प्रतीक्षा

मार्च, 2025

अनीता मिश्रा, दिल्ली

आज नमिता अपने आप को ठगी हुई महसूस कर रही थी। जो जीवन के अंतिम पड़ाव में उसे ज्ञात हुआ कि जीवन के हर बीते पड़ाव को उसने मृगतृष्णा में बिता दिया। मोह और उम्मीद के चश्मा में उसे दिखाई ही नहीं दिया कि उसके लिए स्नेह और आदर का भाव अपने ही घर के लोगों में नहीं था। सभी नमिता के दयालुपन और सहृदयता को पहचानकर उसी तरह का पर्दा लगाकर उसको छलते गये।
नमिता के मन में हजारों सवाल प्रश्न चिन्ह के साथ तैर रहे थे। नमिता एक मध्यवर्गीय परिवार में पली-बढ़ी थी। जहां उसे एक संयुक्त परिवार में हर संस्कार मिला। लेकिन घूमने फिरने की आजादी कभी ना मिली। मम्मी हमेशा कहती थी कोई बात नहीं बेटा शादी के बाद अपने पति के साथ हर जगह घूमना।
नमिता के पिताजी हमेशा उसे प्रोत्साहित करते थे। नमिता के पिताजी के नजर में उनकी बेटी दुनिया की सबसे सुंदर अच्छी और सच्ची बेटी उन्हें सर्वश्रेष्ठ उपहार के रूप में भगवान से मिली थी। वह हमेशा कहते थे “मेरी बेटी जहां भी जाएगी वहां स्वर्ग बना देगी।”
नमिता रूपवती और गुणवती होने के साथ-साथ पढ़ाई में भी बहुत अच्छी थी। वह जो काम करती थी हमेशा दिल से करती थी। उसके मन में कोई छल-कपट नहीं था। नमिता के पिता सूखे और बाढ़ के सताए हुए एक गरीब किसान थे।
इसीलिए अपने सामर्थ्य के अनुसार नमिता की शादी कर दिए। नमिता ख़ुश थी क्योंकि नमिता को किसी चीज की लालसा नहीं थी। उसकी केवल यही इच्छा थी कि पति चरित्रवान और विश्वासी हो। पति के साथ संयुक्त परिवार मिले। परिवार में सब थे लेकिन सास ससुर नमिता की शादी से पहले ही गुजर चुके थे। उसे अपनी कुटिया भी महल लग रही थी। अपनी ताई और चाची से सीखी लोकगीत अपनी जेठानियों के साथ मिलकर गाती थी। आंगन और पड़ोस के हम उम्र बच्चों के साथ खेलती थी। पति भी उससे बहुत प्यार करते थे। उसे कभी नहीं डांटते था। जेठानिया भी उम्र में बहुत बड़ी थी। वह भी अपने संतान की तरह नमिता को स्नेह करती थी। नमिता को देखकर गुसैल से गुसैल महिलाएं भी हंस देती थी। लग रहा था जैसे चारों तरफ बसंत बहार आ गया हो।
नमिता अपनी पढ़ाई भी आगे शुरू कर दी थी। घर के पीछे नमिता रसोई बगीचा भी लगा दी जिसमें हर प्रकार की सब्जी के साथ-साथ फूल, नींबू, पपीता इत्यादि सब वृक्ष लगे हुए थे। अपने बीते पल को याद करते-करते ममता के मुंह में पानी आ गया। सावन के महीने में छतरी तान के मूसलाधार बारिश में पेड़ से नींबू तोड़ने जाती थी और सभी जेठानी देवरानी मिलकर बैठकर मूंग की दाल में निचोड़ के खाती थी। हृदय के सागर में सारी यादें तैरने लगे। कितने स्वाद थे खाने के साथ-साथ रिश्तों में भी। चारों तरफ हरियाली ही हरियाली थी नमिता चिड़ियों की तरह चहकती थी कभी नींबू तोड़ती तो कभी अमरुद तोड़ती तो कभी पके पपीते तोड़ती। बिना किसी सुविधा के कितनी खुशियां थी।
कुछ बरसों बाद नमिता दो बेटों की मां बनी। बच्चों की भविष्य के लिए अब नमिता चिंतन करने लगी क्योंकि उसका पति नवनीत बेरोजगार था। एक दिन नमिता नवनीत से बोली “देखिए जी अब हमें बच्चों के भविष्य के लिए कुछ सोचना है। आप शहर जाकर नौकरी करिए मैं कुछ अभी गांव में ही रहकर बच्चों का लालन-पालन करूंगी।”
“मैं! तुम सभी को अकेला छोड़कर शहर जाऊं तुम अकेली कैसे संभालोगी दो-दो बच्चों को?”
