर रखते थे; क्योंकि उनका मानना था कि लोगों के घर आने-जाने से एक तो धन व्यय होता है, दूसरे बच्चों की पढ़ाई में बाधा पड़ती है। उन्होंने सोचा कि वे तो अपने तीनों बच्चों से समान प्रेम करते हैं और उन्हें हर सुविधा देते हैं, अतः बच्चे जीवन भर उनका साथ देंगे। किंतु ऐसा न हो सका। बच्चे पढ़-लिखकर उच्च पदों पर आसीन हुए, दूसरे नगरों में बस गए और अपने-अपने परिवारों में व्यस्त हो गए। अब वे भी अपने पिता की ही भाँति नहीं चाहते कि उनके घर कोई रिश्तेदार आए, ताकि उनके बच्चों की पढ़ाई प्रभावित न हो। सत्येंद्र जी के लिए जो रिश्ते व्यर्थ थे, वही दृष्टिकोण आज उनके बच्चों का अपने माता-पिता और रिश्तेदारों के प्रति हो गया है।
क्षितिज (37 वर्ष): पिता ने उसे वे सभी सुख-सुविधाएँ उपलब्ध कराई थीं जिन्हें धन से क्रय किया जा सकता है। कम आयु में ही उसने महँगी गाड़ियाँ, ब्रांडेड वस्त्र और प्रतिष्ठित संस्थानों की डिग्रियाँ प्राप्त कर लीं। मित्र भी बहुत थे और औपचारिक रूप से बड़ों को प्रणाम भी कर लेता था; किंतु बड़ों के सानिध्य में बैठने, छोटों को स्नेह देने और जीवन के वास्तविक संघर्षों को समझने का अनुभव उसे कभी नहीं मिला। उसके लिए देर रात तक पार्टियाँ करना, नशा करना और तीव्र गति से वाहन चलाना ही जीवन का आनंद था। इस दिनचर्या ने उसे शारीरिक और मानसिक रूप से रुग्ण बना दिया। अब उसके मित्र उसका साथ छोड़ चुके हैं और वह अकूत भौतिक साधनों के बीच भी गहरे एकाकीपन और तनाव से जूझ रहा है।
शशांक (19 वर्ष): पिता के निधन के पश्चात उसकी माता (जो एक शासकीय कर्मचारी थीं) ने ही उसका पालन-पोषण किया। वे चाहती थीं कि उनका पुत्र एक ऐसा उच्च अधिकारी बने जैसा उनके गाँव या मोहल्ले में कोई न बना हो। अतः उन्होंने अत्यंत कठोर अनुशासन में शशांक को पाला। दोनों का एक ही ध्येय बन गया—उच्च पद प्राप्त करना। वे यह न समझ सके कि जीवन केवल एक नौकरी या परीक्षा से कहीं अधिक विशाल और सुंदर होता है। सारे रिश्ते-नाते, प्रेम और जीवन का सौंदर्य उनके लिए केवल सफलता के बाद की चीज़ बन गए। परिणाम यह हुआ कि ऊपर से शांत और अनुशासित दिखने वाला शशांक अवचेतन रूप से भयाक्रांत और मानसिक रूप से दुर्बल होता गया। जब उसे लगा कि वह परीक्षा में सफल नहीं हो पाएगा, तो उसने आत्महत्या जैसा अत्यंत आत्मघाती कदम उठा लिया।

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संस्कार क्या हैं?
व्यक्तियों और समाज के विखंडन का मूल कारण संस्कारों की कमी है। शब्दशास्त्र की दृष्टि से ‘संस्कार’ शब्द का संधि-विच्छेद ‘सम् + कार’ होता है (‘कृ’ धातु में ‘सम्’ उपसर्ग)। मीमांसा शास्त्र, महाकवि कालिदास आदि ने संस्कार का अर्थ ‘शुद्धि’ माना है।
व्यवहार में संस्कार शब्द का प्रयोग दो रूपों में किया जाता है:
रूढ़िगत (धार्मिक) रूप: वे औपचारिक धार्मिक कृत्य जो व्यक्ति के शरीर, मन और मस्तिष्क को शुद्ध कर उसे समाज योग्य बनाते हैं। शास्त्रों में गर्भाधान से लेकर अंत्येष्टि तक 16 (सोलह) संस्कार मुख्य माने गए हैं। ये केवल कर्मकांड नहीं थे, बल्कि इनके माध्यम से गुण-वर्धन किया जाता था। उदाहरण के लिए, यज्ञोपवीत संस्कार के पश्चात बालक को विद्या अध्ययन हेतु गुरुकुल भेजा जाता था।
सामान्य (व्यावहारिक) रूप: ऐसे नैतिक, सामाजिक और मानवीय गुणों का समुच्चय, जिससे व्यक्ति का समाज के साथ तादात्म्य बना रहे। यह व्यक्ति को यह बोध कराता है कि वह एकाकी नहीं, बल्कि एक बृहत्तर समाज का अभिन्न अंग है। मुंडन, जनेऊ, विवाह आदि अवसरों पर पूरे समाज को एकत्र करने की परंपरा इसी तादात्म्य का प्रतीक है।

