मार्च 2026

नागेश्वर कालोनी, बोरिंग रोड, पटना
(कवयत्री परिचय: ‘विरासत’, ‘गुलकंद’ ‘ज्वाला’, कहानी-संग्रह ‘कालचक्र’ नामक उपन्यास, अनेक पत्र-पत्रिकाओं और ई बुक्स मेन सतत प्रकाशन)
बेटी सुगंधा का उत्साह देखकर उनका मन भी तो उमगा जा रहा था। इतने दिनों से वह उसकी उस अथक मेहनत को भी देख रही थीं और उसकी आँखों में पलते सपनों को भी! उनकी बेटी पढ़ी-लिखी और जुझारू थी, जिम्मेदारी लेना जानती थी.. ऐसे ही सक्षम युवाओं को अपने देश में नेतृत्व के लिये आगे आना चाहिए, वह सोचती थीं। अगर समर्थ और जागरूक नागरिक स्वयं से पहले, अपने देश के उत्थान के बारे में सोचने लगें.. अपनी क्षमता को पहचान, राजनीति को भी ध्येय बनाने लगें तो कितनी ही समस्याएँ अपने-आप सुलझ जायगीं। कब तक सिर्फ और सिर्फ डॉक्टरी-इंजीनियरिंग के पीछे भागते रहेंगें सब?
उनके आदर्शों से प्रेरित हो, सुगंधा और उसके दोस्तों ने सर्वशिक्षा, कुटीर उद्योग और नशा मुक्ति जैसे सरकारी अभियानों में इतना बढ़-चढ़कर काम किया कि लोगों में उनकी एक अलग पहचान बन गई.. प्यार और इज्जत मिलने लगी है। इसी से तो, आज इतनी बड़ी राजनैतिक पार्टी से सदस्यता लेने के अनुरोध के साथ, देशव्यापी अधिवेशन में व्यक्तव्य देने के लिए उसे आमंत्रित किया गया था। अपने इलाके की समस्याओं और उनके निदान के लिये अपने अनुभवों पर आधारित एक सारगर्भित भाषण तैयार कर जबसे वो अपने जीवन की एक नई शुरूआत के लिये घर से निकली थी, वे धड़कते दिल से उसके लौटकर आने का इंतजार करती बरामदे में ही बैठी रही थीं।
काफी देर से लौटी वह! चेहरा उतरा हुआ था। लगता है बहुत थक गई है बच्ची.. वो अदरक की चाय लेकर पास आ बैठी। अचानक ही उनके कंधे पर सिर रखकर सुगंधा ने दुःखी स्वर में कहा, “मैं एडजस्ट नहीं कर पाऊँगी उस माहौल में.. मतलबी लोग हैं सारे। वहाँ किसी को मेरी मेहनत से कुछ नहीं लेना-देना!”
आशंकित दिल धड़क उठा.. पर कुछ कहने के स्थान पर उन्होंने बस अपनी नजरें सुगंधा के चेहरे पर टिका दीं।
“जब मैं वहाँ पँहुची न, अध्यक्षा जी मुझसे बड़े तपाक से मिली थीं। मेरे भी मन में उनके लिये अपार श्रद्धा थी.. पर जानती हो माँ, मौका मिलते ही उन्होंने मेरे कान में क्या कहा? बोलीं, ‘मुझे तुम्हारे बारे में जानकारी है। आग है तुममें, ऐसे लोगों को तो आगे आना ही चाहिए। मैं मदद करूँगी तुम्हारी, पार्टी में बड़े से बड़ा पद दूँगी। तुम अभी कल्पना भी नहीं कर सकती कि कहाँ से कहाँ पहुँचा सकती हूँ मैं तुमको.. लेकिन तुमको तो पता ही होगा कि बिना कुछ दिये, कुछ मिलता नहीं है। सो तुम जब भी माइक उठाओ, तुमको मुझे हाईलाइट करना होगा। इसके लिए अपने भाषणों में कम-से-कम तीन बार मेरा नाम ले लिया करना.. बस! पर माँ, मुझे अच्छी नहीं लगीं उनकी यह बात.. ऐसे आगे नहीं बढ़ना चाहती हूँ मैं..!”
तमतमा आया था उनका चेहरा.. “न चाटुकारिता करो, न किसी की पीठ पर सवार होकर बढ़ो। जो बात गलत लगे, उसे मानने की कोई जरूरत भी नहीं! पर ऐसे लोग तो हर एक क्षेत्र में मिलेंगे जो तुम्हारे कामों का श्रेय लेने को उद्धत होंगे, तुम्हारा उपयोग करना चाहेंगे। उनसे डर कर अपना सपना भूल जाओगी क्या?”
“तब क्या करूँ मैं माँ?” सुगंधा ने अपनी बेबस सी निगाहें उनके चेहरे पर टिका दी तो अचानक ही उनका चेहरा कठोर हो आया था, “मन लगाकर अपना काम करो। स्वयं को साबित करने के लिये हर स्तर पर संघर्ष करना पड़ता है, उसके लिये आसान रास्ते मत खोजो। तुम युवा लोगों पर अपने देश की जिम्मेदारी है, सच्चाई बस यही है। अपने किरदार पर मेहनत करो, उसे ऊँचा उठाओ और लोगों के लिये ऐसी प्रेरणा बनो कि अकेली भी बढ़ो तो तुम्हारे साथ चलने के लिए लोग अपने-आप आते चले जाएँ।”
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