जून, 2025

गुरुग्राम, हरियाणा
मित्रों! भारत जैसे अहिंसा प्रिय देश में निरंतर बढ़ती हत्या एवं हिंसा की हृदय विदारक घटनाएं दिल को दहला देती हैं। जिस अहिंसा के बल पर हमने अंग्रेजों को देश छोड़ देने के लिए बाध्य कर दिया और भारत को आजाद करवाया इस देश में दिनों दिन बढ़ती अहिंसा एवं हत्या की घटनाएं न केवल विश्व में हमारी छवि को धूमिल करती हैं अपितु हम सभी के लिए चिंता का कारण बनती जा रही है।
आश्चर्य तो तब होता है जब सृजन की देवी एवं प्रेम का पर्याय माने जाने वाली स्त्रियां भी हिंसा एवं हत्या जैसे कुकर्म करने लगी है। पति को मारकर उसके शव को ड्रम में डाल सीमेंट से ढक देने वाली मेरठ की मुस्कान हो या हनीमून के लिए मेघालय गई इंदौर की सोनम द्वारा पति राजा रघुवंश की हत्या के षड्यंत्र का मामला या एक बॉक्सर पत्नी द्वारा थाने में पति की गई पिटाई। ऐसी घटनाएं विशेषकर हमारे देश में चौंकाने वाली है।
एक ओर महिला सशक्तिकरण एक सुखद उपलब्धि मानी जाती है और देश के विकास में उनका योगदान गौरवान्वित करता है दूसरी ओर महिलाओं द्वारा प्रेम प्रसंग के चलते पति एवं बच्चों तक की हत्या के मामले शर्मसार करते हैं।
पुरुषों में हिंसा के कारणों पर शोध करने पर कुछ तथ्य सामने आए हैं। जैसे-
Þ पुरुष वर्चस्व यानी स्त्री को अपने से कमजोर समझना और उसका शोषण;
Þ पुरुष का अपनी कुंठाओं से मुक्ति पाने के लिए औरत पर वार करना;
Þ कुछ पुरुषों को लड़ना रोमांचक लगता है वह महिलाओं के प्रति हिंसक हो इस रोमांच का आनंद लेना चाहते हैं;
Þ शराब या किसी अन्य नशे के वशीभूत हो पुरुष अपना विवेक को देता है और केवल हिंसक ही नहीं हत्यारा भी बन जाता है;
Þ गरीबी, कर्ज, बेरोजगारी आदि से जूझते पुरुष भी आवेश में आकर हत्या जैसा जघन्य कृत्य कर बैठते हैं।
स्त्रियों के हिंसक होने के मुख्य कारण-
Þ विवाहेतर संबंध: ऐसी अनेक घटनाएं पढ़ने में आती है जहां प्रेमी के साथ मिलकर जीवनसाथी को ही बाधा समझ कर उसकी हत्या कर दी गई हो;
Þ किसी पुरुष द्वारा शारीरिक एवं मानसिक रूप से प्रताड़ित होने पर आत्म सम्मान का आहत होना;
Þ किसी बलात्कारी से बचाव अथवा आत्म सुरक्षा करते हुए औरतों द्वारा हत्या;
Þ घृणा एवं शोषण को झेलते हुए पुरुष समाज के प्रति आक्रोश।
एक सर्वे के अनुसार देश भर में जनवरी 2023 से लेकर दिसंबर तक 306 पतियों एवं कई मामलों में उनके परिवार वालों की हत्या पत्नियों द्वारा की गई। पुरुषों के अधिकारों के प्रति काम करने वाली संस्था “एकम न्याय फाउंडेशन” की दीपिका भारद्वाज ने इन विषयों को लेकर दो फिल्में बनाई है “मर्डरस ऑफ मैरिज” और “इंडियस संस” जिसमें ऐसे जघन्य अपराधों के कारण एवं अपराधियों की मानसिक स्थिति पर प्रकाश डाला गया है।
चिंता की बात तो यह भी है कि अब बच्चों में भी हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है गुरुग्राम के एक नामी विद्यालय के दसवीं कक्षा के छात्र ने अपने एक जूनियर बच्चे की इसलिए हत्या कर दी क्योंकि वह चाहता था कि उसके विद्यालय की परीक्षाएं स्थगित कर दी जाए क्योंकि उसे अपने फेल होने का डर था। आए दिन विद्यालय के बाहर आपसी रंजिश के चलते किशोरों द्वारा चाकू-छुरियों से प्रहार करने की दुर्घटनाएं सुनने में आती हैं।
कुछ बुद्धिजीवियों का कहना है कि संयुक्त परिवारों का टूटना और नौकरी पेशा माता-पिता का बच्चों को समय न देने के कारण बच्चों में नैतिक शिक्षा का अभाव एवं अपराधों को बढ़ावा मिल रहा है। फिल्मों में दिखाई जाने वाली हिंसा एवं मारकाट के दृश्य भी इसके कारण है।
कारण चाहे कोई भी हो उसका निवारण जानना आवश्यक है। इसके लिए एक विश्वसनीय न्याय प्रक्रिया की आवश्यकता है। सभी को न्याय मिले, अपराधियों को कठोर दंड मिले। न्याय प्रक्रिया बहुत लम्बी एवं जटिल न हो। कोई भी कानून को हाथ में लेने का दुस्साहस न करें। विद्यालयों एवं महाविद्यालयों में नैतिक शिक्षा का ज्ञान अनिवार्य है। मीडिया भी समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाये। फिल्मों में हिंसा एवं मारकाट के दृश्यों को दिखाने पर रोक हो। रोजगार के अवसर बढ़े जिससे गरीबी की समस्या न हो और हमारे युवकों की ऊर्जा को सकारात्मकता का मार्ग मिले।
सरकार ही नहीं एक स्वस्थ समाज के निर्माण हेतु समाजसेवी संस्थाएँ भी आगे आएँ।
एक ऐसे समाज का निर्माण हो जिसमें रिश्तो के प्रति सम्मान, प्रेम एवं विश्वास हो। व्यक्ति स्वार्थी एवं आत्म केंद्रित न हो। वह केवल अपने विषय में ही न सोचे अपितु उसके मन में दूसरों के प्रति भी सहानुभूति एवं दया का भाव हो। आखिर एक स्वस्थ समाज ही स्वस्थ राष्ट्र की नींव बनता है।
