परमार्थ के कारने, साधुन धरा शरीर (नाटिका)

जून, 2025

डॉक्टर सुमन धर्मवीर
विशाखापट्टन
आंध्र प्रदेश

मंच व्यवस्था:
1. मम्मी (महिला) – आयु 58 वर्ष।
2. सूरज सिंह- आयु 61 वर्ष।
3. सुनील सिंह- आयु 30 वर्ष।
4. पूजा- आयु 28 वर्ष।
5. बिट्टू (शिशु)

दृश्य 1
दिल्ली शहर। पुरानी दिल्ली, दरियागंज। गली नंबर पांच में एक घर। हॉल में एल ई डी टी. वी. लगा है। टी .वी. पर राज तक न्यूज चैनल। न्यूज रीडर न्यूज पढ़ कम रही है, चिल्ला ज्यादा रही है): “सबसे सटीक खबरें देने वाला आपका पसंदीदा चैनल “सिर्फ राज तक” न्यूज में देखें आज की ब्रेकिंग न्यूज….(बहुत जोर से) ब्रेकिंग न्यूज। (और जोर से) अभी अभी की ब्रेकिंग न्यूज।”
आवाज से रूम में सोता हुआ बच्चा जग कर रोने लगता है “ऊ आऊं…ऊ आऊं…”
ऑफिस के लिए तैयार होता सुनील सिंह बच्चे को जगता देख फट से उसके बेड पर उसके साथ ही लेट जाता है और उसे सुलाने लगता है। बच्चा फिर से सोने लगता है। सुनील उठ कर फिर से तैयार होने लगता है। कुछ देर में फिर से न्यूज रीडर चिल्लाती है: “अभी अभी की बहु…. त बड़ी… खबर बस राज तक न्यूज चैनल पर”
बच्चा फिर से जग जाता है, ” ऊ आऊं… ऊ आऊं…।”
सुनील फिर से उसके साथ लेट जाता है। बच्चा शू .. शू.. कर देता है। सुनील की शर्ट गंदी हो जाती है। वह फिर भी लेटा रहता है। जब बच्चा फिर से सो जाता है तो धीरे से उठकर अलमारी धीरे से खोल कर दूसरी शर्ट निकाल रहा है और बंद कर रहा है। अलमारी खुलने और बंद होने की आवाज; “फुस्स, फट्ट।”
अलमारी बंद होने के आवाज से बच्चा फिर जग जाता है, “ऊ आऊं… ऊ आऊं…।”
सुनील फिर से बेड पर लेटकर बच्चे को सुलाने लगता है। लेकिन अब बच्चा सोता नहीं। सुनील ऑफिस जाने के लिए लेट हो रहा है। अब वह झल्ला कर हॉल में जाता है। पापा पर गुस्सा करता है, “पापा आपको पता है ना। पूजा ऑफिस गई है। कामवाली अभी तक आई नहीं है। मम्मी बीमार हैं। मुझे ऑफिस जाना है। आप को इतनी जोर-जोर से टी. वी. चला कर देखने की पड़ी है। बिट्टू सोते सोते बार बार उठ जाता है।”
सुनील के क्रोध को सूरज सिंह पी जाता है। तुरंत रिमोट से टी वी बंद कर देता है। और चुपचाप बैठ जाता है। दूसरे कमरे में बीमार मम्मी भी सुनील की गुस्से की आवाज सुनकर सोते सोते करवट बदलती है।
प्रकाश मंद… और मंद
दृश्य परिवर्तन
दरवाजे पर खट खट। सुनील ने दरवाजा खोला। सूरज सिंह का प्रवेश।
सुनील: “पापा कहां गए थे? इतनी रात हो गई।”
सूरज सिंह: “अरे! वो पीछे वाली गली में मिश्रा जी रहते हैं न। उनके साथ उनकी लड़की के लिए लड़का देखने चला गया था। वहां टाइम ज्यादा लग गया। बिट्टू न जग जाए इसलिए मैने बेल नहीं बजाई। सिर्फ दरवाजा खटखटाया”
सुनील: “पापा आज पूजा की नाइट शिफ्ट है। बिट्टू के पास से उठते ही वो जग गया।..। … वैसे भी क्या मतलब आपको मिश्रा जी से? और क्या जरूरत उसकी लड़की के लिए लड़का देखने की? वो कभी हमारे घर झांकने तक नहीं आया। किसी के भी यहां जाते रहते हैं।” (सुनील बड़बड़ाता हुआ अपने रूम में चल जाता है।)
सूरज सिंह चुपचाप अपने बेड पर उदास भाव से लेट जाते हैं। मम्मी कमरे में सुनील की गुस्सेवाली सब बातें सुनकर चुपचाप अपने ही बेड पर करवट लेती है
प्रकाश मंद… और मंद… अंधेरा
सूरज सिंह के पेट में दर्द हो रहा है वह दर्द से कराह रहे हैं। अंदर से मम्मी बोल रही है: “पूजा। पूजा देख बेटा पापा जी को क्या हुआ? क्यों कराह रहे हैं।”
हॉल से ही सूरज सिंह की आवाज: ” मेरे पेट में दर्द हो रहा है”
पूजा (गुस्से से) बोलती है: “पार्टी में जाने का बहुत शौक है पापा जी को। कुछ गलत खा लिया होगा। पी भी ली होगी। पीना तो छोड़ नहीं सकते। लिवर खराब हो गया होगा। मैं क्या करूं? मैं बिट्टू को सम्भालू या इन्हें?…आपके बेटे सुनील की आज नाइट ड्यूटी है। फोन करती हूं। अगर आ जाएंगे तो हॉस्पिटल ले जाएंगे।”
प्रकाश मंद… और मंद… अंधेरा
दृश्य परिवर्तन
सुनील सिंह: “पापा आपने फेसबुक पर क्या शेयर कर दिया? सब लोग मुझसे पूछ रहे हैं।.. आपको फेसबुक पर जरूर ही कंट्रोवर्शियल बातें लिखनी होती हैं? पॉलिटिकल बातें लिखनी होती हैं? सारी पॉलिटिक्स आप ही करोगे? आप क्या बहुत बड़े नेता हो? आपको पता है आपकी पॉलिटिक्स की वजह से मेरी और पूजा की जॉब पर भी खतरा है।”
