अपनी मंजिल … रास्‍ते अपने

मार्च 2026

अंजली खेर
सिंगापुर विलाज, भोपाल
म. प्र.


लंबे अरसे से ट्रेवलिंग से दूर रहने और घर पर भी ‘पिन ड्राप सायलेंस मोड’ में रहने के बाद ‘मसूरी यात्रा’ के दौरान बेतहाशा भीड़भाड और शोरशराबा भी मानों जलतरंग सी रूनझुन सरगम छेड़ कानों में अमृतरस सा घोल रही थी।
हाँ, यह बात तो सोलह आने सच है कि बहुत कुछ पाने के लिए थोड़ा कुछ सेक्रिफाई करने का अहसास भी मखमली और अनोखा सा होता हैं।
अभी की ही तो ताज़ातरीन बात हैं… मसूरी की खूबसूरत वादियों में बिताये खूबसूरत पलों को संदूकची में कैद कर कभी न बिसरा पाने वाली यादों के पिटारे में कैद करना इतना सुखद अनुभव रहा है कि इन भावों को कागज़ पर उतारने के लिए जैसे मेरी कलम शब्‍दविहीन हो चली थी। पिछले कुछ दिनों से… जाने कितनी ही बार 6-8 लाइन विंडो पी सी पर लिख वापस डिलीट कर चुकी थी… भला हो मुझे टायपिंग आती हैं, वरना तो इतनी कांट-छांट के फेर में डस्‍टबिन में बेतरतीब से पड़े कितने ही काग़ज़ों की गुड़ीमुड़ी से पहाड़… मुँह चिढ़ाकर मुझपर “नेचर एनिमी’’ का टैग ही लगा देते।
हाँ … तो मैं बता रही थी कि प्रकृति भी कोई कमतर हुनरदार नहीं, बिना कूची के ही, कोहरे के धुंधलके में अधढ़के से पहाड़ों को जैसे अल-सुबह सुनहरी आभा में रंगकर हौले-हौले इंद्रधनुषी छटा बिखेर… क्षितिज को नववधु सा ही सजाने की कारीगरी बखूबी जानती हैं। ‘हर घंटे – हर पहर’ नेचर की ऐसे ही नयनाभिराम खूबसूरती के साथ ‘ट्यूलिप’ की हर छोटी-बड़ी अठखेलियों को मैं अपने कैमरे में कैद कर लेना चाहती थी। जी हाँ … 1600 के दशक को ‘ट्यूलिप मेनिया’ नाम दिया गया क्‍योंकि उस समय ट्यूलिप फूल हीरे जितने बेशकीमती थे और मेरी लाड़ली भी मेरे लिए उतनी ही अनमोल है, तभी तो मैं उसे प्‍यार से ‘ट्यूलिप’ ही कहा करती हूँ।
कल तक की छुईमुई सी शर्मीली मेरी ट्युलिप बेहद मस्‍ती के मूड में थी, जैसे वो मुझसे जुदा होने के पहले, इन सारे लम्‍हों को मेरे साथ जी-भरकर जी लेना चाहती थी… कभी अपनी वैलीज़ किनारे उतर खुले हरी-भरी नरम-नरम हरी ओस भरी घास के मैदानों पर दौड़ लगाती तो कभी वादियों में दोनों हाथों को फैलाकर जोर से बोलती –‘मम्‍मामामामामा…आई लव यू दिससससस मचचचचचचच….
