श्रीनिवास रामानुजन: एक महान गणितज्ञ (प्रेरक व्यक्तित्व)

बबीता झा
मार्च, 2025

दुनिया के सबसे अधिक प्रतिभाशाली गणितज्ञों में गिने जाने वाले श्रीनिवास रामानुजन को ‘द मैन हू न्यू इनफिनिटी’ (The Man Who Knew Infinity) भी कहा जाता है। अत्यधिक आर्थिक तंगी और गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी उन्होंने अपनी गणितीय प्रतिभा का लोहा पूरी दुनिया से मनवाया। उन्हें मात्र 32 वर्ष की अल्पायु ही मिली थी, किंतु इस छोटे से जीवन काल में भी वे अपनी विलक्षण प्रतिभा से संपूर्ण जगत को चमत्कृत कर गए। वे गणित को अध्यात्म से जोड़कर देखते थे और अपनी इस अद्भुत क्षमता का श्रेय अपनी कुलदेवी (नामकलगिरी की देवी नामगिरी) को देते थे।

गणित में अमूल्य योगदान
रामानुजन को गणित की समझ नैसर्गिक (प्राकृतिक) रूप से प्राप्त थी। बचपन से ही उनकी इसमें अगाध रुचि थी। किसी औपचारिक शिक्षण-प्रशिक्षण के बिना भी वे गणित की कठिन से कठिन समस्याओं को अपनी प्रतिभा के बल पर सुलझा लेते थे। उन्होंने गणित के अनेक सिद्धांतों की व्याख्या की और हज़ारों नए सूत्र प्रतिपादित किए।
प्रमेयों का संग्रह: उन्होंने अपने अल्प जीवन काल में गणित के लगभग 3,884 प्रमेयों (Theorems) का संग्रह किया। इनमें से अधिकांश प्रमेयों को बाद में सही सिद्ध किया जा चुका है।
मौलिक परिणाम: उन्होंने बीजगणित (Algebra) के ऐसे मौलिक और अपारंपरिक परिणाम निकाले, जिन पर आज भी निरंतर शोध कार्य हो रहे हैं। उनके सूत्रों का प्रयोग आगे चलकर क्रिस्टल विज्ञान (Crystallography) और भौतिकी में भी किया गया।
प्रारंभिक प्रतिभा: मात्र 11 वर्ष की आयु में ही उन्होंने एस. एल. लोनी (S.L. Loney) की प्रसिद्ध त्रिकोणमिति (Trigonometric) पुस्तक पर महारत हासिल कर ली थी। 14 वर्ष की आयु तक आते-आते उन्हें गणित के लिए मेरिट सर्टिफिकेट और कई पुरस्कार मिल चुके थे। उन्होंने स्कूली शिक्षा के दौरान ही कॉलेज स्तर का गणित समझ लिया था।
छात्रवृत्ति: हाईस्कूल की परीक्षा अच्छे अंकों से उत्तीर्ण करने पर उन्हें ‘सुब्रमण्यम छात्रवृत्ति’ मिली, जिससे आगे कॉलेज की शिक्षा का मार्ग प्रशस्त हुआ।

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शैक्षणिक उपलब्धियाँ और चुनौतियाँ
गणित के अतिरिक्त अन्य विषयों में रामानुजन की रुचि नगण्य थी। इसलिए पारंपरिक शिक्षा पद्धति उन्हें रास नहीं आई।
इसी एकांगी रुचि के कारण वे 11वीं की परीक्षा में गणित में तो सर्वोच्च स्थान पर रहे, किंतु अन्य विषयों में अनुत्तीर्ण हो गए। परिणामस्वरूप, उनकी छात्रवृत्ति रोक दी गई।
सन 1907 में उन्होंने पुनः 12वीं (प्राइवेट) की परीक्षा दी, किंतु इस बार भी वे अनुत्तीर्ण रहे। इसके पश्चात उन्होंने औपचारिक संस्थागत शिक्षा हमेशा के लिए छोड़ दी।

