हनीमून

मार्च 2026

केदारनाथ दास
केदारनाथ दास
बसिया, जिला- गुमला, झारखंड


फुलमतिया ने कभी रेल नहीं देखा था। वन प्रातंर में बसे बसिया के जिस छोटे से टोले में वह पली-बढ़ी वहाँ के लिए अभी भी रेल का अस्तित्व कल्पनालोक का विषय था। ऐसे किसी कल्पना के कारण उसकी दुनिया वहीं तक सीमित थी जहाँ तक उसकी आँखें साथ दे पाती। पीपल के पेड़, कुआँ, तालाब, मिट्टी की गंध, उछल कूद, लापरवाह सोच और माँ की फटकार। यहाँ न प्रारब्ध था, न सपने थे और न कोई औपचारिकता ही थी। कुछ सपने थे तो उसमें चूल्हे की आग थी, रसोईघर था और इन सब पर सोशल मीडिया के स्टेटस का अल्हड़पन भारी था। इतना ही नहीं, भविष्य का अर्थ बस इतना भर था कि शादी होगी तो वह किसी और घर की लक्ष्मी बन जाएगी। उसे तो यह भी पता न था कि सूर्योदय का मुहूर्त बदलते देर नहीं लगती और हुआ भी कुछ ऐसा ही जब पौ फटते ही वह कूदकर शादी के बंधन में जा बंधी।
अब शादी हो ही गई तो साथ में अनगिनत सवालों से गठबंधन भी होता चला गया। पहला सवाल तो एक आस लेकर सामने था कि हनीमून के लिए कहाँ चलना है? यह सवाल उस फुलमतिया के लिए किसी पहाड़ से कम न था जिसने कभी ‘हनीमून’ शब्द को महसूस करने की जरूरत ही महसूस नहीं की। रेडियो, टीवी और शहर से लौटी पड़ोसी औरतों की बातचीत में इस शब्द से उसका साक्षात्कार जरुर था परन्तु अनजान जगह, अनजान लोग, अनजान प्रियतम और अनजान संदर्भ को लेकर तमाम तरह के सवाल थे, साथ में भयमिश्रित कौतूहल भी था। आज जब इस हनीमून शब्द से सीधा साक्षात्कार हुआ तो नई दुनिया देखने की उत्सुकता, पति के साथ कदम से कदम मिलाकर घुमने का जज्बा और खुद को कुछ साबित करने का आकर्षण एक अवसर बनकर सामने था। पति ने कहा, ‘चेरापूंजी चलेंगे, हनीमून को यादगार बनाते हैं क्योंकि अभी मौसम बरसात का है और वहाँ बारिश भी बहुत होती है।’ फुलमतिया का प्रारब्ध उसे चुप रहने को विवश कर रहा था क्योंकि उसे बारिश से डर नहीं लगता था परन्तु तेजी से हो रहे परिस्थितिजन्य परिवर्तन के इस बारिश के सामने वह किंकर्तव्यविमूढ़ थी। बात चली तो चल निकली और अब वह चेरापूंजी में थी।
चेरापूंजी ने भी उसका भरपूर स्वागत किया परन्तु यह स्वागत बरसती पानी से नहीं बल्कि उस आईने की तरफ से था जिसके लिए वह अभी भी बहुत कुछ नहीं थी। मन भटकने लगा कि शादी हुई तो जीवन ने आखिर क्यों अचानक उससे एक ऐसा सवाल पूछ लिया गया जिसके लिए वह कभी तैयार ही नहीं थी! स्वाभाविक था कि यह सवाल अब फुलमतिया के लिए भय, उत्सुकता, संकोच व एक अजीब से आकर्षण जैसे तमाम भावों की घनघोर बारिश के नीचे लाकर खड़ा कर दिया था। वह इस बात से तरबतर होती चली जा रही थी कि यह सिर्फ यात्रा भर नहीं है बल्कि इसका मतलब तो किसी अनजान से दरवाजे से भीतर प्रवेश करने जैसा है। निसंदेह दरवाजे में वह चेरापूंजी है जहाँ की यात्रा का मार्ग पानी से अटे पड़े वातावरण के बीच अनानास के सीढ़ीनुमा खेतों, हरियाली से लथपथ पहाड़ और लगातार गिरती बारिश की राह से होकर गुजरता है।
घर की अल्हड़ रसोई से चेरापूंजी की इस यात्रा ने फुलमतिया को पहली बार यह अहसास कराया कि प्रकृति केवल देखी नहीं जाती वह तो भीतर तक उतरती चली जाती है। होटल के कमरे में पड़ा आईना उसके सामने था। वह कुछ देर उसे देखती, तो कभी क्षितिज सामने होता मानों खुद से पहली बार उसका साक्षात्कार हो रहा हो। चेहरा वही था, नयन नक्श वही थे, साड़ी वही थी और अब तो माथे पर सिंदूर भी दमक रहा था परन्तु आईने में वह आँखें थी जो बहुत कुछ बदलती नजर आ रही थी। उन आँखों में एक गहरी जिज्ञासा थी, एक सवाल था और एक भविष्य भी था जो नजरें चुरा कर उससे यह सवाल कर रहा था कि क्या मैं यही हूँ?
तंद्रा टूटी तो रिसेप्शन में उसका नाम तैर रहा था। पति साथ में थे तो चिंता नहीं थी और उन्होंने भी हँसते हुए साथ दिया। ‘फुलमतिया’ नाम सुनकर क्षण भर के लिए काउंटर पर बैठे आदमी का स्वागत सामने था ‘एनी शॉर्ट नेम?’ ‘इंग्लिश नेम?’ पति ने सहजता से कहा ‘लिली’ लिख दीजिए और उस रजिस्टर के माध्यम से फुलमतिया अब “लिली” का अवतार बन गई। लिली शब्द की मादकता व एक नये से नाम के साथ अब नया स्वाद, नई भाषा, नया रोमांच और नई दृष्टि मानों सबकुछ नये अवधारणा के साथ सामने था। लोग उससे वैसी ही बातें कर रहे थे जैसा उसने कभी सोचा भी न था। उसकी सरलता अब ‘ग्रेसीयस’ बन चुकी थी और उसकी चुप्पी ‘मिस्टेरियस’।