नवनीत का सवाल सुनकर नमिता बोली “देखो मैं अकेली कहां हूं अपना गांव, अपने लोग, सभी तो है।”
“सभी बाहर है ना नमिता! घर में कौन है! ना मेरे मां- पिताजी है। आज मेरे मां पिताजी जिंदा होते तो तुम जैसी बहू को पाकर अपने आप को धन्य समझते। भैया- भाभी भी शहर में रहते हैं। तुम अकेली दो बच्चों को लेकर कैसे रह पाओगी? मैं कैसे वहां शहर में शांत रहूंगा?” नवनीत समझने को तैयार नहीं था।
नमिता जानती थी कि नवनीत के लिए बहुत कठिन है परिवार को छोड़कर शहर जाना। नवनीत परिवार से अलग रहकर जीने का सोच भी नहीं सकता था। नमिता किसी तरह नवनीत को समझाना चाहती थी कि बच्चों के उज्जवल भविष्य के लिए बिरह-वियोग तो सहना ही पड़ेगा।
नमिता को स्वयं भी असहनीय लग रहा था लेकिन वह आगे की सोच कर अपनी बिरह वेदना को हृदय में दबा रखी थी। अगले दिन सुबह चिड़ियों की चरचाहट से नमिता की आंखें खुली वह चौंकती हुई उठी। खिड़की खोलते ही उसकी आंखें चौंधिया गयी। पपीता और अमरूद के पत्तों पर तैरती हुई रवि रश्मि सुबह-सुबह उसके मन को मोहित कर रही थी। फिर दूसरे ही क्षण नमिता को देर हो जाने का संज्ञान हुआ।
सोचने लगी आज तो बहुत देर हो गई! बच्चे जाग जाएंगे एक भी काम नहीं करने देंगे। धीरे से बच्चों के नीचे से अपना पल्लू निकालने लगी। तभी सहसा नवनीत की तरफ नजर गया। सूजी हुई आंखें, चेहरे पर आंसू बहने का निशान देख कर उसे लगा जैसे ह्रदय फट जाएगा लेकिन वह भी क्या कर सकती थी। एक धर्मपत्नी होने का हर धर्म नमिता निभाई थी लेकिन अब उसे मां का भी फर्ज निभाना था। बच्चों के उचित पोषण के लिए रुपए तो जरूरी थे। गांव में कुछ भी आय का साधन नहीं था।
उठने के बाद नवनीत बिना नाश्ता किये चुपचाप घर से बाहर निकल गया। नमिता नाश्ता की थाली लिए, ठगी सी खड़ी रही। अब उसे यह चुप्पी का बोझ पहाड़ सा लगने लगा था। नमिता ऐसे छटपटा रही थी जैसे नदी के धार को एक बड़ा चट्टान ने रोक दिया हो और आगे बढ़ने के लिए बार-बार चट्टान से टकराकर ठोकर खाना पड़ रहा हो। तभी नवनीत के आने की आहट से नमिता सचेत हुई नवनीत के पीछे ही कमरे में थाली लेकर दौड़ पड़ी
“आप कहां चले गए थे? मैं नाश्ता की थाली ला ही रही थी।”
“जब अपने से दूर भेज हीं रही हो तो वहां पर तुम नहीं नाश्ता देने जाओगी। मुझे आदत तो लगानी पड़ेगी ना तुम्हारे बिना जीने की।”
नमिता मेज पर थाली रखकर और बिस्तर पर बैठकर फफक फफक कर रोने लगी।
