मार्च, 2023

सुदामा नगर,ए सेक्टर, अन्नपूर्णा मार्ग, इंदौर, मध्य प्रदेश
यूं तो सुबोध और प्रिया में बहुत पटती थी, किंतु भारतीय संस्कृति की कट्टर प्रशंसक होने के कारण, जब सुबोध उसे “दकियानूसी” कहता तो दोनों में बहस हो जाया करती। इन दिनों दोनों रूस में प्रिया के भाई के यहां थे।
आज सुबह जब प्रिया ने उससे कहा- “रूस के लोग अपनी भाषा से कितना प्रेम करते हैं… एक हम हैं, जो अपनी भाषा को तुच्छ मानकर विदेशी भाषा को बोलने में अपनी शान समझते हैं!” तब सुबोध ने महसूस किया कि प्रिया ने उसे चिढ़ाने के लिए यह कटाक्ष किया है।
आज जब वे दोनों रूस के महान लेखक मैक्सिम गोर्की के निवास स्थल पहुंचे, तब वहां गाइड पर्यटकों को बता रहा था- “….. जब रूसी क्रांति सफल हुई तो सरकार ने मास्को में काचालोव स्ट्रीट पर इस भवन का चयन किया। यहां लेखक गोर्की ने अपने जीवन के अंतिम 5 वर्ष बिताए थे। अंदर आप देखेंगे कि इस मकान में गोर्की की लाइब्रेरी, उनकी कलम, भोजन की टेबल, चाय के प्याले आदि अब तक हिफाजत से रखे हैं।”
क्योंकि पूरी बात रशियन भाषा में कही गई थी, इसलिए प्रिया को थोड़ी ही बात समझ में आयी। सुबोध मकान के बाहर लगे बोर्ड को देख रहा था, जिसमें गोर्की के चित्र के साथ-साथ उनकी जीवनी लिखी हुई थी।
“प्रिया…!” सुबोध ने आवाज लगाई। प्रिया उसके करीब आई तो वह बोला- “यह वह मकान है जहां रोम्यारोला, एंटन चेखोव, एच.जी. वेल्स, स्टीफन आदि इकट्ठा हुआ करते थे और मैक्सिम गोर्की से उनकी घंटों चर्चाएं होती थीं।”
उसी समय कहीं से आवाज आई और दोनों चौंक उठे-“… कलाकारों, साहित्यकारों को यहां कितना सम्मान मिलता है, और एक हम हैं, जो उन्हें याद करने की सिर्फ औपचारिकताएं ही निभा रहे हैं!” संवाद हिंदी में बोला गया था। गोर्की के निवास-स्थान को देखकर चार- पांच लोगों का एक समूह मुख्य द्वार से बाहर निकल रहा था, उसी में से आवाज आई थी।
प्रिया तो वहीं खड़ी रह गई, लेकिन सुबोध अपनी खुशी नहीं दबा पाया और वह उनसे मिलने चल दिया। कुछ देर बाद जब लौटा तो प्रसन्नता से फूला नहीं समा रहा था “सुनो प्रिया सुनो! वे सभी भारतीय वैज्ञानिक थे। शासन ने उन्हें 2 माह के लिए यहां भेजा है। आज शाम को उन्होंने हमें खाने पर बुलाया है। हम लोग आपस में मिलकर कितने खुश हुए, उसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता!”
“चलो, आज आपने मातृभाषा और भारतीयता का महत्व तो समझा!” “सचमुच, वह मेरी भूल थी!”
