भाषा और सम्मान

सितंबर, 2025

मनोज कुमार
वाल्मीकि नगर, प. चंपारण, बिहार


शहर के एक बड़े बैंक में सुबह से ही भीड़ थी। ग्राहक कतार में खड़े अपने-अपने काम निपटाने की जल्दी में थे। इसी भीड़ के बीच एक बुज़ुर्ग व्यक्ति अंदर आए। सफेद धोती-कुर्ता, झुके कंधे, कांपते हाथों में एक पुरानी फाइल और चेहरे पर उम्र की झुर्रियों के बीच झलकता आत्मसम्मान। उनका नाम था रामदयाल जी।
रामदयाल जी खिड़की पर पहुँचे और बोले- ‘मुझे जमा करने का फार्म चाहिए।’
क्लर्क ने यंत्रवत् फार्म थमा दिया। फार्म अंग्रेज़ी में छपा हुआ था और छोटे-छोटे महीन अक्षरों में नीचे हिंदी में भी लिखा था। लेकिन बुज़ुर्ग की कमजोर आँखें उन अक्षरों को पढ़ पाने में असमर्थ थीं। उन्होंने कोशिश की, पर अक्षर धुंधले हो गए।
उन्होंने पास खड़े एक युवक की ओर देखा और विनम्र स्वर में कहा-
‘बेटा, मेरी मदद कर दो। यह फार्म भर दोगे?’
युवक ने फार्म पर नज़र डाली और हँसते हुए बोला-
‘अरे बाबा, आपको अंग्रेज़ी नहीं आती? आज के जमाने में बिना अंग्रेज़ी कोई काम चलता है क्या? आप तो बिल्कुल पुराने जमाने के आदमी लगते हैं।’
उसकी आवाज़ में व्यंग्य था। आसपास खड़े कुछ लोग मुस्कुराने लगे।
रामदयाल जी चुप हो गए। उनके चेहरे पर पीड़ा और असहायता की झलक स्पष्ट थी।
तभी बैंक मैनेजर सुधीर जी वहाँ आ पहुँचे। उन्होंने स्थिति को समझते हुए मुस्कुराकर कहा- ‘रामदयाल जी, परेशान मत होइए। आइए, बैठिए। मैं आपकी मदद करता हूँ।’
सुधीर जी ने फार्म अपने हाथ में लिया और हर कॉलम को हिंदी में समझाने लगे-
‘यहाँ आपका नाम लिखना है, यहाँ पता, यहाँ राशि… बस आप बताइए, मैं भर देता हूँ।’
रामदयाल जी ने सहज होकर धीरे-धीरे सब बताया। सुधीर जी फार्म भरते गए। कुछ ही देर में पूरा फार्म तैयार हो गया।
रामदयाल जी ने राहत की साँस ली। उनकी आँखों में चमक लौट आई। उन्होंने भावुक स्वर में कहा -’आपने हिंदी में समझाया, तो काम आसान हो गया। मेरी उम्र और मेरी आँखें अब अंग्रेज़ी के इन छोटे अक्षरों को नहीं पढ़ पातीं। लेकिन हिंदी में सुनकर मुझे आत्मविश्वास मिला। धन्यवाद।’
बैंक में उपस्थित लोग यह दृश्य देख रहे थे। वही युवक, जिसने कुछ देर पहले उनका मज़ाक उड़ाया था, अब संकोच से भर गया। वह आगे बढ़ा और धीमे स्वर में बोला- ‘बाबा, मुझे क्षमा कर दीजिए। मैंने मजाक किया। सच है, भाषा से कोई बड़ा या छोटा नहीं होता।’
सुधीर जी ने सभी ग्राहकों की ओर देखते हुए कहा- ‘मित्रों, हमें यह याद रखना चाहिए कि कामकाज में मातृभाषा को प्राथमिकता देना ज़रूरी है। अंग्रेज़ी का ज्ञान अपनी जगह महत्त्वपूर्ण है, लेकिन हिंदी को कमतर समझना भूल है। हमारी मातृभाषा हमारे संस्कारों और आत्मविश्वास से जुड़ी है। और जब हम अपने बुज़ुर्गों से उनकी भाषा में संवाद करते हैं, तो उन्हें सम्मान और सहारा दोनों मिलता है। भाषा दीवार नहीं, सेतु है। संस्कार कभी भाषा की वजह से बाधित नहीं होते, बल्कि भाषा उन्हें और मज़बूत बनाती है।’
रामदयाल जी के चेहरे पर अब संतोष और गर्व की आभा थी। उन्होंने मैनेजर की ओर देख कर धीरे से कहा- ‘आज मुझे विश्वास हुआ कि हिंदी में अपनापन है। जब अपनी भाषा का सम्मान होता है, तो बुज़ुर्गों का भी मान बढ़ता है।’
बैंक का वह दिन सबके लिए एक अनमोल सीख बन गया। लोग यह समझ गए कि हिंदी केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि आत्मा की भाषा है और बुज़ुर्गों का सम्मान करना ही हमारी असली पहचान है।
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