“आपको क्या लगता है कि आपसे दूर रहकर मैं बहुत खुश रहूंगी। आप भी सोच कर देखिए दोनों बच्चे अभी छोटे हैं आय के नाम पर कुछ नहीं हमारे पास। अभी अपने बच्चों के लिए हम दूध नहीं खरीद पाते हैं तो सोचिए आगे चलकर उसके स्वास्थ्य, शिक्षा का खर्च हम कैसे उठा पाएंगे? आप ही कहते हैं ना कि हमारा प्यार राम-सीता की तरह पवित्र है। प्यार में पवित्रता के साथ-साथ कर्तव्य के प्रति समर्पण भी तो होना चाहिए। आपको क्या लगता है कि गर्भवती सीता को वनवास भेजना क्या आसान था राम और सिया के लिए? लोग चाहे रामचंद्र जी को कितने उलाहने दे कि उन्होंने सीता जी को वन भेजा, लोकापवाद के कारण अयोध्या का माहौल जो दिन प्रतिदिन जहरीला होता जा रहा था, राम सिया समझ गए थे कि…. कि गर्भ में पलने वाले शिशु को हम वो संस्कार नहीं दे पाएंगे जो अयोध्या के उत्तराधिकारी में चाहिए। सीता जी वन नहीं जाती तो लव कुश को वाल्मीकि जैसे दिव्य गुरु नहीं मिलते।… सीता जी लक्ष्मी और श्री राम विष्णु के अवतार थे वह हर परिस्थिति में धैर्य रखकर जीने का संदेश हमें दे गए।…. आप पहले शहर जाओ मेहनत करके नौकरी करो। जब आपको वेतन ठीक-ठाक मिलने लगे तब मैं भी शहर में ही आ जाऊंगी वहीं दोनों बच्चों को पढ़ाएंगे।”
नवनीत ध्यान से नमिता की बातें सुनकर गहरी सांस लेते हुए बोला “ठीक है मैं जाऊंगा।” नमिता दौड़कर नवनीत के गले लग गई।
नवनीत के जाने के बाद नमिता रह तो रही थी लेकिन घर नवनीत के बिना बिल्कुल सूना-सूना लग रहा था। नवनीत हर महीने पैसे भेजने लग था। दोनों के दिन एक दूसरे के याद में कटते थे। नमिता का दिन आसानी से कट रहा था क्योंकि दोनों बच्चों के बाल लीला बड़े मोहक थे। पर नमिता नवनीत के लिखे पत्र को दिन में चार-चार बार पढ़ती थी।
नवनीत हर रोज एक पत्र लिखता था। यहां गांव में नमिता सबसे हिल मिलकर प्रेम से रहती थी। पड़ोस की वृद्धाओं की तो जान थी। नमिता सबका बहुत ख्याल रखती थी, बहुत सेवा करती थी।
वह दिन भी आ गया जिस दिन नमिता को अपना गांव, बाग-बगीचा, घर-द्वार, सब छोड़ कर शहर में जाना पड़ा क्योंकि वहां नवनीत बहुत बीमार पड़ गया था। जब नमिता गांव से जाने लगी तो सभी वृदधाएं ऐसे रोने लगी जैसे उनकी बेटी की विदाई हो रही हो।
शहर में आने के बाद नमिता का एक ही लक्ष्य था दोनों बच्चों को सही शिक्षा और संस्कार देना। नवनीत के वेतन से घर चलना भी मुश्किल था तब नमिता ने आस पड़ोस के बच्चों को पढ़ाकर अपने दोनों बच्चों को अच्छे स्कूल में दाखिला करवा दिया।
देखते ही देखते नमिता का नाम हर जगह फैल गया। नवनीत भी नौकरी छोड़कर नमिता के साथ ही बच्चों को पढ़ाने में लग गया।
नमिता 12 वर्ष तक गांव नहीं गई। शहर में मां लक्ष्मी की कृपा से अब उसके पास सब कुछ हो गया था। घर- गाड़ी, बच्चों की सही शिक्षा। लेकिन नमिता एक तरह से मशीन बन गई थी। दिन रात मेहनत करके अपने संकल्प पर अडिग थी। 24 घंटे में मात्र चार घंटा सोती थी। उस चार घंटा में भी शरीर तो बिस्तर पर रहता था लेकिन नमिता का मन गांव पहुंच जाता था। गांव की याद में रोते-रोते तकिया भीग जाता था। इसी याद में नमिता लेखिका बन गई। अपने मनोभाव को कविता और कहानी के रूप में दर्शाने लगी।