इंग्लैंड प्रवास और वैश्विक पहचान
रामानुजन अपने शोध पत्रों को दुनिया के प्रतिष्ठित जर्नल्स में प्रकाशित करवाना चाहते थे। किंतु एक औपनिवेशिक (गुलाम) देश के बिना किसी बड़ी डिग्री वाले गणितज्ञ के लिए विदेशी शिक्षाविदों का विश्वास जीतना अत्यंत कठिन था।
भारत में रहने वाले कुछ गणित-प्रेमियों को रामानुजन की प्रतिभा पर पूर्ण विश्वास था। इनमें प्रोफेसर शेषू अय्यर प्रमुख थे, जिन्होंने कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय के प्रसिद्ध गणितज्ञ प्रोफेसर जी. एच. हार्डी (G.H. Hardy) को रामानुजन के कुछ सूत्र भेजे। हार्डी उस समय विश्व के मूर्धन्य गणितज्ञों में से एक थे। रामानुजन ने हार्डी के कुछ कठिन गणितीय प्रश्नों का हल सहजता से निकाल दिया था, जिसके बाद दोनों के बीच पत्र-व्यवहार प्रारंभ हुआ।
प्रोफेसर हार्डी का आकलन: प्रो. हार्डी रामानुजन से इतने प्रभावित हुए कि जब उनसे विश्व के गणितज्ञों को 100 में से अंक देने को कहा गया, तो उन्होंने अधिकांश गणितज्ञों को 35 और कुछ श्रेष्ठ गणितज्ञों को 60 अंक दिए, लेकिन रामानुजन को उन्होंने पूरे 100 में से 100 अंक दिए।
कैम्ब्रिज की उपाधि: हार्डी के निमंत्रण और वित्तीय सहायता के प्रबंध के बाद रामानुजन इंग्लैंड गए। इंग्लैंड जाने से पूर्व ही वे लगभग 3,000 नए सूत्र लिख चुके थे। वहाँ उन्होंने प्रो. हार्डी के साथ मिलकर कई ऐतिहासिक शोध पत्र प्रकाशित किए। उनके एक विशेष शोध के आधार पर कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय ने उन्हें बी.ए. (रिसर्च डिग्री) की उपाधि प्रदान की।
रॉयल सोसाइटी की फेलोशिप: इंग्लैंड में रामानुजन का स्वास्थ्य क्षय रोग (Tuberculosis) के कारण बिगड़ने लगा। सेनेटोरियम में भर्ती रहने के बावजूद उनका गणितीय कार्य निर्बाध चलता रहा। उनके इस अभूतपूर्व परिश्रम के परिणामस्वरूप उन्हें ‘फेलो ऑफ द रॉयल सोसाइटी’ (FRS) चुना गया। एक औपनिवेशिक देश के नागरिक के लिए यह अत्यंत दुर्लभ उपलब्धि थी। वे रॉयल सोसाइटी के इतिहास में फेलोशिप पाने वाले सबसे कम उम्र के व्यक्तियों में से एक थे।

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व्यक्तिगत जीवन एवं संघर्ष
श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसंबर 1887 को तमिलनाडु के ईरोड नामक कस्बे में हुआ था। उनके पिता एक साड़ी की दुकान पर क्लर्क का काम करते थे।
आर्थिक तंगी: रामानुजन के जीवन की सबसे बड़ी समस्या स्थायी आय की कमी थी। गणित के अलावा किसी अन्य काम में उनका मन नहीं लगता था। सन 1909 में उनका विवाह जानकी अम्मल से हुआ।
सहयोग और नौकरी: मद्रास के डिप्टी कलेक्टर वी. रामास्वामी अय्यर और प्राध्यापक रामचंद्र राव ने उनकी प्रतिभा को पहचाना। रामचंद्र राव के प्रबंध से उन्हें 25 रुपये मासिक छात्रवृत्ति मिलने लगी, जिसके बल पर उन्होंने अपना पहला शोध पत्र ‘जर्नल ऑफ इंडियन मैथेमेटिकल सोसाइटी’ में ‘बरनौली संख्याओं के कुछ गुण’ शीर्षक से प्रकाशित कराया।
बाद में उन्होंने ‘मद्रास पोर्ट ट्रस्ट’ में क्लर्क के रूप में कार्य किया, जहाँ वे अपना आधिकारिक काम जल्दी निपटाकर बचे हुए समय में स्लेट पर गणित के शोध किया करते थे।
अंतिम दिन: 5 वर्ष इंग्लैंड में बिताने के बाद गिरते स्वास्थ्य के कारण वे भारत लौट आए। भारत आने पर उन्हें मद्रास विश्वविद्यालय में प्राध्यापक का पद मिला। गंभीर बीमारी की अवस्था में बिस्तर पर पड़े-पड़े ही उन्होंने ‘मॉक थीटा फंक्शन’ (Mock Theta Function) पर ऐतिहासिक काम किया। उनके इस फलन का उपयोग आज न केवल गणित में, बल्कि कैंसर और आधुनिक भौतिकी (ब्लैक होल) को समझने में भी किया जाता है।
निधन: 26 अप्रैल 1920 को मात्र 32 वर्ष 4 महीने 4 दिन की अल्पायु में इस महान विभूति का निधन हो गया।

कालजयी विरासत
रामानुजन पहले स्लेट पर खड़िया से हिसाब लगाते थे और फिर उसे अपनी नोटबुक में लिख लेते थे। सन 1976 में ट्रिनिटी कॉलेज के पुस्तकालय से अचानक उनकी एक पुरानी पांडुलिपि मिली, जिसे ‘रामानुजन की खोई हुई नोटबुक’ (Lost Notebook of Ramanujan) कहा गया। इसमें दर्ज सैकड़ों सूत्रों को सुलझाने का प्रयास गणितज्ञ आज भी कर रहे हैं।
रामानुजन संख्या (1729): इसे ‘हार्डी-रामानुजन संख्या’ कहा जाता है। यह वह सबसे छोटी प्राकृतिक संख्या है जिसे दो अलग-अलग प्रकार से दो घनों (Cubes) के योग के रूप में व्यक्त किया जा सकता है:

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राष्ट्रीय गणित दिवस: उनके जन्मोत्सव की स्मृति में प्रतिवर्ष 22 दिसंबर को भारत में ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ मनाया जाता है। भारत सरकार ने सन 2012 को ‘राष्ट्रीय गणित वर्ष’ घोषित किया था।
गणित का एक प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय शोध-पत्र ‘द रामानुजन जर्नल’ (The Ramanujan Journal) उन्हीं के नाम पर समर्पित है।

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