अगले दिन आसमान छूती पहाडि़यों के पीछे से झाँकते सिंदूरी सूरज के गोले को मस्‍ती से लबालब मेरी लाड़ली ‘ट्यूलिप’ ने जैसे अपनी हथेली पर थाम लिया और उसके इस पोज़ को मैने मोबाइल में क्लिक करने में पलभर की देर न की। सच सूर्य जैसे ओजस को अपने रोम-रोम में बसाकर शांत, स्निग्‍ध चांद जैसी सौम्‍यता व्‍यक्तित्‍व में झलकाना और धरती पर पैर बनाये रखना हर किसी के बस की बात नहीं।
ऊँचे-ऊँचे पहाड़ों पर फैले विशालकाय हरे-भरे पेड़ों को तेजी से पीछे छोड़ती हमारी बस सांय-सांय कर ज्‍यों-ज्‍यों आगे बढ़ती जा रही थी, वैसे-वैसे यादों का धुंधलका उतनी ही तेजी से छंटता चला जा रहा था। ‘आंटी… यदि मैं सही पहचान रही हूँ तो आप ‘ट्यूलिप दी’ की मम्‍मा हैं न… यादों की झुरमुट से बाहर झाँक, मैने पास वाली सीट पर पलटकर देखा… एक 14-15 साल की बिटिया, बहुत आश्‍चर्य और प्रश्‍नभरी नज़रों से मुझे देख रही थी।
हाँ … मैं ट्यूलिप की मम्‍मा हूँ। यह सुनते ही मेरे साथ वाली सीट पर बैठे भाई साहब से अपनी सीट एक्‍सचेंज कर मेरे पास इतनी आत्‍मीयता से आकर बैठ, उसने मेरा हाथ अपने हाथों में थाम लिया था।
आंटी… मैने यू ट्यूब पर ‘ट्यूलिप दी’ के इंटरव्‍यू के समय आपको भी बहुत ध्‍यान से देखा था… वो लगातार बोलती रही… और मैं सुनती रही… यूँ लगा जैसे मेरा जीवन ही सार्थक हो गया हो। बेशक इसकी वाइफ़… उसकी बेटी…. उसकी बहन… के बजाय ‘ट्यूलिप की माँ … कहकर मिली पहचान से मेरा मन गदगद हो उठा था… मैं ही नहीं, हर माँ की ख्‍वाहिश होती हैं कि उसके बच्‍चे उस मुकाम पर पहुँच जाये कि उसकी पहचान उसके बच्‍चे से हो, तो उसकी जिंदगी, उसकी परवरिश, सब सफल हो जाती हैं।
‘दी’ के सारे इंटरव्‍यू मैने एक नहीं हज़ारों बार सुने, और आप यकीन न मानेंगी, उनकी एक-एक बात मुझे बाय-हार्ट यूँ लर्न हो गई है कि आधी रात में भी कोई जगाकर पूछे न तो मै उनके पूरे इंटरव्‍यू एज-इट-इज बोल सकती हूँ। उन्‍होंने कहा था न–
‘खुद को सँवारने, समझाने या इंस्‍पायर करने के लिए कोई भी बाहरी शख्‍स मॉटिवेट नहीं कर सकता, इसके लिए हमें खुद को मॉटिवेट करना होगा, अपने कॉन्फिडेंस को नये सिरे से जगाना होगा।’ सच उनकी ये बातें बहुत इंस्‍पायर कर गई, पर उन पर चलने के लिए जबरदस्‍त ‘विल पॉवर’ चाहिए, जो शायद मुझमें नहीं।
ऐसा कुछ नहीं बेटा ‘विल पॉवर’ सबमें हैं, बस हमें खुद पर विश्‍वास रखना सीखना होगा।
‘आंटी! क्‍या ‘दी’ बचपन से ऐसी कॉन्फिडेंट, स्‍मार्ट रही हैं? उसके इस सवाल को सुन एक बार फिर मेरा मन अपनी जिंदगी की मोटी सी किताब के कई सारे पन्‍ने एक साथ पलटकर पुरानी यादों के गलियारे के अनेकों मोड़ों – गलियों से होकर गुज़रने लगा….
एक डरी-सहमी, हमेशा इनसिक्‍योरिटी वाली फीलिंग पूरी बॉडी लेंग्‍वेज में समेटे, कॉम्‍पलेक्‍स से भरी पर्सनेलिटी से लेकर एकदम कॉन्‍फीडेंट, स्‍मार्ट और अपने कैरियर को लेकर एकदम क्लियर विज़न बनाने तक का सफ़र… क्‍या ‘ट्यूलिप’ ने इतनी आसानी से तय किया? नहीं जी। जिंदगी का सफ़र इतना सीधा-सपाट नहीं, कि जो सोचा वो बिना उलझनों और परेशानियों के मनचाही मंजिल पर पहुंच सके… वक्‍त की आँधी, परिस्थितियों के थपेड़े और कदम कदम पर बिछे काँटों की शैय्या से होकर ही सक्‍सेस की राह गुज़रती हैं।
