सितंबर, 2023

दिल्ली
चिंतन मानव जीवन का एक अत्यंत आवश्यक अंग है—चाहे वह वैज्ञानिक चिंतन हो, आत्मचिंतन हो, सामाजिक चिंतन हो, पारिवारिक चिंतन हो या राष्ट्र-चिंतन। चिंतन हर क्षेत्र में अनिवार्य है। वैज्ञानिक चिंतन के परिणामस्वरूप ही आज हमें अपार मशीनी शक्ति और सुख-सुविधाएँ प्राप्त हुई हैं। किंतु इस सुख-सुविधा का उपयोग हमें किस हद तक, कहाँ तक और कैसे करना चाहिए, इसके लिए भी चिंतन की गहरी आवश्यकता है।
अत्यधिक सुख-सुविधाएँ मनुष्य को आलसी और निष्क्रिय बना देती हैं। यह पूर्णतः सत्य है कि “आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है।” वर्तमान समय में टेक्नोलॉजी के अत्यधिक प्रयोग से ऐसा प्रतीत होता है मानो हम मशीनों के गुलाम बन गए हैं। इसका सबसे बुरा प्रभाव बच्चों के कोमल मन और मस्तिष्क पर पड़ रहा है। बच्चों में स्वाध्याय (Self-study) की प्रवृत्ति घटी है, वे अपने परिवार के सदस्यों से कम मिलते-जुलते हैं और उनके साथ समय व्यतीत नहीं करते। परिणामस्वरूप, उनकी मौलिक चिंतन-क्षमता कम होती जा रही है। इन गंभीर पहलुओं पर हम सभी को गहराई से विचार करना होगा।
रटंत विद्या बनाम व्यावहारिक ज्ञान
आजकल लोग इंटरनेट या गूगल से संदेश खोजकर व्हाट्सएप और फेसबुक पर एक-दूसरे को भेज तो देते हैं, किंतु प्रश्न यह है कि क्या हम उन विचारों को अपने आचरण में शत-प्रतिशत ढाल पाते हैं?
इस संदर्भ में एक बहुत ही प्रासंगिक कहानी है:
एक गुरुजी ने कुछ चिड़ियों को पिंजरे में बंद करके प्रतिदिन यह सिखाना शुरू किया—“शिकारी आएगा, दाना डालेगा, जाल बिछाएगा; लोभ में उसमें फँसना नहीं।”
जब सभी चिड़ियों ने इस वाक्य को अच्छी तरह रट लिया, तो गुरुजी ने यह देखने के लिए उन्हें पिंजरे से आज़ाद कर दिया कि क्या उन्होंने इस ज्ञान का व्यावहारिक प्रयोग सीखा है या केवल रटा है। शाम तक जब एक भी चिड़िया वापस नहीं आई, तो गुरुजी उन्हें देखने जंगल गए। वहाँ का दृश्य देखकर वे दंग रह गए—सभी चिड़ियाँ वही वाक्य गा रही थीं—“शिकारी आएगा, दाना डालेगा, जाल बिछाएगा; लोभ में उसमें फँसना नहीं”—किंतु वे सभी शिकारी के जाल में फँसी हुई थीं!