12 वर्ष बाद वह समय आ ही गया जब नमिता गांव आ रही थी। उसकी खुशी का ठिकाना नहीं था। ट्रेन में बैठी खिड़की से बच्चों की तरह एक-एक पेड़-पौधे को निहार रही थी।
पर, वहां जाने के बाद उसे बहुत निराशा मिली। वह गांव अब नहीं था जो वह 12 वर्ष पहले छोड़ कर गई थी। अधिकतर वृदधा दुनिया छोड़कर चली गई थी। एक आध जो थी उनके चेहरे पर उदासी और बेबसी के भाव थे। “हम” का लोप हो चुका था सर्वत्र में “मैं” गूंज रहा था। विचारों में भिन्नता की तरह घर- आंगन, दूर- दलान सब का नक्शा बदल चुका था। नमिता का आंगन, घर, बाग-बगीचा, सब वीरान पड़ा हुआ था। धरती मां की उदारता थी कि घास और जंगल से ही सही लेकिन घर पूरे हरियाली में था।
12 वर्ष में बहुत कुछ बदल गया था। बीते लम्हे की यादें और लोगों की ठहाके नमिता के कान में गूंज रही थी। नमिता नहीं जानती थी कि उनके साथ बिताए गए पाल अंतिम थे। याद करके आंखें भर आई।
नमिता के दिमाग में चलचित्र की तरह एक-एक बिताए हुए लम्हे चलने लगे। नमिता जब शादी करके आई थी तो उम्र में सबसे छोटी थी। आंगन की जेठानी उसकी दादी की उम्र की थी। आंगन का माहौल बहुत सख्त और शांत था। नमिता की आंगन की एक जेठानी जिन्हें नमिता ‘पूजा वाली बहिन’ कहती थी, उन्हें संतान नहीं था। दोनों पति-पत्नी पूजा और भगवान के नाम भजन में लगे रहते थे।
पूजा वाली बहिन सन्यासिनी की तरह जीती थी परंतु अपने क्रोध पर काबू नहीं पाई थी। दूसरी जेठानी आंगन की थी बड़ी ही शांत और मस्त-मौला स्वभाव की। पूजा-पाठ कभी नहीं करती थी, बस स्वादिष्ट खाना बनाकर सबको पेट भर खिलाने को ही पूजा समझती थी।
पूजा वाली बहिन इनको भी बेवजह बहुत सुना देती थी। पर यह कभी उनको जवाब नहीं देती थी। वे सब शब्द के जाल बनाकर नहीं खेलती थी बल्कि शब्दों को नजरअंदाज कर एक दूसरे के दर्द को समझते थी। नमिता सोचने लगी, हम सब बड़े-बड़े उपाधि लेकर भी सामंजस्य रूपी छोटे-छोटे शांति बीज को नहीं बो पाते हैं।
नमिता को स्मरण हो आया कि उसकी अपनी जेठानी हमेशा सचेत करती थी कि नमिता कभी पूजा वाली बहिन के सामने मत हंसना। उनके आसपास भी नहीं कोई फटकना है।
नमिता को नहीं रहा गया। एक दिन जब पूजा वाली बहिन बुखार के तपन में जोर-जोर से सबको बुरा-भला सुना रही थी। अचानक उनकी आवाज बंद हो गई। नमिता जाकर जैसे ही उनके सिर पर हाथ रखी, जलती तवा सामान देह धधक रहा था। नमिता तुरंत ठंडा पानी से पट्टी करी। घर से क्रोसिन ले जाकर खिलाई। कुछ देर बाद पसीना चला और बुखार उतर गया। उस दिन के बाद नमिता अपने लिए पूजा वाली बहिन की आंखों में अपनत्व और स्नेह देखने लगी।
नमिता के घर के बरामदे पर प्रत्येक दिन आंगन, आस पड़ोस के सभी उम्र की महिलाएं चार बजे आकर बैठती थी।
