समीर उपाध्याय ‘ललित’
चोटीला, जिला: सुरेंद्रनगर
गुजरात
सितंबर, 2022
श्रवण- “बड़े भैया, माँ की तबीयत बहुत ख़राब है। बेहोश-सी हो गई है। लधुशंका और दीर्घशंका भी बिस्तर पर हो गया है। सांस जैसे बंद हो गई है। लगता है माँ अब….।”
भावेश- “अरे! उसकी दिमागी हालत ठीक नहीं है। बच्चों जैसी हरकतें करती है। मेरे घर आई थी तब मैं तो दो दिन में ही तंग आ गया था। बचपने की भी कोई हद होती है। सारा दिन अनाप-शनाप बकती रहती है।”
श्रवण- “लेकिन भैया, आस-पड़ोस के लोग इकट्ठे हो गए हैं। आप और भाभी जल्दी आ जाइए।” भावेश- “मैंने कहा न कि किसी मानसिक रोग के डॉक्टर को बताओ।”
क्रोध भरे शब्दों में इतना कहकर भावेश ने फोन रख दिया। इतने में उसका बेटा संकल्प आया और बोला- “पापा, आप कॉलेज में तो हर रोज़ लेक्चर देते हैं। आज़ मुझे भी थोड़ा मार्गदर्शन दीजिए, क्योंकि मैंने कॉलेज में होने वाली परिचर्चा में हिस्सा लिया है। समझ में नहीं आ रहा कि क्या बोलूं?”
भावेश- “बेटा, परिचर्चा का विषय क्या है?”
संकल्प- “संतान माता-पिता को दे सकती हैं- सिर्फ़ समय।”
संकल्प की परिचर्चा के विषय को सुनकर भावेश गहरी सोच में पड़ गया और आत्म-चिंतन करने के लिए विवश हो गया।
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