बबीता झा
मार्च, 2025
सदियों पुरानी बात है। एक बालक विद्या अध्ययन के लिए गुरुकुल गया। किंतु उसकी स्मरण शक्ति बहुत कम थी और वह पाठ को ठीक से समझ भी नहीं पाता था। इस कारण अन्य विद्यार्थी उसे ‘महामूर्ख’ कहकर उसका मज़ाक उड़ाने लगे।
गुरु जी ने उसे सिखाने का बहुत प्रयास किया, पर वे सफल न हो सके। वह बालक कई वर्षों तक एक ही कक्षा में रहा, क्योंकि वह कोई भी परीक्षा उत्तीर्ण नहीं कर पाता था। अंततः एक दिन ऐसा समय आया जब गुरु जी ने उससे सभी उम्मीदें छोड़कर उसे वापस अपने घर लौट जाने को कह दिया।
वह बालक स्वयं भी जानता था कि वह अन्य बच्चों की तरह बुद्धिमान नहीं है। उसने गुरु जी की आज्ञा शिरोधार्य की और घर जाने के लिए तैयार हो गया। उसने यह मान लिया था कि विद्या अर्जित करना उसकी किस्मत में नहीं है। वह स्वयं से निराश होकर अपने घर की ओर चल पड़ा।
रास्ते में उसे तीव्र प्यास लगी। पानी पीने के लिए वह एक कुएँ के पास पहुँचा। वहाँ उसने देखा कि कुएँ के कठोर पत्थर पर गहरा निशान बना हुआ था। कुएँ पर पानी भर रही एक महिला से उसने आश्चर्य से पूछा, “माताजी, आपने यह निशान कैसे बनाया?”
महिला ने मुस्कुराकर उत्तर दिया, “बेटा, यह निशान मैंने नहीं बनाया। पानी निकालने के लिए जब बाल्टी इस रस्सी के सहारे बार-बार कुएँ में आती-जाती है, तो उस कोमल रस्सी की निरंतर रगड़ से इस कठोर पत्थर पर यह निशान बन गया है।”
उस विद्यार्थी के मन में एक विचार कौंधा। वह सोचने लगा कि यदि एक कोमल रस्सी के बार-बार घिसने से कठोर पत्थर पर गहरा निशान बन सकता है, तो कम बुद्धि वाला व्यक्ति भी यदि बार-बार अभ्यास करे, तो वह अवश्य सीख सकता है। उसे निरंतर परिश्रम और अभ्यास का वास्तविक महत्त्व समझ आ गया। वह एक नए आत्मविश्वास के साथ पुनः गुरुकुल लौट आया।
उसकी स्मरण शक्ति भले ही बहुत तीव्र नहीं थी, किंतु इस कमी को वह अपने कठिन परिश्रम और अनवरत अभ्यास से पूरा करने लगा। उसके इस दृढ़ संकल्प का सुखद परिणाम भी मिला। आगे चलकर वही बालक संस्कृत व्याकरण का महान विद्वान बना।
यह प्रसिद्ध कहानी महान विद्वान वरदराज की है। उनके गुरु का नाम भट्टोजि दीक्षित था।
आगे चलकर उसी मंदबुद्धि बालक वरदराज ने अनेक कालजयी ग्रंथों की रचना की। उनके द्वारा रचित ग्रंथों में लघुसिद्धान्तकौमुदी, मध्यसिद्धान्तकौमुदी, सारसिद्धान्तकौमुदी और गीर्वाणपदमंजरी अत्यधिक विख्यात हैं।
उनके तीन प्रमुख ग्रंथ—लघुसिद्धान्तकौमुदी, मध्यसिद्धान्तकौमुदी और सारसिद्धान्तकौमुदी—उनके गुरु द्वारा रचित ग्रंथ ‘सिद्धान्तकौमुदी’ पर लिखे गए प्रसिद्ध भाष्य हैं।
किसी ने सच ही कहा है:
“करत-करत अभ्यास ते जड़मति होत सुजान।
रसरी आवत-जात ते सिल पर परत निसान।।”