ऑफिस से लंच में जब भी घर पहुँचती, कितने ही साफ्ट टॉयज को अपने तकिये के आस-पास कतार में रख नींद के आगोश में डूबी नन्‍हीं सी ट्यूलिप को देख मन वात्‍सल्‍य से भर उठता था…शायद अपना अकेलापन दूर करने का उसने अपना ही तरीका ढूँढ लिया था। मेड बहुत धीमें से दरवाज़ा खोलती, पर…. कितनी ही गहरी नींद के आगोश में होने के बावजूद मेरे आने की आहट से वो झट जाग जाती और ‘मम्‍मामामामामा’ कहकर दोनों नन्‍हे हाथ फैला मुझे अंक में भर कहती – ‘मम्‍मा! आप नहीं होती तो मुझे बहुत डर लगता हैं।’ अपनी बाहों में भरकर उसे प्‍यार से सहलाते हुए उसकी मीठी सी भींनी-भींनी खुशबू, गुलगोथड़े से गाल छूकर तो ऐसे लगता मानों जिंदगी का हर सुख मेरे आँचल में ही सिमट गया हो। दिल करता कि कभी-किसी भी समय इसे यूँ अकेला न छोडूं…. बस अपनी आँचल में ही हमेशा-हमेशा छिपाए रखूँ। पर अपने दिल के टुकड़े को खुद को तराशने, उसको उड़ने के लिए खुला-ऊँचा आसमान देना तो हर माता-पिता का फ़र्ज ही हैं।
मम्‍मा! मुझे डोरेमॉन देखना …
नहीं… पहले ये सेंडविच फिनिश करो… अच्‍छे बच्‍चे जिद नहीं करते…
जब तक डोरेमॉन नहीं लगाओगी, हम नहीं खाएंगे।
आगे वाली सीट पर माँ-बेटे की बातों को सुन जैसे मैं यादों की गहरी नींद के आगोश से बाहर आ गयी थी। ट्यूलिप के स्‍कूल से लौटने के पहले ही मैं लंच में घर आकर उसके लिए गर्मागर्म खाना प्‍लेट में रेडी रखती थी, पर यह क्‍या! स्‍कूल से आकर बैग किनारे पटक, खाने की प्‍लेट हाथ में थामें वह टी॰ वी॰ पर ‘डोरेमॉन’ पर ही नज़रें गड़ाये बैठ जाया करती। कभी तो खाना ठंडा हो जाता और कभी उसे समझ ही नहीं आता कि उसने खाया भी क्‍या, क्‍योंकि वो तो टी॰ वी॰ में ही मगन होती।
एक नहीं हजारों बार ये समझाने के बाद भी कि ‘कुछ पाने के लिए मेहनत, पढ़ाई के साथ खेल-कूद और हेल्‍दी इटिंग हेबिट्स होना बेहद जरूरी होता हैं, मेरी बातों को सुना-अनसुना कर कल्‍पनालोक में खोयी सी ट्यूलिप मुझसे कहती – ‘मम्‍मा! मैं देखना चाहती हूँ कि मेरा फ्यूचर क्‍या हैं, मैं बड़ी होकर क्‍या बनूंगी, और इसीलिए डोरेमॉन वाला ‘एनी वेयर डोर’ मुझे भी चाहिए।
मैं उसे समझाती ‘ऐसा कोई डोर नहीं होता बेटा, हमें अपनी राह खुद बनानी होती हैं।’ पर ट्यूलिप के कानों पर तो जैसे जूं भी न रेंगती।
आंटी! आंटी! लगता है आप फिर ‘दी’ की यादों में खो गई हैं।
हाँ बेटा। सच ट्यूलिप का बचपन से अब तक का ये सफ़र सपने जैसा ही रहा हैं, मैं गाहे-बगाहे उन्‍हीं सपनों में खो सी जाती हूँ बेटा।
आंटी! मैं भी मन ही मन ‘दी’ की तरह किसी बड़े कैरियर के लिए सोचती हूँ तो आस-पास के हमारे अपनो के ही नेगेटिव कमेंट्स मेरे हौसलें पस्‍त कर जाते हैं, मैं क्‍या करूँ जिससे मैं ‘दी’ की तरह ‘सेल्‍फ मॉटीवेटेड’ बन सकूँ?
बेटा! वो गाना तो सुना होगा न तुमने ‘कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम हैं कहना’, यदि तुम सच में कुछ बनने का सपना दिल में पाल रही हो तो मेरी बात बहुत ध्‍यान से सुनना और समझना, लोगों के चुभते कमेंट्स से टूटकर बिखरने वाले तो कई मिल जाएंगे पर सक्‍सेस पाने के लिए ट्यूलिप की तरह ही नेगेटिविटी को पॉजिटिविटी में बदलने की ज़िद और जुनून अपने अंदर पैदा कर अपनी तकदीर अपने हाथों लिख डालो बेटा।
वो कैसे आंटी?
ये बताओ कि जब कोई तुम्‍हारी लेग पुलिंग करता हैं तो तुमको कैसा फील होता हैं?
