बबीता झा
जून, 2025
महाभारत का एक अत्यंत प्रसिद्ध प्रसंग है—आचार्य द्रोण एवं पांचाल देश के राजा द्रुपद के संबंधों की कहानी। यह कथा है—मित्रता, अपमान, प्रतिशोध और उस प्रतिशोध के भी प्रतिशोध की, जिसमें इन दोनों के साथ-साथ इनके संपूर्ण कुल और संतानों का जीवन भी समाप्त हो गया।
कहानी कुछ इस प्रकार है कि द्रोण एवं द्रुपद के पिता परस्पर घनिष्ठ मित्र थे, यद्यपि एक ऋषि थे और दूसरे राजा। पिता की इस मित्रता का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ कि द्रोण और द्रुपद भी बाल्यावस्था में अभिन्न मित्र बन गए। दोनों ने साथ में शिक्षा प्राप्त की और अनेक अस्त्र-शस्त्रों के संचालन में निपुणता हासिल की।
किंतु बड़े होने पर दोनों अपने-अपने मार्ग पर बढ़ गए। द्रोण ऋषित्व को प्राप्त हुए और द्रुपद पांचाल के राजा बने।
एक बार आचार्य द्रोण अत्यधिक आर्थिक तंगी से जूझ रहे थे। वे बाल-मित्रता के सहज अधिकार और भरोसे के साथ द्रुपद के पास आर्थिक सहायता की आशा से गए। किंतु द्रुपद को अपनी भरी सभा में एक निर्धन ब्राह्मण द्वारा स्वयं को ‘मित्र’ कहा जाना रास नहीं आया। उसने अहंकारवश द्रोण को दोनों की सामाजिक हैसियत का अंतर दिखाते हुए अपमानित किया और कहा, “राजा की मित्रता केवल राजा से ही हो सकती है, किसी याचक से नहीं।”
द्रोण के हृदय में यह अपमान शूल की तरह चुभ गया। इस तिरस्कार का प्रतिशोध लेने के लिए वे हस्तिनापुर आए और कौरव-पांडव राजकुमारों के आचार्य बने। शिक्षा पूर्ण होने पर द्रोण ने अपने शिष्यों से गुरुदक्षिणा के रूप में राजा द्रुपद को पराजित कर बंदी रूप में अपने समक्ष प्रस्तुत करने की माँग की।
कौरव इस कार्य में असफल रहे, किंतु पांडवों (विशेषकर अर्जुन) ने द्रुपद को पराजित कर बंदी बना लिया और द्रोण के चरणों में लाकर खड़ा कर दिया। द्रोण ने द्रुपद का आधा राज्य अपने पास रख लिया और शेष आधा राज्य उसे यह कहकर लौटा दिया कि “अब हम दोनों समान हैसियत के राजा हैं, अतः अब हमारे बीच मित्रता हो सकती है।”
द्रुपद ने विवश होकर आधा राज्य तो स्वीकार कर लिया, किंतु वह इस दारुण अपमान को भूल न सका और प्रतिशोध की अग्नि में जलने लगा। वह जानता था कि अपनी सैन्य शक्ति से वह द्रोण या उनके महापराक्रमी शिष्यों को नहीं हरा सकता। अतः उसने कठिन यज्ञ और तपस्या के बल पर ईश्वर से ऐसा पुत्र प्राप्त किया, जो द्रोण का वध कर सके। उस पुत्र का नाम था—धृष्टद्युम्न।
यद्यपि द्रोण और द्रुपद की पुरातन मित्रता अब घोर शत्रुता में बदल चुकी थी, फिर भी द्रुपद इस सत्य से भली-भांति परिचित था कि धनुर्विद्या और शस्त्रज्ञान में आचार्य द्रोण से श्रेष्ठ कोई गुरु नहीं हो सकता। इसीलिए उसने अपने पुत्र धृष्टद्युम्न को शिक्षा ग्रहण करने के लिए द्रोण के पास ही भेजा।
आचार्य द्रोण भी जानते थे कि धृष्टद्युम्न का जन्म ही उनका वध करने के लिए हुआ है, फिर भी उन्होंने स्वयं को नियति पर छोड़ दिया और परम गुरुधर्म का पालन करते हुए धृष्टद्युम्न को वह संपूर्ण दिव्य ज्ञान और विद्या प्रदान की जो उनके पास थी।
महाभारत के धर्मयुद्ध में आचार्य द्रोण और धृष्टद्युम्न परस्पर विरोधी पक्षों से लड़े। युद्ध के 15वें दिन जब द्रोण (पुत्र-मोह और असत्य समाचार से) भावनात्मक रूप से टूटकर शस्त्र त्यागकर ध्यानमग्न बैठ गए, उसी क्षण धृष्टद्युम्न ने उनका वध कर दिया।
जब द्रोण के पुत्र अश्वत्थामा को अपने पिता के इस छलपूर्ण वध का समाचार मिला, तो वह प्रतिशोध की ज्वाला में जल उठा। महाभारत का युद्ध समाप्त होने के पश्चात, जब सर्वत्र शांति छा चुकी थी और कौरव शिविर रिक्त हो चुका था, तब अश्वत्थामा ने रात्रि के अंधकार में पांडव शिविर पर अचानक गुप्त आक्रमण कर दिया। उसने सोए हुए योद्धाओं पर वार करके धृष्टद्युम्न, उसके समस्त सगे-संबंधियों और द्रौपदी के 5 पुत्रों (उपपांडवों) का निर्मम वध कर दिया।
इस नृशंस कृत्य के प्रतिशोध में पांडवों ने अश्वत्थामा को बंदी बना लिया। अंततः भगवान श्री कृष्ण द्वारा उसके मस्तक की मणि निकालकर उसे हज़ारों वर्षों तक शरीर पर घाव लिए भटकने और कष्टदायक जीवन जीने का शाप दिया गया।
इस प्रकार, मात्र एक क्षण के अहंकार और प्रतिशोध की ज्वाला ने दोनों राजवंशों और परिवारों का समूल विनाश कर दिया।
आधुनिक मनोविज्ञान भी यही स्पष्ट करता है कि क्रोध की उत्पत्ति प्रायः ईर्ष्या, द्वेष, अभिमान और इच्छित वस्तु न पाने की असफलता जैसी नकारात्मक भावनाओं से होती है।
क्रोध जब वाणी या शारीरिक हिंसा के रूप में प्रकट होता है, तब व्यक्ति में इतना विवेक शेष नहीं रहता कि वह शांतचित्त होकर कोई तर्कसंगत या दूरदर्शी निर्णय ले सके। क्रोध से मूल समस्या का समाधान तो कभी नहीं निकलता, उल्टे कई नई और जटिल समस्याएँ जन्म ले लेती हैं। इसीलिए कहा गया है कि:
“क्रोध की शुरुआत मूर्खता से होती है और इसका अंत पश्चाताप पर होता है।”
यह सत्य है कि कभी-कभी न्याय या धर्म की रक्षा के लिए कठोर निर्णय या हिंसा अनिवार्य हो जाती है, किंतु वह तभी सार्थक और फलदायी होती है जब वह व्यक्तिगत द्वेष, अहंकार या क्रोध से प्रेरित न होकर शांत मस्तिष्क, संयम और विवेकपूर्ण विचार के साथ लागू की जाए।
आशा है, हर अंक की तरह यह अंक भी आप सभी को पसंद आएगा। अपने विचारों और प्रतिक्रियाओं से अवश्य अवगत कराएँ।
धन्यवाद!

