प्राचीन परंपरा में स्त्री शक्ति: ज्ञान, आविष्कार और लोक-कल्याण की प्रेरणा

बबीता झा
मार्च 2026

जया च सुप्रभा चैव दक्षकन्ये सुमध्यमे।
ते सुवातेअस्त्रशस्त्राणि शतम परमभास्वरम॥ (श्लोक 15, सर्ग 21, बालकांड, वाल्मीकि रामायण)


दक्ष प्रजापति की दो कन्याओं जया और सुप्रभा ने सैकड़ों अति प्रकाशवान (अर्थात दिव्य) अस्त्र और शस्त्र का निर्माण किया था। अगले दो श्लोकों (श्लोक 16-17) में कहा गया है कि जया और सुप्रभा ने 500-500 शस्त्र रूपी पुत्र उत्पन्न किए थे। ये ऐसे अस्त्र-शस्त्र थे जिनका प्रहार कोई भी शत्रु सह नहीं सकता था। ये वही अस्त्र-शस्त्र थे जो प्रजापति कृताश्व ने ऋषि विश्वामित्र को और विश्वामित्र ने राम को दिया था।

कई पुरातत्वविद भी यह मानते हैं कि अस्त्र-शस्त्रों का निर्माण स्त्रियों ने किया क्योंकि शारीरिक रूप से कम शक्तिशाली होने के कारण उन्हें अपनी रक्षा और कार्यों के लिए अस्त्र-शस्त्रों और उपकरणों की जरूरत अधिक महसूस हुई। बाद में पुरुषों ने भी अपने से अधिक शक्तिशाली शत्रुओं अथवा अपने लिए खतरों का सामना करने के लिए अस्त्र-शस्त्रों का प्रयोग और आविष्कार किया। इसी तरह, जीवनोपयोगी तकनीक और उपकरण बनाने का पहल भी पहले स्त्रियों ने ही किया, ऐसे विचार कुछ पुरातत्वविदों द्वारा दिया गया है।

वाल्मीकि रामायण में एक और रोचक प्रसंग है राक्षसी ताड़का के जन्म का। उसके पिता सुकेतु दक्ष को कोई संतान नहीं थी। एक शक्तिशाली संतान के लिए उसने ब्रह्मा जी की तपस्या किया। ब्रह्मा से उसने पुत्र या पुत्री नहीं माँग कर केवल ऐसे ‘संतान’ की कामना की जिसमें ‘दस हजार हाथियों’ का बल हो। ब्रह्मा जी सोचने लगे इतना शक्तिशाली पुत्र दूसरों के उत्पीड़न का खतरा बन सकता था। इसलिए उन्होने ‘दस हजार हथियों’ की शक्ति वाली पुत्री होने का वरदान दे दिया। यानि कि स्त्रियों में अगर शक्ति हो तो भी, इसके दुरुपयोग किए जाने की संभावना पुरुषों से कम होती है।

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राम की माता कौशल्या को 1000 गाँव मिले थे। द्रौपदी वह स्त्री थी जो इंद्रप्रस्थ राज्य के वित्त व्यवस्था का पूरा लेखा-जोखा रखती थी। यहाँ तक कि अगर कोई पांडव भाई किसी युद्ध के लिए जाता, तो भी अभियान के खर्चे का पूरा अनुमान और हिसाब-किताब वही रखती थी।

वैदिक साहित्य में कई ऋचाएँ स्त्रियों द्वारा लिखा गया है। लोपामुद्रा, गार्गी, दीर्घतमा इत्यादि ऋषिकाओं के ऋचाओं में एक जो सामान्य स्वर मिलता है वह है आध्यात्मिक और सांसरिक जीवन में सामंजस्य था। पुरुषों का झुकाव किसी एक ओर अधिक होता था। लोपामुद्रा ने अपने पति महान ऋषि अगस्त को यह सिखाया कि आध्यात्मिक जीवन जितना आवश्यक है, आत्मा और बुद्धि का उत्कर्ष जितना श्रेयस्कर है, सांसरिक प्रेम और गृहस्थ जीवन उससे बिल्कुल भी कम नहीं है। यह लोपमुद्रा का ही प्रभाव था कि ऋषि अगस्त के अधिकांश आविष्कार एवं कार्य मानव जीवन को बेहतर बनाने के लिए हुए जबकि अपने प्रारम्भिक जीवन में वे सिर्फ अपनी आध्यात्मिक उन्नति के लिए ही प्रयासरत रहे।

कहते हैं कि माता पार्वती की प्रेरणा से ही कैलाश निवासी परम अनासक्त योगी भगवान शिव लोगों के कल्याण के लिए काशी के निवासी हो गए।

ऐतिहासिक काल और वर्तमान काल में भी ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं जहाँ स्त्रियों ने तकनीक, शिक्षा, प्रशासन, अर्थ व्यवस्था, इत्यादि में मौलिक और सशक्त योगदान दिया है।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह योगदान उसके अलावा है जो वह देश और समाज को एक अच्छे संतान के रूप में देती हैं और व्यक्ति के क्लांत मन को वह स्थान देती है जहाँ उसे शांति मिलती है, जिसे वह घर कहता है। महाराज भरत के जीवन पर उनकी माँ शकुंतला, शिवाजी के जीवन पर उनकी माँ जीजाबाई, गाँधी जी के जीवन पर उनकी माँ पुतलीबाई, इत्यादि के प्रभाव की कहानी से तो हम सब परिचित हैं ही।

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पुरुष-प्रकृति के रूप में जब सृष्टि का सृजन ही स्त्री-पुरुष मिल कर करते हैं, तब परिवार हो, समाज हो, या फिर देश- दोनों के मिलने से ही परिपूर्ण होगा, यह तो अकाट्य सत्य है।

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