टेक केयर (लघुकथा)

मार्च, 2024

प्रेम नारायण गुप्ता
पीतमपुरा, दिल्ली

पापा बहुत ख़ुश थे कि उनका बेटा विदेश में अच्छी तरह से सैटल हो गया था। बेटे ने वहीं एक विदेशी युवती से शादी कर ली और उनके दो बच्चे भी हो गए। अब तो उसने अपना एक अच्छा सा मकान भी ले लिया है और बच्चों के साथ मज़े से वहीं रह रहा है।
पापा और मम्मी अब काफ़ी बूढ़े हो गए हैं और अक्सर बीमार रहते हैं। पेंशन के जिन रुपयों से गृहस्थी चल जाती थी अब वो कम पड़ने लगे हैं क्योंकि मँहगाई, दवाएँ और फलों का खर्च बजट बिगाड़कर रख देता है।
माँ ने बार-बार फोन करके बेटे को घर आने के लिए कहा क्योंकि पापा बहुत बीमार चल रहे थे। बेटा किसी तरह समय निकालकर पिताजी की बीमारी का हाल-चाल जानने चला आया। माँ-पिताजी बेटे को देखकर बहुत ख़ुश हुए और बहू और पोते-पोती को साथ न लाने पर नाराज़ भी हुए। आज बरसों बाद रसोई में कई चीज़ें एक साथ बनीं और बेटे को ख़ूब खिलाया-पिलाया।
बेटे ने पिताजी से पूछा, ‘‘अब तो इंडिया में भी प्रॉपर्टी के दाम बहुत बढ़ गए हैं। अपना मकान कितने का चल रहा है?’’ ये सुनकर पिताजी को अच्छा नहीं लगा और वो सुना-अनसुना कर गए। बेटे का अगले दिन ही वापस लौटने का कार्यक्रम था। जाते हुए बेटा इतना ही बोल पाया, ‘‘टेक केयर पापा।’’ यह सुनकर मम्मी की आँखों में आँसू भर आए और वे मन में सोचती ही रह गईं, ‘‘बट हू विल टेक केयर?’’
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