मार्च 2026

दिल्ली (साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त)
चुपचाप बेसुध सी ऑंखें बंद कर उसके एहसास को महसूसती रही …आँखों से नदी की एक पतली धार निकलती रही….वह कैसे बोले— किस से बोले, कोई भी तो साथ नहीं। साथी था आँखों का पानी। तुम्हारे सामीप्य से मेरे मन का शतदल खिल उठता है, ह्रदय मे किस बात की आकुलता है? वक्ष के निगूढ़ अन्तस्तल मे कौन सी रागिनी बज उठी है, ’टैगोर की पंक्ति जिन्दगी बन जाती है.. ‘अकल्याण के मार्ग मे लम्बी यात्रा से थकी संध्या मे तुम्हारा अचानक साक्षात्कार, विरुद्ध समय के मध्य अवांछित परिचय ‘बचपन से ही पिता की लाइब्रेरी में टैगोर, शरद, बंकिम, यशपाल आदि के बीच जीवन चलता रहा, भावनाओं में विगलित होती रही, और खुद ही प्रेम बन गयी, औऱ तुमने मुझे सजाया, सँवारा, पर खुद चलने का न अभ्यास कराया… छोड़ गये मझधार में…
वास्तव में, जीवन के अज्ञात पथ पर मानव का मानव के साथ गहनतम परिचय कब किस रूप मे हो जाता है – कौन जानता है..! और फिर उससे बिछड़ जाना… एक असहनीय पीड़ा … जब भी तेरी तस्वीर देखती हूँ, लगता है कहीं कुछ खो गया, जैसे कोई खोंच लग गयी दिल पर, कुछ छिल सा जाता है। शायद इसे ही तो भावात्मक तुष्टि कहते होंगे। भावात्मक सम्बन्ध? जो देश, काल, वय कुछ नहीं समझता। वैसे भी प्रेम के तीन धरातल होते हैं, दैहिक, मानसिक और आध्यात्मिक जिसमें दैहिक तो अधम है, मानसिक साधारण, आध्यात्मिक उत्तम। मानसिक और आध्यात्मिक में क्या अंतर है? क्या दोनों का रास्ता एक नहीं! मन से ही तो अध्यात्म की ओर जाया जाता है, जहाँ प्राण प्राण से, आत्मा आत्मा से मिलने का आस्वादन होता है, जिसे विश्व का कोई बंधन नहीं रोक सकता, कोई प्राचीर नहीं भेद सकता … एक शाश्वत प्रेम की चिरन्तन धारा….
हाँ, सोचती हूँ, अध्यात्म में डुबकी लगाने के लिए मन के सागर में तो गोते लगाने होते हैं। ये दैहिक! मुझे तो इस शब्द से ही घृणा है। प्रेमी प्रेमिका एक दूसरे की मृणाल भुजाओं मे बंध प्रेम की कसमे खाते हैं। ‘I LOVE U’ ये कौन सा प्रेम है!
प्रेम के आधार पर ही तो पारिवारिक, सामाजिक रिश्ते बंधे हैं। वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रेम के आधार पर ही तो की है। जितना दो… खाली नहीं होता पैमाना है ऐसा…
प्रेम तो ह्रदय की निधि है जो सिर्फ देना जानता है। जिसमें समर्पण है, प्यार को अनुभूत करना ईश्वर को पाना ही तो है। तुम नहीं हो पर तुम्हारे होने का एहसास… कागज़ की छाती को चीरती निर्मोह कलम।
एक भावुक औरत को समझने के लिये अविश्वास और संदेह भरी पूछताछ नही, कवि मन की सहृदयता चाहिये। ये मेरी कथा कविताएं हैं, बेहतर है कि मैं कहूँ ‘ये मैं हूँ’। इसके पन्नों में मेरे मस्तिष्क की उलझी कोशिकाये भी हैं, मेरे हृदय का पारदर्शी पिंड भी।
इसमें वे विरल क्षण, विरल सन्दर्भ भी हैं जिन्हें मैंने हृदय की भूमिका में तन्मय होकर, भावना विशेष से आविष्ट होकर मन प्राणों में भर भोगा है और कभी कविता, कभी कहानी, कभी संस्मरणों में तो कभी क़िस्त क़िस्त में फूट पड़े हैं।
इनमें वास करने वाले उन अबोध कोमल और मनमोहक भाव शिशुओं से मुझे बहुत प्यार है, क्योंकि उनको निहारते ही मैं ब्रह्मानन्द सहोदर की दिव्य भाव भूमि में पहुँच जाती हूँ। उस आध्यात्मिक संयोग का आस्वादन भी मुझे फिर से होता है, जो इन भाव शिशुओं की सर्जना में फलित हुआ था…
दिन बहुत ही बीत गये
सांसों के क्षण रीत गये
शब्दों के स्पर्शों से जैसे
सम्बन्धों के जगे गीत नये
पावन पावन मनभीना सा
मृदु मृदुकर कुछ झीना सा
ये तरल स्नेह बह आया है
उर से पलकों पर भीगा सा
तुम्हें सोचने तुम्हें जानने
मन उन्मन हो आया है
पागल प्यार सरसाया है
मेरा मन लहर लहर लहराया है।
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