सूरज सिंह मोबाइल बंद करके चुपचाप बेड पर लेट जाते हैं। अंदर मम्मी बेड पर लेटी लेटी करवट लेती है।
प्रकाश मंद… और मंद… अंधेरा
दृश्य परिवर्तन
संडे दोपहर। सब खाना खाकर आराम से बैठे हैं। तो सूरज सिंह बोलते हैं: “देखना सुनील मेरा व्हाट्सएप हैक हो गया। देखो।”
सुनील: “हां पापा। आपका व्हाट्सएप हैक हो चुका है।”
इतने में ही पूजा उठती हुई बोलती है: ” कुछ काम तो है नहीं। हर समय मोबाइल में ही घुसे रहते हैं। फालतू की चैटिंग कर रहे होंगे।”
सुनील सिंह भी बोलता है: “पापा आपको मैने मना किया था ना कि ज्यादा मैसेज फॉर्वर्ड मत किया करो। कोई गलत मैसेज फॉरवर्ड कर दिया होगा। समाज भलाई का भूत सवार है आप पर तो। अब मैं क्या करूं? अब भुगतो।”
बेटा सुनील और बहू पूजा की गुस्से वाली आवाज सुन सुन कर तंग आ चुके सूरज सिंह की भी आज आवाज गुस्से में ऊंची होती चली गई। सूरज सिंह गरजते हैं: “क्या करना है, क्या नहीं करना है, मुझे कुछ पता ही नहीं। एक तुम ही और तुम्हारी पत्नी ही समझदार हैं इस घर में।… मैं जा रहा हूं इस घर से। किसी को इस घर में मेरी जरूरत नहीं है।”
ऊंची गुस्से वाली आवाज सुनकर मम्मी वॉकर से चलते हुए आई। हॉल के सोफे पर बैठते हुए बोलती हैं: “क्या हुआ? क्यों गुस्सा कर रहे हो? बच्चे हैं।”
अब तो सूरज सिंह का पारा और भी हाई हो गया। बोले: “यह सब तुम्हारे लाड़ प्यार का ही नतीजा है। ये कब समझदार होंगे?.. ये हर रोज मुझे हीन महसूस कराते हैं। ..मैने इतने घर बनाए। कारें खरीदीं, अच्छी पॉजिशन पर रहा। सब बेकार है। मैं इस दुनिया का सबसे निकम्मा आदमी हूं। मुझे कोई समझ नहीं है। घरों के किराए आ रहे हैं। मैं अपने ऊपर खर्च कर रहा हूं? इनका कुछ खा रहा हूं? इनके घर में रह रहा हूं? मुझे शांति से रहने नहीं देते। मैं वन में रहूंगा जाके। अब मैं वानप्रस्थ जीवन जीऊंगा। वहां मुझे शांति और सुकून मिलेगा।”
मम्मी “पर मुझे साथ ले जाना।”
सूरज सिंह: “तुम इसी के साथ रहो अपने लाडले के साथ। हमेशा इसकी साइड ही रहती हो। मेरा साथ तो तुमने छोड़ ही दिया।”
मम्मी: “पर, अब मैं आपके साथ ही रहूंगी”
सूरजसिंह: “हां। अब खाट पकड़ ली तो मैं तुम्हारे साथ ही रहूंगी। बेटे पर बोझ नहीं बनना। बीमारी का बोझ भी मेरे ऊपर ही डालोगी। इसके ऊपर नहीं….( गुस्सा शांत करके)… चलना है तो तैयार हो जाओ। मैं यहां नहीं रुकूंगा एक पल भी”।
मम्मी: “ठीक है। मैं तैयार होती हूं…वैसे वन (जंगल) कहां मिलेगा?”
जब मैं कहती थी कि मुझे एक बगिया चाहिए तब तो आपने सुनी नहीं। अब जंगल कहां से लाओगे?”
सूरज सिंह: “जंगल नहीं मिला तो इस घर को तोड़कर इस जगह पर पेड़ पौधे लगाऊंगा। और वो घर भी तोड़कर वहां भी पेड़ पौधे लगाऊंगा। तीसरे घर को भी गिरा के पेड़ पौधे लगाऊंगा। पर जंगल जरूर बनाऊंगा। इनका दिमाग तो मैं शुद्ध कर नहीं पाया। कम से कम दिल्ली की हवा तो शुद्ध करूं थोड़ी बहुत।”
सुनील सिंह: “मम्मी आप भी इनके साथ? आप क्यों जाओगे इनके साथ? बचपन से देख रहा हूं। अकड़ दिखाते रहते हैं।…मम्मी आपको तो सब पता है ना… बचपन में मुझे मेरी मस्ती पर हमेशा डांटते रहते थे साथ ही आपको भी डांटते थे।.. अब मैंने बड़े होकर जरा सा गुस्सा किया तो सर आसमान पर उठा लिया।”
मम्मी बोलती है (बहुत मृदु स्वर में):
“सुनो… बेटा…बूढ़े पापा पे गुस्सा न करना…।
“पापा से कुछ कहना…. कुछ सुनना…।
कहते…
सुनते….
पापा से प्रेम
हो जाए..ना..,
तो कहना…..।_ 1
माना
पापा, जमाते.. रहे, धौंस घरों की…।
दिखाते..रहे, चढ़
जवानी की..
झाड़ते रहे.. रौब कारों की…
अकड़ हवाई उड़ानों की…।
घमंड अपनी पॉजिशन की…।
मगर
रहे, उन घरों में दिन रात.. हम तुम ही…
घूमे, कारों में आराम से.. हम तुम ही…।
बैठे, उनके मजबूत कंधों.. पे चढ़के हम तुम ही…।
उड़े, शान से साथ उनके … हम तुम भी..।
पैसे, खर्च किए ज्यादा.. हम तुम ने ही..।
राज, रुतबे पर उनके… किये हम तुम ही…।

