
पटना, बिहार
सितंबर, 2022
तुम भी सोचोगे किस्तों में यौवन निकल गया।
समय तू कितना बदल गया।
बचपन को यौवन देने में, इंसा बूढ़ा हो जाता।
फिर यौवन की विमुखता से, दिल में घुट घुट कर रोता।
वृद्धों संग बर्ताव देख निसर्ग भी दहल गया।
समय तू कितना बदल गया।
जिसने तुमको बड़ा बनाया, उसको छोटा ना समझो।
पाई-पाई लुटा दिया जो, उसको खोटा ना समझो।
देख रही तेरी औलादें कह दे संभल गया।
समय तू कितना बदल गया।
समय तू कितना बदल गया।
रेत की भाँति कब मुठ्ठी से कैसे फिसल गया।
समय तू कितना बदल गया।
पाल पोस कर बड़ा किया जिसे, वो बच्चे मुँह मोड़ गये।
मात पिता जब बूढ़े हो गये, तब बच्चे घर छोड़ गये।
आँखों को समझाया फिर भी आँसू मचल गया।
समय तू कितना बदल गया।
बूढ़े को बेकार समझना, क्यों फ़ितरत है जवानी की।
बूढ़ा होना ही सच्चाई, जीवन रूपी कहानी की।
****