हंसी मजाक से बड़ा खुशनुमा माहौल बन जाता था सभी उस दिन दंग रह गए। जब एक दिन पूजा वाली बहिन भी आकर बैठ गई। अपनी बचपन की बातें, यहां तक कि अपने पति से पहली मुलाकात की बात भी बताने लगी। हंसती हुई पूजा वाली बहन बहुत अच्छी लग रही थी। सभी कहने लगी “वाह! नमिता तुमने इनको भी बदल दिया।”
“मम्मी देखो ना इस जंगल में तो सांप भी होंगे हम यहां कैसे रहेंगे!” नमिता का मन मुकुल (बेटा) का बात सुनकर वर्तमान में आया।
“साफ हो जाएगा, कोई सांप नहीं है बेटा।” नमिता नवनीत एक महीना की छुट्टी लेकर गए थे। लेकिन दस दिन बाद लौटने की योजना बना लिए। अच्छा नहीं लग रहा था।
जब नमिता गांव में रहती थी तब आस-पड़ोस की सभी लड़कियां झुंड बनाकर खेलने आती थी। अब लग ही नहीं रहा कि मोहल्ले में कोई लड़की है। पहले वाली सभी लड़कियां अपने ससुराल चली गई थी। जिससे घर आंगन मे विरान और सूनापन रहता था। नमिता यादों को हृदय में दबाकर अपने परिवार के साथ दिल्ली आ गई।
नवनीत और नमिता दोनों ने एक नई उम्मीद बांध ली कि बच्चों को अच्छी नौकरी हो जाने के बाद शादी करके बच्चे शहर में रहेंगे और हम दोनों वैसे ही बाग बगीचा लगाकर गांव में रहेंगे।
अंततः वह दिन भी आ गया जब दोनों बच्चों को पढ़ाई के बाद अच्छी नौकरी मिल गई। बड़े बेटे की शादी के बाद नमिता सोची कि अब यहां की मालकिन बहू को बनाकर गांव जाएंगे। इस समय का नमिता बड़ी बेसब्री से इंतजार कर रही थी।
संगीता (बहू) को आए करीब चार महीना हो गए थे। लेकिन नमिता अभी तक सारा काम, खाना-पीना सभी कर रही थी। बहु एक दिन भी रसोई घर में झांक कर नहीं देखी।
बुखार में नमिता तड़प रही थी। मुकुल नमिता को लाकर एक गिलास पानी दिया। वह संगीता को कमरे में जाकर बोला “मम्मी बुखार में तप रही है जाकर एक कप चाय बना दो।”
“तप रही है तो तप रही है, मैं अपने समय से उठूंगी, मैं किसी की नौकरानी नहीं हूं।”
मुकुल को बड़ा गुस्सा आया। वह बोला “तुम ऐसे कैसे बोल सकती हो? तुम्हें बोलते हुए जरा सा भी संकोच नहीं हुआ! चार महीने से तुम्हें बनाकर खिलाई है, चालीस वर्ष से लगातार मेहनत कर रही है, इस घर के लिए।”
“खट रही है तो मेरे लिए नहीं अपने पति और बेटे के लिए। मुझसे उम्मीद मत कीजिए, ज्यादा बोलेंगे तो अभी मैं अपनी मम्मी के पास चली जाऊंगी।” संगीता जोर से चिल्लाकर बोली।
नमिता को संगीता की बातें सुनकर लगा जैसे देह ठंडा पड़ गया, बुखार गायब हो गया। इससे भी बड़ा झटका तब लगा जब नवनीत आकर बोला “करवा ना दोनों पति-पत्नी में झगड़ा। … तुम उम्मीद ही क्यों करती हो। जाओ अपने लिए चाय बना कर दवाई खा लो। जैसे घर का काम कर रही हो वैसे ही करती रहो, घर में सुख शांति के लिए लोगों को बहुत कुछ त्याग करना पड़ता है।” नमिता आवाक नवनीत की तरफ देखती रही।
क्या यही है नवप्रकाश!
खंड-खंड होता विश्वास
संवेदनहीन एहसास
मानवता का ह्रास
किसी से ना कोई करें आश!
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