प्रकृति का नियम और वृद्धावस्था का सहज स्वीकार

दिसंबर, 2023

प्रिय पाठकों,
नमस्कार!
यह कथा सत्य है, काल्पनिक है या सांकेतिक—मुझे नहीं पता; किंतु सुना है कि हज़ारों वर्ष पूर्व हमारे देश में एक राजा हुए थे। राजा परम पराक्रमी, शौर्यशाली और धर्म-परायण थे। समय बीता, उनके पुत्र युवा हो चले और वे स्वयं वृद्ध। किंतु वे बूढ़े नहीं होना चाहते थे। उन्हें एक वरदान (या विद्या) प्राप्त थी कि वे चाहें तो किसी से भी अपने शरीर की अवस्था का विनिमय कर सकते थे—अर्थात अपना बुढ़ापा देकर किसी की युवावस्था ले सकते थे।

उन्होंने अपने पुत्रों के समक्ष अपनी यह इच्छा प्रकट की। किंतु उनका कोई भी बड़ा पुत्र अपनी युवावस्था देकर पिता का बुढ़ापा लेने को तैयार नहीं हुआ; भले ही इसके बदले उन्हें राजा का विशाल राज्य और ऐश्वर्य ही क्यों न मिलता। उनका मानना था कि बुढ़ापे का दुर्बल और अशक्त शरीर लेकर राज्य के वैभव का कोई उपभोग नहीं किया जा सकता। अंततः राजा का सबसे छोटा पुत्र पिता की वृद्धावस्था लेकर अपनी युवावस्था देने के लिए सहर्ष तैयार हो गया।

किंतु कहानी यहीं समाप्त नहीं होती। सैकड़ों वर्षों तक उधार के युवा शरीर से विभिन्न सांसारिक सुख भोगने के बाद भी राजा का मन तृप्त नहीं हुआ। अंततः उन्हें यह बोध हुआ कि उन्होंने सुखों का उपभोग नहीं किया, बल्कि सुखों व तृष्णाओं ने ही उन्हें भोग लिया है।

उन्होंने स्वीकार किया कि केवल उपभोग से कामनाओं की तृप्ति संभव नहीं है; वे अग्नि में आहुति की भाँति और भड़कती हैं। अतः प्रकृति के शाश्वत नियमों को स्वीकार करते हुए स्वाभाविक शरीर को धारण करना ही सही मार्ग है। उन्होंने अपने पुत्र को उसकी युवावस्था लौटाकर अपना बुढ़ापा वापस ले लिया और समस्त भोग-विलास से विरक्त होकर आत्म-कल्याण हेतु तपस्या में लीन हो गए। यह पौराणिक कथा है राजा ययाति और उनके सहृदय छोटे पुत्र पुरु की।

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ययाति की कथा से मिलती-जुलती कहानियाँ विश्व की अन्य प्राचीन सभ्यताओं में भी मिलती हैं। यूनानी (ग्रीक) पौराणिक कथाओं में क्रोनस (Cronus/Chronos) की कथा आती है। क्रोनस को एक भविष्यवाणी द्वारा ज्ञात हुआ था कि उसकी अपनी ही संतान उसका वध करेगी। इस भय से वह अपनी प्रत्येक संतान को जन्म लेते ही निगल (मार) जाता था।

किंतु उसकी पत्नी ने चालाकी से अपने एक पुत्र (ज़्यूस) को बचा लिया, जिसकी भनक क्रोनस को नहीं लगी। अंततः वही हुआ जिसका उसे भय था—उसी पुत्र ने बड़े होकर क्रोनस को सत्ताच्युत किया। क्रोनस को ‘समय का देवता’ माना जाता है और उसी के नाम पर आज भी ‘क्रोनोलॉजी’ (Chronology – कालक्रम) शब्द प्रचलित है। यदि इस कथा के सांकेतिक अर्थ को समझें, तो संदेश स्पष्ट है—प्रत्येक आने वाला नया समय पूर्ववर्ती समय को विस्थापित कर ही देता है।

अमरत्व की चाहत और चिर-युवा रहने की आकांक्षा से जुड़ी कथाएँ लगभग सभी संस्कृतियों में विद्यमान हैं। इसका सीधा अर्थ यही है कि मृत्यु का भय और युवावस्था को थामे रखने की लालसा एक स्वाभाविक मानवीय स्वभाव है।

किंतु यह भी उतना ही परम सत्य है कि हम चाहें या न चाहें, यदि हम जीवित हैं तो बुढ़ापा आएगा ही, शरीर शिथिल होगा ही और नई पीढ़ी धीरे-धीरे पुरानी पीढ़ी को विस्थापित करेगी ही।

तो क्यों न हम इस शाश्वत सत्य को सहर्ष स्वीकार कर लें? क्यों न बुढ़ापे का स्वागत खुले मन और प्रसन्नात्मा से करें? और क्यों न जीवन के इस अंतिम पड़ाव में भी स्वयं को प्रासंगिक व विचारशील बनाए रखने का प्रयास करें?

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आशा है, पूर्ववर्ती अंकों की भाँति यह अंक भी आप सभी प्रबुद्ध पाठकों को पसंद आएगा। अपने अमूल्य विचारों से हमें अवश्य अवगत कराएँ।
धन्यवाद!

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