
मुझे खाली समझने की भूल मत करना!
मैं खाली नहीं थी…
मैंने ख़ुद को खाली किया था—
अपनों के लिए!
मेरी भी ज़िंदगी थी,
मेरे भी काम थे,
मेरी भी थकान थी…
मगर अपनों ने क्या समझा?
मेरी उपलब्धता—मेरी फुर्सत!
मेरी ख़ामोशी—मेरी कमज़ोरी!
और मेरी परवाह—
अपनों का हक़!
जब भी अपनों ने पुकारा—
मैं चली आई।
क्यों?
क्योंकि वे अपने थे!
लेकिन याद रखना—
जो हर बार अपना वक़्त देता है,
वह बेकार नहीं होता…
वह बस
अपनों को अपनी प्राथमिकता देता है!
और जिस दिन वही इंसान
चुप हो जाए…
तो यह मत कहना—
“अब इसके पास वक़्त नहीं!”
नहीं!
वक़्त आज भी उतना ही है…
बस अब उसमें
अपनों के लिए जगह नहीं है!
