घरेलू हिंसा कानून (वरीय कोना)

मार्च, 2023
घरेलू हिंसा कानून क्या है? इसके तहत कितने दिनों की सजा हो सकती है?
(शुभ्रा चौधरी, शहर का नाम इन्होंने नहीं लिखा है)
शुभ्रा जी, आपने कोई विशेष समस्या नहीं लिखी है, बल्कि एक सामान्य प्रश्न किया है। इसलिए मैं घरेलू हिंसा से जुड़े कानूनी प्रावधानों को थोड़ा विस्तार से बता देती हूँ, ताकि अगर किसी अन्य पाठक की भी यह समस्या हो, तो उन्हें भी इसका समाधान मिल सके।
शारीरिक हिंसा यानी मारपीट समाज द्वारा हमेशा से सामान्यतः अपराध माना जाता रहा है, लेकिन फिर भी इस तरह की हिंसा घरों के अंदर होती रही है, जिसकी शिकार सामान्यतः महिलाएँ ही होती रही हैं। आस-पड़ोस के लोग इसे दूसरों का घरेलू मामला मानकर सामान्यतः हस्तक्षेप नहीं करते हैं। हस्तक्षेप न करने का एक कारण महिलाओं को पुरुषों की संपत्ति मानने की पुरातन सोच भी है। लेकिन घरेलू हिंसा के आँकड़े इतने भयानक हैं कि कानून निर्माताओं का ध्यान भी इसकी तरफ गया। इसी का परिणाम था वर्ष 2005 में बना “घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005” (Protection of Women from Domestic Violence Act, 2005), जिसे संक्षेप में घरेलू हिंसा अधिनियम या अंग्रेज़ी में Domestic Violence Act कहते हैं।
घरेलू हिंसा क्या है?
घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत ऐसे किसी भी कार्य को घरेलू हिंसा माना जाता है, जिससे महिला के स्वास्थ्य, सुरक्षा या जीवन को हानि पहुँचे या ऐसा होने का खतरा हो। इसमें शारीरिक, मानसिक, भावनात्मक, आर्थिक और यौन (सेक्सुअल)— इन पाँच तरह के अत्याचारों या हिंसा को शामिल किया गया है। दहेज व संपत्ति की माँग के लिए महिला को परेशान करना, उसे हानि पहुँचाना या ऐसा करने का खतरा पैदा करना भी घरेलू हिंसा माना जाता है। ऐसी हिंसा की धमकी महिला को या उसके किसी संबंधी को देना भी घरेलू हिंसा में शामिल है।
घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत कौन शिकायत कर सकता है?
जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है, यह महिलाओं की सुरक्षा के लिए बनाया गया है; इसलिए इसके तहत केवल महिलाएँ ही शिकायत यानी परिवाद (complaint) कर सकती हैं, पुरुष नहीं। ऐसी शिकायत या परिवाद करने के लिए केवल दो शर्तें हैं:
महिला (परिवादिनी या complainant) और जिसके विरुद्ध शिकायत की गई है यानी प्रतिवादी (Respondent), एक ही घर में रह रहे हों या कभी रहे हों। साथ रहने की समय-अवधि अप्रासंगिक है।
उन दोनों में किसी-न-किसी तरह का संबंध हो। यह संबंध रक्त का या वैवाहिक हो सकता है। गोद ली हुई संतान को भी रक्त-संबंध में माना जाता है। लेकिन एक ही घर में रहने वाले वे लोग जिनका आपस में कोई संबंध नहीं है (जैसे: घर में काम करने वाली नौकरानी, अतिथि, किराएदार इत्यादि) इस कानून के तहत शिकायत नहीं कर सकते। उनके लिए अलग कानून हैं।
घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत किसके विरुद्ध शिकायत की जा सकती है?