लिली के सामने विकल्प सीमित थे और इन सीमित विकल्पों में से सामने पड़ा वह आईना था जो अब भी खुद मुस्करा रहा था। चेरापूंजी की बारिश से नहाने के बाद जब वे लौटे तो गाँव ने उसे पहचान लिया परन्तु वह खुद को पूरी तरह नहीं पहचान पा रही थी। उसके चलने का ढंग बदल गया था और बोलने में भी एक ठहराव सा आ गया था। इस बदलाव पर औरतों को फुसफुसाना ही था और प्रतिक्रिया यह कि सबकुछ हनीमून का असर है। इस प्रतिष्ठा से पति गदगद थे और उनके चेहरे से यह साफ झलक रहा था कि अब उन्हें अपनी पत्नी पर गर्व की अनुभूति हो रही है। प्रारब्ध देखिए कि यहाँ से बदलाव का दूसरा चरण शुरू होता चला गया।
इस चरण की रूपरेखा ‘अब मेरी पत्नी बिल्कुल सिटी वाली हो गई है’ के तौर पर तब सामने आई जब शहर से आई सहेली की तरफ से ‘लिली नाम बहुत प्यारा है, पर तुम पर तो ‘रोज’ ज्यादा जँचता है।’ जैसा विशेषण सामने आ गया। फुलमतिया ने उस रात पहली बार एक डायरी खरीदी और डायरी में लिखा, उसकी ‘फुलमतिया’ अब ‘रोज’ बन गई है। डायरी खुद से रास्ता तय नहीं किया करते परन्तु पल प्रति पल एक नये से सूर्योदय का प्रतिनिधित्व जरुर किया करते हैं। नतीजा सामने था कि नाम बदल जाने से क्या सचमुच हमारा जीवन बदल जाता है?
सवाल आते ही वही निर्जीव सी डायरी अब जी उठी थी और अनंत आसमान का समग्र क्षितिज उसके मार्गदर्शन के लिए सामने था। इस मार्गदर्शन में सोशल मीडिया पर दिया जाने वाला स्टेटस भी याद आता चला गया कि जब से सोशल मीडिया आया है तब से खुद की तस्वीरों के साथ पहचान तक बदलने लगी है। इनमें कुआँ, पीपल, रसोईघर, माँ की फटकार जैविक खुशबू आदि कहीं नहीं हैं और कैफे, लाइट्स, लाइक, कॉमेंट, सब्सक्राइब जैसे सजावटी शब्द साधक बनकर सामने हैं। इन साधनों में वह तो बिल्कुल भी नहीं था जब एक माँ कहती ‘बिटिया, इधर देख, कुएँ का पानी कम हो रहा है।’ कमी की इस व्यथा का जवाब एक ही था, “माँ, अभी व्यस्त हूँ”। इस जवाब के अपने मायने होते परन्तु आज ऐसा कुछ भी नहीं है क्योंकि अब वह “रोज” जो बन चुकी है। प्रारब्ध यह भी कि सबकुछ नया था फिर भी रोज के भीतर कहीं न कहीं एक फुलमतिया बची हुई थी जो कोने में खड़ी कहीं रो रही थी। इतने में एक दिन किसी अनजान का कॉमेंट आया, “यू लुक लाइक ‘जैस्मिन’ फुलमतिया अब फुरसत से जास्मिन बन गई।
सपने अब भी थे परन्तु इन सपनों में वही कुआँ था, पीपल की जड़ें थी और माँ की फटकार वैसी ही थी। आज भी चेरापूंजी की सभी तस्वीरें सामने है जिसमें वही बारिश है, यात्रा मार्ग वैसा ही है, अनानास के फसल भी वैसे ही हैं, हरियाली भी वैसी ही है परन्तु इसमें रोज, जास्मिन, ग्रेसीयस, मिस्टेरियस आदि का अतिक्रमण हो चुका था। हनीमून ने उसे दुनिया जरूर दिखाई परन्तु इस नयी दुनिया के बदले उसे खुद को गिरवी रखना पड़ा। अभी यह सबकुछ चल ही रहा था कि पानी के मोटर को बंद करने की माँ की अनवरत नसीहत फिर से सामने आ गई। तंद्रा टुटी तो बारिश थम चुकी थी और कोने में पड़ा मूल पहचान मुस्करा रहा था।
इधर डायरी का अंतिम पन्ना सामने था और जब इतना सबकुछ था तो जाने अनजाने हस्ताक्षर के स्थान पर स्वर्णाक्षरों के तौर पर “फुलमतिया” शब्द अंकित हो रहा था। अब एक बार फिर सवाल खुद से था कि क्या “वह” वापस “वही” में बदल सकता है? जवाब के लिए जो हस्ताक्षर सामने था उसमें नारी के तमाम स्वरुपों के बीच अब वह नहीं थी और वह भी कहीं नहीं था जहाँ से पगडंडियों के लक्षण बदल जाया करते हैं। अब तो सामने वह था जिसने बरसात की बूंदों को देखा, समझा, शुकून के साथ घर लौट आया। निर्णय सामने था और आज के स्टेटस में अब फुलमतिया के माथे का सिंदूर धमक रहा था।
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