सितंबर, 2024
कहती है मैं कृति तुम्हारी

रजत कॉलोनी, बूँदी, राज.
जब से रस भीगी संध्या को मैंने मन से प्यार किया है;
तब से मुझको यह लगता है, जीने का अधिकार लिया है!
अब संबंध कहाँ है मेरा, ऑसू के गलियारों से;
अब धारा में बहता हूँ मैं मिलकर रोज किनारों से।
अब सूने कानन में कोई, बजती रहती बांसुरिया;
पांव नहीं रुक पाते मेरे, उमर हो गई बावरिया!
रोज सुबह बांहों में भरकर, मिलता हूँ मीठे झरनें से;
तपन भरी दुपहरी में भी, हिमखंडी संसार जीया है!
अब तो हर क्षण जीने लायक, सांसे चलती छंद मिली;
अब क्रिड़ाओं में मीठापन, दे जाती है गंध कली!
लगती दूब भरी हरियाली, पांवों का पूजन करती;
पथ में है शबनमी बिछौना, हवा मिली गुंजन भरती।
ऑखों की यह बहक बनाती, एक रुप के चित्र अनेक;
कहती है मैं कृति तुम्हारी, तुमने ही आकार दिया है!
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