पिता

सितंबर, 2022

शकुंतला मित्तल
गुरुग्राम

गहरा सागर प्यार का, मन गागर खुशियाँ भरे।

मीठी ठंडी छाँव दे, लोरी से रतियाँ भरे।
गोदी में चढ़ तात की, दुनिया हम हैं देखते।
थाम अंगुली प्यार से, किस्मत को संवारते।
ज्ञान से सींचते हमें, कठोर भी बनते कभी।
खाते जब हम ठोकरें, थामते पिता ही तभी।
बहता झरने-सा पिता, बारिश है आशीष की।
मुश्किल में संभालता, नाविक बन तूफान की।
बहते आँसू आँख के, विचलित होते वे सदा।
आगे बढ़ करते सभी, उपाय समस्त सर्वदा।
चुनते कंकड़ राह के, भर सदा खूबसूरती।
सुता रही सामान्य सी, उन्हें दिखूं मैं हूर-सी।
सुरभित, शीतल बन हवा, मन बगिया महका रहे।
अवसाद सकल दूर कर, आशा सुमन खिला रहे।
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