संस्कारों के दो मुख्य स्तर
दूसरों (समाज) के प्रति कर्तव्य: दूसरों की पीड़ा को समझना, निस्वार्थ सहायता करना, सत्य बोलना, परिश्रम से जीविकोपार्जन करना, अनैतिक आचरण से दूर रहना, बड़ों का आदर व छोटों से स्नेह करना और किसी से ईर्ष्या न करना। संस्कार ही वह मर्यादा तय करते हैं जिससे व्यक्ति अपनी शिक्षा, कौशल और धन का सम्यक उपयोग करता है।
स्वयं के प्रति कर्तव्य: समाज के प्रति दायित्वों का निर्वहन तभी संभव है जब व्यक्ति स्वयं तन और मन से स्वस्थ हो। हमारा शरीर केवल हमारा नहीं, बल्कि हमारे परिवार और समाज की अमानत है। इसलिए नियमित दिनचर्या, सम्यक आहार, व्यायाम और स्वच्छता भी संस्कारों का ही अंग हैं। इसी उद्देश्य से ब्रह्मचर्य आश्रम में प्रवेश करते ही (8 से 12 वर्ष की आयु में) बालकों को स्वस्थ जीवनशैली का प्रशिक्षण दिया जाता था।

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संस्कार क्यों आवश्यक हैं?
रावण प्रकांड विद्वान, धनवान और शक्तिवान था। महाभारत के पात्र कंस, जरासंध और दुर्योधन भी विशाल संसाधनों से संपन्न थे; किंतु उन सब में केवल एक कमी थी—संस्कारों का अभाव। यह एक कमी उनके समस्त गुणों पर भारी पड़ी और उनके विनाश का कारण बनी।
दार्शनिक अरस्तू के अनुसार, “मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है।” मानव शिशु प्राकृतिक रूप से अत्यंत असहाय होता है और दूसरों के सहयोग के बिना उसका अस्तित्व संभव नहीं है। किंतु वयस्क होकर जब वह आर्थिक रूप से सक्षम होता है, तो अपनी जड़ों को भूलकर अपनों को ही अपनी स्वतंत्रता में बाधा मानने लगता है। ऐसे लोग या तो जाने-अनजाने अपराध के मार्ग पर चल पड़ते हैं, या एकाकीपन, नशा और मानसिक अवसाद के शिकार हो जाते हैं। वे न तो अपनी सफलताओं को सँभाल पाते हैं और न ही असफलताओं को सहन कर पाते हैं।

बाल्यकाल से संस्कारों का बीजारोपण
संस्कार कोई थोपी गई घटना नहीं, बल्कि सहज स्वभाव होना चाहिए। बच्चों में अच्छी आदतें प्रारंभ से ही विकसित की जानी चाहिए ताकि वे बाह्य अनुशासन के बजाय उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति बन जाएँ:
किसी दुखी को देखकर मन में करुणा का भाव सहज ही उत्पन्न हो।
दूसरों की प्रसन्नता में प्रसन्न होना और बड़ों का आदर करना हमारा सहज स्वभाव बने, न कि लाभ-हानि का गणित।
निष्कर्ष:
संस्कारहीन जीवन स्वयं के लिए, परिवार के लिए और संपूर्ण समाज के लिए घातक है। आज के बच्चे ही कल के भावी नागरिक हैं; इसलिए संस्कारवान बच्चों से ही एक सुसंस्कृत और सशक्त समाज का निर्माण संभव है।

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