मार्च, 2024
क्यों चर्चा में है ‘पॉपकॉर्न माइंड’?

मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में आजकल एक शब्द अत्यंत चर्चा में है—‘पॉपकॉर्न ब्रेन’ (Popcorn Brain) अथवा ‘पॉपकॉर्न माइंड’। विश्वभर में इससे प्रभावित लोगों की संख्या इतनी तीव्र गति से बढ़ रही है कि कई अध्ययनों में इसे ‘महामारी’ तक की संज्ञा दी जाने लगी है।
वर्तमान ‘ग्लोबल विलेज’ के युग में सूचनाओं का भंडार तो उपलब्ध है, किंतु सूचनाओं की अतिशयता (Information Overload) के कारण व्यक्ति की सोचने, समझने और उनका विश्लेषण करने की क्षमता निरंतर कम होती जा रही है। वर्ष 2019 में ‘नेचर कम्युनिकेशन्स’ (Nature Communications) में प्रकाशित एक अध्ययन का निष्कर्ष था कि लोगों का सामूहिक ध्यान (Collective Attention Span) घटने लगा है, जो कि सोशल मीडिया के अत्यधिक उपयोग का दुष्परिणाम है। बाद में हुए कई अन्य अध्ययनों ने भी इस तथ्य की पुष्टि की।
क्या है यह समस्या?
यह एक प्रकार का मानसिक सिंड्रोम (Syndrome) है, जिसमें मस्तिष्क किसी एक विषय या कार्य पर केंद्रित नहीं रह पाता। यह निरंतर कुछ नया और त्वरित उत्तेजना (Instant Dopamine) खोजने के लिए एक विचार से दूसरे विचार पर भटकता रहता है।
परिणामस्वरूप, व्यक्ति किसी भी महत्वपूर्ण कार्य पर ध्यान केंद्रित करने में असमर्थ हो जाता है और धीरे-धीरे अपने दैनिक कार्यों को भी ठीक से संपादित नहीं कर पाता। जिस प्रकार गर्म बर्तन में पॉपकॉर्न (भट्टा) एक सेकंड के लिए भी शांत न रहकर उछलता रहता है, ठीक उसी प्रकार मस्तिष्क भी क्षण भर के लिए शांत नहीं रहता और भटकता रहता है; इसीलिए इसे यह नाम दिया गया है।
प्रमुख लक्षण
प्रारंभिक लक्षण: निरुद्देश्य होकर बार-बार टीवी के चैनल बदलना, मोबाइल स्क्रीन को निरंतर स्क्रॉल (Scroll) करते रहना, किताबों के पन्ने तेज़ी से पलटना आदि।
मानसिक व शारीरिक प्रभाव: अनिद्रा (Insomnia), चिड़चिड़ापन, अवसाद, बेचैनी और किसी भी कार्य में मन न लगना।
मूड स्विंग्स (Mood Swings): मन की स्थिति में तेज़ी से परिवर्तन होना—अचानक अत्यधिक प्रसन्न हो जाना और अगले ही क्षण अत्यधिक दुखी या क्रोधित हो जाना।
कितना गंभीर है यह संकट?
पॉपकॉर्न सिंड्रोम के कारण मस्तिष्क कभी संतुष्ट अनुभव नहीं कर पाता; वह सदैव अशांत और व्यग्र रहता है। व्यक्ति के भीतर धैर्य, चिंतन, विश्लेषण और स्मरण शक्ति क्षीण होने लगती है, जिसका प्रत्यक्ष नकारात्मक प्रभाव उसके पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक संबंधों पर पड़ता है।
इस बीमारी का सबसे खतरनाक पहलू:
मरीज़ को स्वयं यह आभास ही नहीं होता कि वह बीमार हो रहा है या किसी लत का शिकार हो चुका है। उसका मस्तिष्क उसे यह भ्रम दिलाता है कि उसके पास बहुत से अनिवार्य कार्य हैं; जैसे—स्क्रीन पर पॉप-अप होने वाले प्रत्येक नोटिफिकेशन और मेसेज पिंग (Ping) को तुरंत देखना। व्यक्ति यह भूल जाता है कि इन निरर्थक गतिविधियों को न करने से कोई हानि नहीं होगी, फिर भी वह इन्हें अपना कर्तव्य समझकर करने लगता है।
अनेक बार लोग सोशल मीडिया पर प्राप्त सूचना की सत्यता की जाँच किए बिना, उसका विश्लेषण किए बिना, उसे तुरंत आगे फॉरवर्ड करना अपना दायित्व मान बैठते हैं। चिकित्सा विज्ञान की भाषा में इसे ‘माइंड गेम’ कहते हैं, जो मस्तिष्क व्यक्ति के अवचेतन के साथ खेलता है।
बचाव और रोकथाम के व्यावहारिक उपाय
चिकित्सक और विशेषज्ञ इस समस्या से सुरक्षित रहने के लिए निम्नलिखित सुझाव देते हैं:
रचनात्मक गतिविधियों में मन लगाएँ: किसी रुचि (Hobby) को विकसित करें और उसके लिए नियमित समय निकालें; जैसे—बागवानी करना, बच्चों को पढ़ाना, संगीत सुनना, चित्रकारी आदि।
पठन की आदत: प्रतिदिन समाचार पत्र और ज्ञानवर्धक पुस्तकें पढ़ने का अभ्यास करें।
शारीरिक सक्रियता: नियमित रूप से सुबह की सैर, योग और व्यायाम करें।
सामाजिक जुड़ाव: डिजिटल दुनिया से बाहर निकलकर लोगों से प्रत्यक्ष मिलें-जुलें और संवाद स्थापित करें।
ध्यान और योग: मानसिक शांति और एकाग्रता के लिए प्रतिदिन ध्यान (Meditation) करें।
स्क्रीन टाइम सीमित करें: मोबाइल, टीवी या कंप्यूटर के सामने बिताए जाने वाले समय (Screen Time) को कम करें। निरुद्देश्य स्क्रॉलिंग से बचें और पसंदीदा कार्यक्रमों के लिए समय सीमा निश्चित करें। सप्ताह में कम से कम 1 दिन मोबाइल से पूरी तरह दूर रहें (डिजिटल डिटॉक्स / Digital Detox)।
ऑडियो माध्यमों का उपयोग: यदि कुछ उपयोगी सामग्री देख रहे हैं, तो केवल स्क्रीन देखने के बजाय पॉडकास्ट या ऑडियो फॉर्मैट का प्रयोग करें। (ध्यान रखें कि बहुत अधिक ब्लूटूथ या इयरफ़ोन का प्रयोग भी कानों और मस्तिष्क के लिए हानिकारक है।)
निष्कर्ष:
हमारा मस्तिष्क ही पूरे शरीर का संचालन करता है। यदि मस्तिष्क ही आक्रांत और अस्वस्थ रहेगा, तो शरीर भला स्वस्थ कैसे रह सकता है? निरुद्देश्य और निरर्थक चीज़ों के पीछे भागकर अपना स्वास्थ्य और पारिवारिक जीवन नष्ट करना है या थोड़ी सी सजगता रखकर स्वस्थ जीवन जीना है—यह विकल्प पूर्णतः हमारे ही हाथों में है।
