हिन्दी दिवस की सार्थकता: उपलब्धियाँ और व्यावहारिक चुनौतियाँ

सितंबर, 2023
बबीता झा

एक और हिन्दी दिवस आया और चला गया। प्रतिवर्ष की भाँति लोगों ने हिन्दी की विशेषताओं का गुणगान किया और इसके बढ़ते कद पर चर्चाएँ कीं। यह सत्य है कि राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर हिन्दी भाषियों की संख्या में निरंतर वृद्धि हुई है। किंतु यह भी एक कड़वा यथार्थ है कि यह उपलब्धि केवल हिन्दी-भाषियों के व्यक्तिगत प्रयासों का परिणाम नहीं, बल्कि बाज़ार, जनसंचार और बॉलीवुड फ़िल्मों के व्यापक प्रभाव की देन है। अतः यह अवसर केवल उपलब्धियों पर गर्व करने का नहीं, बल्कि भाषा के समक्ष उपस्थित गंभीर चुनौतियों पर मंथन करने का भी है।

संप्रति हिन्दी के समक्ष तीन प्रमुख चुनौतियाँ दृष्टिगोचर होती हैं:

1. भाषा और लिपि का टूटता संबंध
कोई भी भाषा स्वयं को अपनी मूल लिपि में ही सबसे सहज और सटीक रूप से अभिव्यक्त कर सकती है। किंतु व्हाट्सएप और सोशल मीडिया के इस दौर में लोग बड़ी संख्या में हिन्दी को देवनागरी के बजाय रोमन लिपि (Hinglish) में लिखने लगे हैं।

12वीं कक्षा तक पढ़े 10 से 30 वर्ष के युवाओं पर किए गए एक सर्वेक्षण में पाया गया कि वे हिन्दी के अतिरिक्त कोई अन्य भाषा धाराप्रवाह नहीं बोल पाते, किंतु जब उनसे हिन्दी लिखने को कहा गया, तो बहुसंख्यक युवाओं ने रोमन लिपि को ही अधिक सुविधाजनक माना। संदेश भेजने के अतिरिक्त उनका हस्तलेखन (Handwriting) छूट चुका है। देवनागरी लिपि और व्याकरण के शुद्ध प्रयोग के प्रति यह उदासीनता एक गंभीर चिंता का विषय है।

2. मानकीकरण (Standardization) एवं प्रामाणिकता का प्रश्न
अक्सर यह समाचार गर्व से सुनाया जाता है कि ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी या एनसाइक्लोपीडिया में हिन्दी के इतने नए शब्दों को शामिल किया गया। किंतु डिजिटल क्रांति और मशीन लर्निंग के इस युग में हिन्दी के भीतर किस प्रकार अंग्रेजी व अन्य भाषाओं के शब्दों का मानक समावेशन हो, इस पर समुचित ध्यान नहीं दिया जाता। किसी भी जीवंत भाषा में अन्य भाषाओं के प्रचलित शब्दों का आना उसकी समृद्धता की निशानी है, किंतु एक स्पष्ट मानक रेखा भी आवश्यक है जो ‘भाषा’ को ‘बोली’ से पृथक करती है।

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आज भी सामान्य हिन्दी लेखकों और पाठकों के समक्ष अनेक व्यावहारिक दुविधाएँ बनी रहती हैं, जिनका कोई सर्वमान्य, सुलभ व प्रामाणिक उत्तर आसानी से नहीं मिलता। उदाहरणार्थ:

अंक बनाम शब्द: वाक्यों में कहाँ अंकों (1, 2, 3) का प्रयोग उचित है और कहाँ उन्हें शब्दों (एक, दो, तीन) में लिखा जाए?

स्वर बनाम व्यंजन प्रयोग: कहाँ ‘गए’ लिखा जाए और कहाँ ‘गये’?

अनुस्वार व अनुनासिक: कहाँ केवल ‘बिंदु’ (ं) का प्रयोग हो और कहाँ ‘चंद्रबिंदु’ (ँ) का?

शब्द-चयन: ‘आरंभ’ और ‘प्रारंभ’ के सूक्ष्म अंतर का प्रयोग कहाँ हो?

सूचक शब्द: ‘इत्यादि’ और ‘आदि’ के प्रयोग में क्या मानक अंतर है?