इस कानून के तहत किसी भी पुरुष संबंधी— जो किसी भी समय-अवधि पर, एक साझा घर में महिला के साथ रहा हो— के विरुद्ध परिवाद किया जा सकता है; चाहे वह पुरुष संबंधी पिता, पति, भाई, चाचा, ससुर इत्यादि में से कोई भी क्यों न हो। अर्थात परिवाद के लिए केवल तीन शर्तें हैं:
प्रतिवादी पुरुष हो और उसकी उम्र 18 वर्ष से ज़्यादा हो।
उसका परिवादिनी से किसी-न-किसी तरह का संबंध हो (रक्त, विवाह या दत्तक संबंध)।
दोनों किसी भी समय एक ही घर में साथ रहे हों।
पीड़ित महिला घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 की शिकायत किस तरह और कहाँ कर सकती हैं?
सबसे पहले परिवादिनी (अर्थात वह महिला, जो परिवाद या शिकायत करती है यानी पीड़ित महिला) को एक लिखित परिवाद तैयार करना चाहिए, जिसमें उसके विरुद्ध जिस तरह की हिंसा हो रही है या हुई है, उसका स्पष्ट उल्लेख होना चाहिए। साथ ही, उसे यह भी लिखना चाहिए कि वह क्या राहत चाहती है।
उसे यह परिवाद जुडिशल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास या जहाँ उपलब्ध हो, वहाँ मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट कोर्ट में देना होगा। एक महिला सुरक्षा अधिकारी (Protection Officer), जो कि एक पुलिस अधिकारी होती है, उससे मिलकर वस्तुस्थिति का पता करने का प्रयास करेगी। वह शिकायत (परिवाद) की जाँच-पड़ताल कर अपनी रिपोर्ट कोर्ट को देती है। इस रिपोर्ट के आधार पर जब कोर्ट संतुष्ट हो जाता है कि घरेलू हिंसा हुई है, तब प्रतिवादी को नोटिस जारी किया जाता है और मुकदमे की सुनवाई शुरू हो जाती है।
वे कौन-सी विशेष राहतें हैं, जो पीड़ित महिला इस कानून के तहत माँग सकती है?
घरेलू हिंसा अधिनियम, 2005 के तहत महिला पाँच तरह के अधिकारों या राहतों की माँग कर सकती है:
सुरक्षा का अधिकार: कोर्ट को अगर प्रथम दृष्टया लगता है कि घरेलू हिंसा हो रही है, तो वह प्रतिवादी (वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध शिकायत की गई है) को यह आदेश दे सकता है कि वह कोई घरेलू हिंसा न करे और न ही किसी अन्य व्यक्ति को ऐसा करने के लिए उकसाए। आवश्यकता होने पर उसे पीड़ित महिला के कार्यस्थल, कॉलेज या स्कूल में प्रवेश करने से रोका जा सकता है। उसे मौखिक या लिखित रूप से, फोन, इंटरनेट इत्यादि किसी भी माध्यम से उस महिला से संपर्क करने से मना किया जा सकता है। इतना ही नहीं, ऐसी किसी भी संपत्ति को बेचने या हस्तांतरित करने से रोका जा सकता है, जिसमें उस महिला या उसके किसी अपने का हक या हित हो। यह सुरक्षा पीड़ित महिला के अलावा उस व्यक्ति को भी दी जा सकती है जिसने उसकी सहायता की हो।
रहने के लिए घर का अधिकार: इस अधिकार का मकसद यह है कि अगर कोई महिला शिकायत करती है, तो उसे घर से निकाला न जा सके और न ही घर के अंदर तंग किया जा सके। इसके तहत कोर्ट उस घर को बेचने या किसी को देने से रोक सकता है जिसमें पीड़ित महिला रह रही है। प्रतिवादी या उसके किसी भी प्रतिनिधि को घर में या घर के जिस हिस्से में पीड़ित महिला रहती है, वहाँ प्रवेश करने से रोका जा सकता है। आवश्यकता होने पर कोर्ट प्रतिवादी को आदेश दे सकता है कि वह पीड़ित महिला के लिए किराए पर अलग घर की व्यवस्था करे और उसका किराया दे।
