बूढ़ा बरगद (लघुकथा)

व्यग्र पाण्डे
कर्मचारी कालोनी, गंगापुर सिटी, राजस्थान

सितंबर, 2022

गाँव में एक पुराने बरगद की अधिकांश शाखाएँ सूख चुकी थीं। शाखाओं के कोटरों में पक्षी निवास करते थे। एक कोटर में हवा से उड़कर कुछ धूल जमा हो गई और किसी पक्षी द्वारा लाया गया कोई बीज उसमें गिर गया। हवा, पानी व प्रकाश पाकर वह बीज प्रस्फुटित होकर एक नन्हें से पौधे की शक्ल में लहलहाने लगा। आते-जाते लोग उसे देखते, कोई भगवान का चमत्कार कहता तो कोई प्रकृति की लीला। धीरे-धीरे वह पौधा बड़ा होने लगा। लोगों के आश्चर्य में और अधिक वृद्धि होने लगी।
उस पुराने बरगद की अन्य शाखाएँ कुछ तो लोगों द्वारा व कुछ स्वयं ही टूट-टूटकर बरगद से अलग हो रही थी। पर वह शाखा जिस पर वह पौधा हरा-भरा जीवंत था, सूखी होने पर भी, अब भी बरगद के तने से जुड़ी हुई थी और उस पौधे का पोषण कर रही थी। क्योंकि, बूढ़ा बरगद अपने खोखले हिस्सों के माध्यम से पौधे की जड़ों को जमीन तक पहुंचाने में सहयोग कर रहा था।
धीरे-धीरे कुछ वर्षों में वह पौधा इतना बड़ा हो गया कि सबको छांव दे सके। गाँव के लोगों ने उस बूढ़े बरगद पर कई किस्से बना लिए जिन्हें वो यदा-कदा सुनाते रहते। साथ ही वह बूढ़़ा बरगद अब गाँव का प्रेरणास्रोत व धरोहर बन चुका था ।
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