आँधी (लघुकथा)

मार्च, 2023

सविता स्याल
गुरुग्राम, हरियाणा

मैं ‘बाटला निवास’ हूँ। मेरी शानौ-शौकत देख आप चकित रह जायेगें। मेरे मालिक के कुछ मित्रा मुझे ‘महल’ कहते हैं क्योंकि बहुत मँहगे सामान से मुझे बनाया गया है। कुछ दिन से यहाँ चहल-पहल बढ़ गयी है मुझे फिर से पेन्ट करवाया गया, घर का कोना-कोना चमकाया गया।
तीन वर्ष बाद इस घर का इकलौता बेटा न्यूजीलैंड से आ रहा है। इसीलिये अधेड़ उम्र के माँ बाप, यानि ‘बाटला दम्पति’ अपने सारे रोग भूल बस उसके आने की तैयारी में जुट गये। साहब नये पर्दे, सोफा कवर, कुशन आदि खरीदने में व्यस्त थे तो मेम साहब बेटे की पसन्द के खाने का सामान जुटाने में। मैंने भी तो सुना था मेम साहब को कहते, ”देखो जी ग्रीन टी, बिस्लरी वाटर तो ले आयी हूँ एक दिन बेटे बहू को मक्की की रोटी और सरसों का साग खिलाऊँगी, दूसरे दिन मटर के परांठे और….“ ”बस….बस भागवान! तुम्हारी विदेशी बहू ये सब कहाँ खाने वाली है?“ हँसते हुए साहब ने टोका था। ”कोई बात नहीं जी, उसके लिये भी मैंने अपनी सहेली के ‘कुक’ से बात कर ली है वह बहू की पंसद का खाना बना देगा।“”
क्षितिज की फ्लाईट सात बजे ”लैंड“ करने वाली थी साहब, मेम साहब पाँच बजे से जल्दी-जल्दी तैयार हो बार-बार घड़ी देख रहे थे। मेम साहब तो गेट के पास ही कुर्सी बिछाकर बैठ गयी, हर गाड़ी का हार्न सुन बाहर झाँकती। शुगर की मरीज़ होने के बावजूद आज बहू-बेटे के साथ दिन की पहली चाय पीने का मन बना बैठी थी।
दस बज गये क्षितिज़ का फोन अब भी स्विच आफ़ आ रहा था। उनकी चिंता बढ़ने लगी। नकारात्मक विचारों ने डेरा डालना आरम्भ कर दिया कि लगभग ग्यारह बजे क्षितिज़ का फोन आया। ”बेटा कहाँ है तू? तेरा फोन भी स्विच आफ आ रहा था? फ्लाईट लेट थी क्या?“ एक ही सॉस में बाटला साहब ने प्रश्नों की झड़ी लगा दी।
”पापा, मैं ताज होटल पहुँच गया हूँ। शाम को मिलने आऊँगा।“ ”क्या ताज़ होटल? वहाँ कहाँ चला गया तू? मैं कुछ समझा नहीं बेटा!“ बाटला साहब की आवाज़ काँपने लगी थी। हड़बड़ी में पास खड़ी मेम साहब उनसे फोन छीनने का असफल प्रयत्न करने लगी। ”पापा! सुजैन को लगा रहा है, घर पर उतनी साफ-सफाई न रहने के कारण कहीं हम बीमार न पड़ जाये इसलिये पाँच सितारा होटल में….“ ये….ये क्या कह रहा है? माँ..बाप का घर होते हुए होटल में रहेगा? तेरा दिमाग खराब हो गया है क्या? और मैं और तेरी माँ क्या कूड़े-करकट में रहते है? बाटला साहब का स्वर तीखा और र्ककश हो चुका था। ”तू….तू तो यहाँ पला बढ़ा है….आकर देख तो सही बेटा! तेरी माँ ने कितनी तैयारी….नहीं…. नहीं….तू ऐसा नहीं कर सकता….मैं कुछ सुनना नहीं चाहता बस तू जल्दी से घर आ….बेटा! राजा बेटा….! हम सुबह से….इंतजार ….स्थिति की नाज़ुकता समझते हुए उन्होंने स्वर धीमा कर लिया। उन्हें अब भी अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था।
”पापा, ये सब शाम को ‘डिसक्स’ करेगें मैं आ तो रहा हूँ। अभी तो मुझे आगरा, जयपुर, उदयपुर और गोवा की टिकटें बुक करवानी है। सुजैन को दिखाना है हमारा इन्डिया कितना ब्यूटीफूल है,
”सुन….सुन तो तू बहू को एक बार लेकर तो आ….तेरी माँ उससे मिलना….“ फोन कट चुका था।
मेम साहब बिस्तर पर बेसुध सी पड़ी थी। साहब रेलिंग का सहारा लिये बोझिल कदमों से सीढ़ियाँ चढ़ मेम साहब के पास जा रहे थे। मुझे ऐसा लग रहा था ‘मानो कोई तेज़ आँधी आयी थी जो मेरी चमक को उड़ा ले गयी।’
****

यह भी पढ़ें  मैं व्यंग्य समय हूँ (व्यंग्य)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top