
व्याख्याता (अंग्रेजी)
घोटिया-बालोद, छत्तीसगढ़
मार्च, 2023
विवाह की सभी रस्में पूरी हो चुकी थी। विदाई की बेला आई। मंडप में स्वजन-परिजन सब उपस्थित थे। तभी एक ने कहा- ‘लो जल्दी करो जी। बहुत रात हो रही है। एक बजे से पहले विदाई हो जानी चाहिए। बहुत दूर भी जाना है।’
शीघ्रता करने के बावजूद विदाई में टाइम लग ही गया; और टाइम लगना ही था, वैशाली बचपन में ही गुजरी माँ की इकलौती बेटी जो थी। चार बड़े भाई-भाभियों के लाड़-प्यार में पली-बढ़ी यौवन की दहलीज पर कदम रखा था उसने।
विदाई होते तक सबकी आँखें नम थीं। थोड़ी देर बाद सब सामान्य हुआ। फिर सभी भाई मेहमानों के देखरेख में लग गये। भाभियाँ भी इधर-उधर व्यस्त हो गयीं। पर अभी भी मंडप में दो आँखें ऐसी थीं, जो डबडबाती ही जा रही थीं। वे दो आँखें पिता की