हिन्दी से संबंधित अनेक सरकारी संस्थाएँ कार्यरत हैं, किंतु अद्यतन (Updated) व्याकरणिक मानकों और प्रचलित वाक्यांशों (Phrases) का कोई सुलभ डिजिटल कोश आम जनता के पास उपलब्ध नहीं है।

3. भाषा के आधार पर प्रांतीय विभाजन और समाधान
भारत के उत्तर और दक्षिण राज्यों के मध्य वैचारिक और सामाजिक अंतर्द्वंद्व का एक प्रमुख रणक्षेत्र भाषा रही है। दक्षिण भारत के राज्यों की यह मांग रही है कि उत्तर भारत के विद्यालयों में भी दक्षिण की भाषाओं को त्रि-भाषा सूत्र में शामिल किया जाए। दूसरी ओर, उत्तर भारतीयों का तर्क व्यावहारिक समस्याओं पर आधारित रहता है कि विद्यार्थी मातृभाषा, राजभाषा/राष्ट्रभाषा और अंतरराष्ट्रीय भाषा (अंग्रेजी) के साथ एक चौथी प्रांतीय भाषा सीखे, जिसका प्रयोग किसी एक विशिष्ट राज्य तक सीमित हो, यह शिक्षण व्यवस्था में कितना व्यावहारिक होगा?

इस प्रतिद्वंद्विता के राजनीतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक कारण रहे हैं। किंतु इसका समाधान विरोध या बहिष्कार में नहीं, बल्कि पारस्परिक मेलजोल और संवाद में निहित है।

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जिस प्रकार उर्दू को ऐतिहासिक रूप से छावनी की भाषा कहा गया, उसी प्रकार हिन्दी मूलतः संतों, मठों और आश्रमों की भाषा रही है। इसका विकास संतों और उनके अनुयायियों ने किया, जिन्होंने कभी स्थान, जाति या वर्ण के आधार पर भेद नहीं किया।

दक्षिण भारत में साहित्य, कला और अध्यात्म की अत्यंत समृद्ध विरासत है। उत्तर भारत के करोड़ों श्रद्धालु आज भी श्रीरंगम, रामेश्वरम, तिरुपति और कांचीपुरम जाते हैं, तथा दक्षिण के लोग काशी, मथुरा और वैष्णो देवी आते हैं। जब हम भक्ति भाव में ‘गोविंदा-गोविंदा’ या ‘जय माता दी’ कहते हैं, तब भाषा की सीमाएँ स्वतः समाप्त हो जाती हैं।

सांस्कृतिक पुल का निर्माण
यदि हम विदेशी भाषाओं को सीखने में रुचि दिखा सकते हैं, तो अपनी ही राष्ट्रीय संस्कृति और बहनों जैसी भारतीय भाषाओं को सीखने में संकोच क्यों? किंतु इसके लिए अहंकार छोड़कर एक सांस्कृतिक और भाषाई पुल (Bridge) बनाना होगा:

सहज शुरुआत: सीधे पूरे पाठ्यक्रम थोपने के बजाय प्राथमिक स्तर पर केवल अभिवादन और दैनिक संवाद के कुछ शब्दों (जैसे अंग्रेजी में ‘Thank You’ या ‘Welcome’) का आदान-प्रदान शुरू होना चाहिए।

अनुवादक व दुभाषिए: दोनों क्षेत्रों की भाषाओं के विद्वानों, अनुवादकों (Translators) और दुभाषियों को प्रोत्साहित किया जाए।

संवेदनशील आदान-प्रदान: दोनों प्रदेशों में एक-दूसरे की भाषाओं और कला-संस्कृति का सहर्ष स्वागत हो।

भाषा तो वह बर्तन है जिसमें ज्ञान और भावना रूपी अमृत भरा रहता है। जब तक हम अपने-अपने बर्तन लेकर एक-दूसरे से दूरी बनाए रखेंगे, तब तक कोई समाधान नहीं निकलेगा। विश्व मंच पर भले ही हिन्दी का डंका बज रहा हो, किंतु जब तक अपने ही देश के भीतर भाषाई दीवारों को गिराकर एक-दूसरे का आलिंगन नहीं किया जाएगा, तब तक हिन्दी की तमाम उपलब्धियाँ अधूरी ही रहेंगी।

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