इसलिए यह अत्यंत आवश्यक है कि अंधी दौड़ के इस युग में हम बच्चों को केवल रटंत ज्ञान न देकर नैतिक और व्यावहारिक शिक्षा दें। अभिभावक के रूप में हमारा यह पावन कर्तव्य है कि हम अपने बच्चों को चिंतनशील और संस्कारी वातावरण प्रदान करें।
एडिसन का जीवन: माँ का सम्बल और जिज्ञासा का बल
महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन ने 1,093 आविष्कार करके विश्व रिकॉर्ड बनाया। किंतु उनकी इस महानता के पीछे उनकी माँ का बहुत बड़ा हाथ था।
एडिसन का जन्म 11 फ़रवरी 1847 को अमेरिका में हुआ था। लगभग 6-7 वर्ष की आयु में जब वे विद्यालय जाने लगे, तो उनके अध्यापक ने उन्हें ‘मंदबुद्धि’ कहकर स्कूल से निकाल दिया और उनकी माँ के नाम एक पत्र दिया। सामान्यतः ऐसी स्थिति में कोई भी माता अपने भाग्य को कोसने लगती या निराश हो जाती, किंतु एडिसन की माँ ने ऐसा बिल्कुल नहीं किया। उन्होंने वह पत्र एडिसन को पढ़कर नहीं सुनाया।
माँ ने घर पर ही स्वयं अपने बेटे को पढ़ाना आरंभ किया। वे एडिसन के हर प्रश्न का उत्तर सोच-समझकर इस प्रकार देती थीं, जिससे उनके बाल-मन में कुछ नया करने का उत्साह जागे। उन्होंने घर पर ही एक वैज्ञानिक वातावरण निर्मित किया। एडिसन को जीवन में परिश्रम और ज्ञान का वास्तविक महत्त्व अपनी माँ से ही सीखने को मिला।
एडिसन बचपन से ही अत्यंत जिज्ञासु थे और तर्कपूर्ण प्रश्न पूछते थे। इसी कारण लोग उन्हें बेवकूफ या मंदबुद्धि समझ लेते थे। एक बार उन्होंने चिड़ियों को उड़ते देखा तो सोचा कि यदि चिड़िया उड़ सकती है, तो इंसान क्यों नहीं? उन्होंने चिड़िया के खान-पान का निरीक्षण किया और पाया कि वह कीड़े-मकोड़े खाती है। एडिसन ने निष्कर्ष निकाला कि शायद कीड़े खाने से ही उड़ने की शक्ति मिलती है। वे कुछ कीड़े ले आए, उन्हें पीसकर पानी में घोला और अपनी नौकरानी की बेटी को पिला दिया! उड़ना तो दूर, वह बच्ची बीमार होकर मरते-मरते बची।
इस नादानी के लिए उन्हें अपनी माँ से डांट और मार भी खानी पड़ी। आज यदि वे सर्वाधिक सफल वैज्ञानिक आविष्कारों के लिए जाने जाते हैं, तो सबसे अधिक असफल प्रयोग करने वाले वैज्ञानिकों में भी उनका नाम दर्ज है। किंतु एडिसन ने कभी हार नहीं मानी। वे अपनी हर असफलता को सफलता की अगली सीढ़ी मानते थे। उनका मानना था:
“प्रत्येक असफलता के बाद एक और प्रयास करना चाहिए, न कि निराश होकर बैठ जाना चाहिए।”
माँ का अमर त्याग और संदेश
एडिसन के पास बड़ी-बड़ी औपचारिक डिग्रियाँ नहीं थीं, किंतु अपने अथक परिश्रम और अध्ययन से उन्होंने बड़े-बड़े विद्वानों को चकित कर दिया।
माँ के देहावसान के पश्चात जब एडिसन ने अपनी माँ का पुराना संदूक खोला, तो उन्हें वही पत्र मिला जो उनके बचपन में अध्यापक ने दिया था। उस समय एडिसन पढ़ना सीख चुके थे। जब उन्होंने पत्र पढ़ा, तो उनकी आँखों से अश्रुधारा बह निकली और हृदय माँ के प्रति अपार श्रद्धा से भर गया। पत्र में लिखा था:
“आपका बेटा मंदबुद्धि है। हमारे स्कूल में इसे पढ़ाने योग्य योग्य शिक्षक नहीं हैं। इसलिए इसे कल से स्कूल मत भेजिए, आप इसे घर पर ही पढ़ाएँ।”
बचपन में जब एडिसन ने माँ से पूछा था कि पत्र में क्या लिखा है, तब माँ ने आँखों में आँसू छिपाकर कहा था—“बेटा, इसमें लिखा है कि आपका बेटा बहुत होशियार है और हमारे स्कूल में इसे पढ़ाने लायक शिक्षक नहीं हैं, इसलिए इसे घर पर ही पढ़ाएँ।” माँ के उस एक सकारात्मक झूठ ने दुनिया को एक महान वैज्ञानिक दे दिया।
12 वर्ष की अल्पायु से ही एडिसन ने समाचार-पत्र बेचकर आजीविका कमाना शुरू कर दिया था। काम के साथ-साथ वे अपना अध्ययन और वैज्ञानिक प्रयोग भी निरंतर करते रहे।
निष्कर्ष
हमें बच्चों की अभिरुचि और मानसिक क्षमता के अनुसार ही उन्हें प्रोत्साहित करना चाहिए। अत्यधिक दबाव डालने से बच्चों की स्वतंत्र रचनात्मक क्षमता समाप्त हो जाती है। अतः बच्चों की क्षमताओं को पहचानना और उन पर सकारात्मक चिंतन करना आज के समय की सबसे बड़ी आवश्यकता है।
