निपटारा (लघुकथा)

मार्च, 2023

प्रदीप को जब दादी की मृत्यु का दुःखद समाचार मिला तो उसने तुरंत इंडिया आने की बुकिंग करवा डाली। वह दादी की मरणोपरांत वाली सारी रस्में पूरी श्रद्धा से निभाना चाहता था।
बचपन में कार दुर्घटना में माता-पिता के अचानक स्वर्गवास होने के कारण उसे और उसके बड़े भाई को दादी ने ही तो संभाला था और पाल पोस कर बड़ा किया था।
दादी अमेरिका की ठंड सहन नहीं कर पाएगी इसलिए तो चाह कर भी दादा के परलोक सिधारने के बाद उन्हें अपने साथ नहीं रख पाया। अब उसने बॉस से पूरी तीन सप्ताह की छुट्टी मांगी, जिससे वह सतारवें तक, मरणोपरांत की सारी रस्मों में अपनी सक्रिय प्रतिभागिता दर्ज करवा प्रिय दादी की आत्मा को शांति पहुंचा सके।
लेकिन यह क्या! दाह संस्कार के अगले दिन सुबह लगभग सभी सगे संबंधी जा चुके थे और दूसरे शहर से आने वाले भी जाने की तैयारी में थे। वह और उसका भाई, पंडित को साथ ले हरिद्वार गए और अस्थि-विसर्जन के बाद, बड़े भाई ने एक मोटी सी नोटों की गड्डी, पंडित जी के हाथ में थमाते हुए कहा ”पंडित जी! हम तो आज ही वापस जा रहे हैं। अब आप यहां रुके और चौथे से सत्तारवें, तक की सारी रस्में निपटाते रहें।
उधर घर लौटने पर भाभी ने ऐलान किया, ”भैया हम तो कल से अपने-अपने काम पर चले जाएंगे ‘वर्क प्रेशर’ बहुत है, आपको जो चाहिए रामू को बोल दीजिएगा“ प्रदीप आश्चर्यचकित सा उनकी ओर देखता रहा और फिर भारी मन से उसने अपना मोबाइल उठाया और वापसी की बुकिंग के लिएएयरलाइन का नंबर डायल करने लगा।
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