सितंबर, 2023
संगीता अजय दरक माहेश्वरी
मनासा, जिला- नीमच, मध्यप्रदेश
कितना बताती कितना छुपाती है ये आँखे,
खुशी और दर्द में भी साथ निभाती है ये आँखे।
बस में होता तो आँसुओ को रोक लेती,
कभी-कभी छलक भी जाती है ये आँखे।
कभी सब कुछ देखती और कभी देख कर भी
अनदेखा करती है ये आँखे।
करुणा प्रेम हो या हो क्रोध सारे भाव
अपने में समाती है ये आँखे।
कभी दर्द से कराहती तो कभी खुशी से
भर आती हैं ये आँखे।
खोलती यही दिल के द्वार
मिलाती नजरें हो जाता प्यार।
सच्चा झूठा देखती संसार, अपने परायो की
करती परख ये आँखे।
समंदर से गहरी तो कभी झील-सी
बुनती कई ख़्वाब ये आँखे।
कभी किसी के इंतजार में निहारती
तो कभी किसी को जी भर देखती ये आँखे।
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