दिसंबर, 2023

गुरुग्राम, हरियाणा
मित्रों! घर के बड़े बुजुर्ग परिवार की धुरी माने जाते हैं परंतु यह देख, सुनकर दुःख होता है कि समय के साथ-साथ परिवार की इस आधारशिला को बोझ समझा जाने लगा है उन्हें यथोचित आदर, सम्मान एवं देखरेख के स्थान पर अपने ही बच्चों से उपेक्षा एवं तिरस्कार मिलता है। परिणामस्वरूप उन्हें वृद्धाश्रम की शरण लेनी पड़ती है या यू कहे उन्हें वृद्धाश्रम में रहने के लिए मजबूर किया जाता है।
इसी देश में एक श्रवण कुमार हुआ जो अपने दृष्टिहीन माता-पिता की इच्छा को पूर्ण करने के लिए उन्हें बहगीं में बिठा अपने कंधों पर उठा तीर्थ करवाने ले गया। प्रश्न उठता है कि श्रवण कुमार जैसे नौजवानों के देश में ऐसी स्थिति क्यों बन रही है आखिर इसके पीछे क्या कारण है?
मेरा ऐसा मानना है कि इस भौतिकतावादी युग में हम संस्कारों को पीछे छोड़ते जा रहे हैं। आजकल के माता-पिता पैसा कमाने की होड़ में बच्चों को समय और संस्कार देना महत्वपूर्ण नहीं समझते। बड़े-बड़े फ्लैट और लंबी बड़ी गाड़ियों के सपने देखने वाले अभिभावक पूरा-पूरा दिन बच्चों को कामवाली बाई के भरोसे या डे केयर में छोड़ अपना कैरियर बनाने और पैसा कमाने में व्यस्त हैं।
बच्चों को नैतिक शिक्षा एवं संस्कार देना वह आवश्यक ही नहीं समझते। परिणामस्वरूप बड़े होने पर यह बच्चे भी उन्हें समय नहीं देते, उनकी आवश्यकताओं के प्रति बेरुखी दिखाते हैं वह भी उन्हें अपने साथ रखने के स्थान पर वृद्धाश्रम में भेजना पसंद करते हैं। कुछ स्वाभिमानी माता-पिता तिरस्कार न सहना पड़े इसलिए स्वयं ही वृद्धाश्रम की शरण में चले जाते है।
एकल परिवारों का बढ़ता चलन
आजकल स्थिति एवं परिस्थितिवश अनेक युवा दंपति अपनी रोजी-रोटी के चलते दूर-दराज के शहरों में जाकर बस जाते हैं वह अपनी छोटी-सी अलग गृहस्थी बसा लेते हैं। छोटे-छोटे फ्लैटों में रहने वाले युवा दंपति अपने साथ माता-पिता को रखना पसंद नहीं करते या स्थान कम होने का बहाना बना लेते हैं वह उनके उपकारों को भूलकर, उनके प्रति अपने दायित्व की अवहेलना करते हुए अपना स्वच्छंद जीवन व्यतीत करना चाहते है।
विदेशों में बसने का आकर्षण
आजकल विदेशों में जाकर बसने का चलन बढ़ता ही जा रहा है। बेटे-बेटियां विदेश जाकर वही रच-बस जाते हैं। बेचारे माता-पिता यहां अकेले रह जाते हैं।
दुर्भाग्यवश यदि पति या पत्नी में से एक पहले स्वर्ग सिधार जाये तो यह अकेलापन और बढ़ जाता है। इस अकेलेपन को दूर करने के लिए वह अपने हमउम्र साथियों को तलाश करते हैं और वृद्ध आश्रम का सहारा लेते हैं।
आजकल आर्थिक रूप से संपन्न कुछ अभिभावक सीनियर सिटीजन कॉलोनियों में जाकर बस जाते हैं। वहां पैसा खर्च करने पर सुख-सुविधाएं तो मिल जाती हैं परंतु अपनों का साथ अपनों की आत्मीयता को वह वहां भी तरस जाते हैं।
जीवन की सांझ अपनों की आत्मीयता और प्रेम रूपी दीपक से रोशन होती है।
भारत ऐसा देश है जहां दिन का शुभारंभ माता-पिता के चरणस्पर्श और आशीर्वाद से किया जाता था। हम सभी का प्रयत्न होना चाहिए कि भावी पीढ़ी भारतीय संस्कृति को न भूले, अपनी जड़ो से जुड़े रहे, संस्कारवान बने। अभिभावक भी युवा पीढ़ी से सामंजस्य स्थापित करने का प्रयत्न करें। जेनरेशन गैप कम हो। बुजुर्गों का अनुभव और युवा पीढ़ी की ऊर्जा एक स्वस्थ समाज को जन्म देगी।