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सुनो बेटा..
बूढ़े पापा पे गुस्सा न करना…।
पापा से कुछ कहना…।
कुछ सुनना..।
कहते…
सुनते….
पापा से प्रेम
हो जाए ना…
तो कहना….।_2

सुनील सिंह: “ये बात तो सच है वैसे।….
मम्मी मुझे मालूम है कि मै शॉर्ट टेंपर हूं। पर मैं प्रेम भी करता हूं।”
मम्मी: “छिन ही चढ़े छिन ही उतरे, सो तो प्रेम न होय।
अघट प्रेम पिंजर बसे, प्रेम कहावे सोए।”
संत कबीर जी कहते है कि जो क्षण में चढ़े और क्षण में उतरे, वह प्रेम नहीं होता। जो कभी नहीं घटता, उसे कहते हैं प्रेम।”
(सुनील चुपचाप सुन और समझ रहा है)
मम्मी: “गारी ही से उपजे कलह कष्ट औ नीच “यानी गाली से झगड़ा, संताप एवं मरने मारने तक की बात आ जाती है। इससे अपनी हार मानकर जो व्यक्ति विरक्त हो चलता है, वह संत है, और गाली गलौज एवं झगड़े में जो व्यक्ति मरता मारता है, वह नीच है।”
मम्मी: “कुटिल वचन सबते बुरा, जारी करे सब छार।
साधु वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार।”
अर्थात संत कबीर जी कहते हैं कटु वचन सब रिश्तों और संबंधों को जलाकर राख कर देते हैं। वहीं मीठी वाणी बोलने से ठंडक मिलती है, ऐसा लगता है मानो अमृत बरस रहा है।

सुनील सिंह (रूआंसा होकर): “मै सब समझ गया। बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलया कोय,
जो दिल ढूंढा आपना मुझसे बुरा न कोय।….मम्मी
मैं अब कभी अपना पारा हाई नहीं करूंगा। कभी भी किसी को गाली नहीं दूंगा। मम्मी मुझे माफ कर दो।… अगर आपने मुझे माफ नहीं किया तो मैं भी चला जाऊंगा इस घर से।”