आंटी कभी कभी तो हताशा घेर लेती हैं, और कभी तो उन पर बहुत गुस्‍सा आता हैं, तो चिडचिडाहट में गलत शब्‍द भी बोल देती हूँ।
अब ध्‍यान से सुनो और समझो।
कभी भी दूसरों की बातों को दिल पर हावी न होने देना। पर दूसरी ओर गुस्‍से की उस चिंगारी को बुझाने के बजाय और सुलगाना।
क्‍या मतलब आंटी? आपकी बात मेरी समझ नहीं आ रही।
‘बेटी, कुछ ऐसी ही आग सी दहक उठी थी ट्यूलिप के मन में भी अपने कैरियर को लेकर अच्‍छे ऑप्‍शन की आस में वह उनके पास गई पर थोड़ी देर बात करने के बाद उससे कहा कि उसकी लेंग्‍वेज पर कमांड नहीं, स्‍मार्टनेस नहीं, खुद को प्रेजेंट करते नहीं आता तो कोई ऐसी जॉब ढूंढें जिसमें पब्लिक डीलिंग न करनी पड़े। 10 से 5 की नौकरी ही कर लें, उतना ही बहुत… इतना सुन बहुत बेचैन हो गया था उसका मन।’
फिर ऐसा क्‍या किया दी ने कि सबसे टफ़ एक्‍जाम में अपनी जगह बनाई?
अपने बिखरे मन को ट्यूलिप ने जल्‍द ही समेटा। पर अंदर गले तक भरे गुबार को शांत न पड़ने दिया, खुद को गूंथकर तराशने की जो मुहिम उसने छेड़ी वो आज इस मुकाम पर आकर खत्‍म हुई।
क्‍या कुछ किया दी ने आंटी? मुझे वो सब बताइये प्‍लीज। सबसे पहले उसने अपने कमरे मे डेश बोर्ड पर लिखा – ‘जो सपना आँखों में पाला, उसे सच करके दिखाना हैं, कुछ कहकर नहीं, अब तो कुछ बनकर ही उनको जवाब देना हैं। फिर हेल्‍दी डाइट प्‍लान के साथ स्‍टडी प्‍लान तैयार किया। इंग्लिश, मैथ्‍स सहित हिंस्‍ट्री, इको और जी॰ के॰ पर अच्‍छी कमांड के लिए ऑनलाइन पेड क्‍लासेस के साथ फ्री सब्‍सक्रिप्‍शन भी लेकर धीमे – धीमें सिटिंग टाइम बढ़ाते हुए रेगुलर करेंट अफेयर्स के लिए भी चैनल को सब्‍सक्राइब किया।’
वावववववववव! क्‍या खूब प्‍लानिंग की आंटी हमारी दी ने।
हाँ बेटा! उसके बाद उसने पीछे मुड़कर न देखा। इंग्लिश एक्‍सपर्ट से बेझिझक रेगुलर बातें करना। पापा से पॉलिटिक्‍स, हिंस्‍ट्री और इंटरनेशनल रिलेशन्‍स पर लॉजिकल बहस करते देखना मेरे जिंदगी के खूबसूरत यादगार लम्‍हों में से एक रहे हैं।
सच आंटी! ट्यूलिप दी ने आज जो मुकाम हासिल किया हैं, वो सच ही उसकी असली हकदार हैं, सुनकर तो आज मेरे भी हौसले बुलंद हो रहे हैं।
बस तो फिर क्‍या हैं, घर पहुँचते ही बस लग जाओ जम कर अपने लक्ष्‍य की ओर। गाँठ बाँध लो कि एक साल की मेहनत से केवल 10 साल तक का कैरियर बना सकते हो, पर पाँच साल की मेहनत तुमको जिंदगी के पचास साल का यशस्वी कैरियर दे सकती हैं… च्‍वाइस तुम्‍हारी… मेहनत का शॉर्टकट या फिर ट्यूलिप की तरह ‘आईएएस’ बनने का ख्‍वाब बुन रहे तो, खुद में इतना आत्‍मविश्‍वास भर लो कि कितनी ही परेशानियां आये, परेशानियाँ ही अपने आगे घुटने टेक लें और कल तक कमेंट्स करने वाले भी आपकी तारीफ करने को मजबूर हो जाएँ।
जी आंटी! जिस तरह दीप से दीप जलाकर जगमग उजियारा फैलता हैं, आज ट्यूलिप दी से मैं इंस्‍पायर हुई। यकीन मानिए, मेरी पूरी कोशिश रहेगी कि आने वाली पीढी के लिए मैं भी कुछ ऐसा ही कर सकूँ।
बस सरसराते हुए आगे बढ़ रही थी, एक बेटी को उसकी मंजिल पर छोड़कर तो दूसरी को अपनी मंजिल की ओर ले जाने।
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