आर्थिक सहायता: इसके तहत कोर्ट पीड़ित महिला के खर्चों के लिए और उसे होने वाली आर्थिक हानि के लिए प्रतिवादी से भरण-पोषण/मुआवज़ा दिला सकता है।
बच्चों की कस्टडी का अधिकार: केस चलने के दौरान किसी भी समय अगर पीड़ित महिला माँग करे, तो उसे अस्थायी रूप से अपने बच्चों की कस्टडी मिल सकती है। कोर्ट को यदि ऐसा लगे कि प्रतिवादी का बच्चों से मिलना बच्चों के लिए हानिकारक है, तो वह उसे बच्चों से मिलने से भी रोक सकता है। (इसमें मिलने वाली कस्टडी अस्थायी होती है; स्थायी कस्टडी के लिए फैमिली कोर्ट में अलग से केस दायर करना होता है।)
क्षतिपूर्ति (Compensation) का अधिकार: पीड़ित महिला को हुई शारीरिक व मानसिक पीड़ा के लिए कोर्ट प्रतिवादी से क्षतिपूर्ति दिला सकता है।
इन मुख्य अधिकारों के अलावा पीड़ित महिला को काउंसलिंग पाने, वेलफेयर एक्सपर्ट से सहायता पाने और “इन-कैमरा” (बंद कमरे में मुकदमे की सुनवाई) का भी अधिकार है। चूंकि केस के अंतिम निपटारे में समय लग सकता है, इसलिए केस चलते रहने के दौरान अंतरिम राहत (Interim Relief) का भी प्रावधान है।
क्या इन अधिकारों का दुरुपयोग निर्दोष पुरुषों को तंग करने के लिए भी किया जा सकता है?
निःसंदेह इस कानून ने महिलाओं को बहुत अधिकार दिए हैं, पर इसका दुरुपयोग रोकने के लिए भी कुछ प्रावधान हैं। केवल महिला की शिकायत के आधार पर ही सीधे कार्रवाई शुरू नहीं हो जाती, बल्कि सुरक्षा अधिकारी प्रारंभिक रूप से जाँच करती है। उसके द्वारा शिकायत सही पाए जाने पर ही कोर्ट मुकदमे की कार्रवाई शुरू करता है। कोर्ट सभी तथ्यों को ध्यान में रखकर ही प्रतिवादी के विरुद्ध कोई आदेश पारित करता है।
क्या इस कानून के तहत महिलाओं के विरुद्ध भी शिकायत की जा सकती है?
यद्यपि इस कानून के तहत महिला रिश्तेदारों को मुकदमे का पक्षकार बनाया जा सकता है, पर उनके विरुद्ध कोई मुख्य दावा (claim) नहीं माँगा जा सकता; क्योंकि इस कानून का नाम ही महिलाओं की सुरक्षा के लिए है। इसलिए इसका प्रयोग उनके विरुद्ध किसी व्यक्तिगत दावे के लिए नहीं किया जा सकता।
क्या घरेलू हिंसा कानून में पत्नी सास-ससुर की संपत्ति से मेंटेनेंस माँग सकती है?
इस कानून के तहत महिला सास से कोई दावा नहीं कर सकती। लेकिन यदि ससुर को प्रतिवादी बनाया गया है, तो उनसे क्षतिपूर्ति की माँग कर सकती है। भरण-पोषण के लिए खर्चा (maintenance) वह केवल पति की आय और पति की संपत्ति से ही ले सकती है। रहने का अधिकार भी वह उसी घर में माँग सकती है जो पति ने खरीदा हो, किराए पर लिया हो या जिस घर में पति का हिस्सा हो। ससुर की व्यक्तिगत/स्वअर्जित संपत्ति पर उसका सीधा अधिकार नहीं होगा।
अगर पति-पत्नी सास-ससुर से अलग रहते हैं और सास-ससुर कभी-कभी उनसे मिलने आते हैं, तो क्या इस स्थिति में भी उन पर इस अधिनियम के तहत केस हो सकता है?
हाँ, उन्हें भी केस में पक्षकार बनाया जा सकता है, क्योंकि इस कानून के लागू होने के लिए केवल तीन मुख्य शर्तें हैं:
घरेलू हिंसा हुई हो।
हिंसा करने वाले और सहने वाले में किसी तरह का संबंध हो।
दोनों केस करते समय या उससे पहले किसी भी समय एक ही घर में साथ रहे हों। (हिंसा कितने दिन साथ रहने पर हुई, इसकी कोई निश्चित समय-सीमा नहीं है; इसलिए इसमें समय-अवधि का कोई प्रतिबंध नहीं है।)

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