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मम्मी: “भागे भला न होएगा कहां धरोगे पांव, सिर सौंपों सीधे लड़ो कहे करो कूदव।” मतलब अच्छा आदमी बस वो होता है, जिसने जान लिया कि वो बुरा है। इसी को आत्मज्ञान कहते हैं।”
सुनील सिंह: “हां मम्मी मैं अब पापा पे गुस्सा नहीं करूंगा। उनके साथ बैठकर उनसे बातें करूंगा। उनके जीवन के अनुभव सुनूंगा।”
मम्मी: “अच्छी बात है। लेकिन बेटा अब तेरे पापा ये घर तो तोड़ेंगे ही। वो जिद्दी हैं। जब उन्हें घर बनाने की जिद्द चढ़ी तो एक पर एक घर बनाते गए। अब उन्हें जंगल बनाने की जिद्द चढ़ी है तो वो जंगल जरूर बनाएंगे। आज जंगल बनाने की जरूरत भी है। कल को बिट्टू को सांस लेने के लिए साफ हवा चाहिए तभी तो वह तंदुरुस्त बनेगा। इसलिए हमें उन्हें नेक काम करने से रोकना भी नहीं है।…….
वृक्ष कब हूं ना फल भखे, नदी न संचय नीर। परमार्थ के कारने साधुन धरा शरीर।
संत कबीर जी कहते है कि वृक्ष कभी स्वयं के फल फूल इत्यादि का सेवन नहीं करते। नदियां कभी बहती धारा का जल ग्रहण नहीं करतीं स्वयं के लिए।”
मतलब प्रकृति ही मूल कारण है हर प्रकार के जीवन की और आज ग्लोबल वार्मिंग इतने प्रकार के प्रदूषण, जिसमें मानसिक प्रदूषण भी शामिल है। आज निजस्वार्थ, भौतिक धनभोग, इंद्रियसुख तक ही हमारी मानसिकता सीमित हो चुकी है। दूसरी बात जीवन केवल घर परिवार, पालनपोषण तक ही सीमित नहीं होना चाहिए। अपनी अपनी क्षमता व सामर्थ्य के अनुसार सामाजिक व नैतिक कार्यों में भी योगदान अपने अपने अनुसार देना चाहिए। इतना तो हर कोई कर ही सकता है।”
सुनील: “हां। मम्मी मै भी पापा के साथ सामाजिक व नैतिक काम किया करूंगा।”
मम्मी: “तो जाओ। उनसे माफी मांग लो। तुम उनसे माफी मांग लोगे तो वो इतने निष्ठुर भी नहीं हैं। उन्होंने जिंदगी भर बहुत मेहनत की है। अब उनकी सुख, शांति की जिम्मेदारी हम, तुम, सब मिलकर उठा लेंगे न।.. जाओ अभी बहुत दूर नहीं पहुंचे होंगे। फोन करो। कैसे भी वापस बुलाओ।”
पूजा (कमरे से बाहर आकर): “मम्मी जी मैने पापाजी से फोन करके माफी मांग ली है। बड़ी मुश्किल से वो माने हैं। सुनील आप जाओ। लो बिट्टू को लो…. इसकी कसम खिलाकर उन्हें वापस लाओ।”
सुनील सिंह: “हां, मै जाता हूं पापाजी को बुलाने।” (चला जाता है)
प्रकाश मंद… और मंद…
दृश्य परिवर्तन
पूजा (मम्मी के पैर छूते हुए): “मम्मी जी आपने बीमारी का अच्छा नाटक किया। सुनील का गुस्सा जो नाक पे रहता था। अब उतर गया। वो तो अच्छा है कि पापाजी इसलिए सुनील का गुस्सा इतने दिनों तक सहन किए क्यों कि आप बीमार थे।”
मम्मी (आशीर्वाद देते हुए): “जुग जुग जियो। सदा सुहागन रहो। अब हम दोनों को इनका गुस्सा नहीं झेलना पड़ेगा ….(मुस्कुराते हुए और गर्दन हिलाते हुए) वैसे पूजा तुम भी अच्छा नाटक कर लेती हो। हम सास बहू की जोड़ी दमदार है। अब दोनों बाप बेटे का गर्म दिमाग हमेशा के लिए ठंडा हो जाएगा।”
पूजा (मुंह फूला के): “पर पापाजी की नजरों में मै भी बुरी बन गई।”
मम्मी “कोई बात नहीं। उनका दिमाग भी सातवें आसमान पर रहता है। बस एक बार अच्छी सी प्योर दूध की अदरक वाली चाय बना के पिला देना। और पैर छू के माफी मांग लेना। वो प्योर दूध वाली गर्म चाय पीते पीते भी पानी पानी हो जाएंगे। ये दोनों भी खुश हम दोनों भी खुश।”
(सास बहू दोनों हंसती रहीं)
प्रकाश मंद… और मंद….
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