मार्च 2026

ढाबा मेन रोड पर ही था मगर सड़क और ढाबे के बीच करीब बीस फीट की दूरी भी थी। इस दूरी के बीच एक बड़ा सा पेड़ था आम का, जो काफी पुराना और जर्जर था। लेकिन ढाबे वाले ने पोस्टर चिपका कर पेड़ के तने की बदसूरती छिपा ली थी। ढाबे का नाम गंगा था। ढाबे का नाम साइनबोर्ड पर बड़े अक्षरों में ‘गंगा’ लिखा था और नीचे एक टैगलाइन लिखी थी – ‘यहाँ कुछ नहीं मिलेगा गंदा’। हरिकेश ने ढाबे के प्रचार की यह तुकबंदी पढ़ी तो उसके होंठों पर एक मुस्कान खेल गई। वह बुदबुदाया ‘आजकल लोग स्मार्ट मार्केटिंग के चक्कर में अपने प्रोडक्ट की निगेटिव मार्केटिंग भी करने लगे हैं। जब गंगा नाम दिया था तब इसका मतलब ही शुध्द और साफ हो गया तो इसमें गंदगी ना होने की बात कहनी ही क्यों? वैसे भी काम-धंधा गंगा नाम रखने से नहीं चलेगा बल्कि अच्छी साफ-सफाई और क्वालिटी सर्विस देने से बढ़ेगा। किसी तुकबंदी या साइनबोर्ड से नहीं।
ढाबे वाला हरिकेश के बुदबुदाने की आवाज सुनकर आकर उसके पास खड़ा हो गया। हरिकेश ने जायजा लिया कि यह ढाबा थोड़ा सस्ता दिख रहा है और साफ-सुथरा भी है। उसने तय किया कि यहीं पर कुछ खा-पी लिया जाये। चूंकि धूप काफी तेज थी सो उसने सोचा कुछ खा-पी कर सुस्ता लिया जाए और फिर खरीदारी की जाए।
उसने अपनी मोटरसाइकिल उसी पेड़ के नीचे धूप की तुर्शी बचाते हुए पहले ही पार्क कर दी थी।
ढाबे वाला हरिकेश के बड़बड़ाने की मतलब की बात का जायजा लेने के लिये निरंतर उसे सवालिया नजरों से देखे जा रहा था। हरिकेश ने थोड़ा असहज महसूस किया। उसने माहौल को सरल करने का प्रयास करते हुए मुस्कराकर कहा–
“गंगा- यहाँ कुछ भी नहीं गंदा। क्या बढ़िया तुकबंदी दी है आपने’।
“क्या करें साहब, यही अपना धंधा है। वैसे भी हमारे यहाँ कुछ भी गंदा नहीं है। न खाना, न सर्विस और न ही और कुछ। सब कुछ चकाचक और एक नम्बर। आप निश्चिन्त रहिए और ऑर्डर दीजिये, क्या खाना है’?
हरिकेश ने दीवार पर लिखे भोज पदार्थों की रेट लिस्ट का मुआयना किया और खाने की थाली का आर्डर दे दिया। ढाबे वाला आर्डर लेने के बाद वहाँ से चला गया।
हरिकेश ने पास लगे नल से हाथ–मुँह धोया। पेड़ की छाया में ही पड़ी कुछ पुरानी बेंच और कुर्सियों में उसने पनाह ली। घर पहुंचने की जल्दी में उसने सुबह का नाश्ता भी ठीक से नहीं किया था। उसने मेस से चलते-चलते नाश्ते का पैकेट ले लिया था कि रास्ते में कहीं खा लेगा। मगर रास्ते में उसे याद ही नहीं पड़ा कुछ। वह खाने की प्रतीक्षा करने लगा और यहाँ-वहाँ देखकर वक्त काटने का प्रयास करने लगा। अचानक उसकी नजर मोटरसाइकिल की डिक्की के पास बंधे छोटे से झोले पर पड़ी। उसके होंठों पर मुस्कुराहट खेल गई। वह बुदबुदाया ‘घर पहुंचने की जल्दी में मुझे भूख-प्यास का कुछ होश ही नहीं रहा, गजब ही है’। उसने सोचा ये बचा हुआ नाश्ता भी कर लेता हूँ आने वाली खाने की थाली के साथ। इससे नाश्ते के पैकेट का भी सदुपयोग हो जाएगा और फुल प्लेट खाने के पैसे भी नहीं लगेंगे। हाफ प्लेट के ऑर्डर से ही काम चल जाएगा। दीवार पर खाने-पीने का रेट कार्ड उसने पुनः देखना शुरू किया। उसने पाया कि ढाबा तो ये सड़क किनारे वाला है मगर रेट इसके रेस्टोरेंट वाले हैं।
“बाबू जी, कुछ खिला दीजिये। कल रात से कुछ भी नहीं खाया है’’ पीछे से एक आवाज आई।
उसने घूमकर देखा तो एक अधेड़ उम्र का मैला-कुचैला इंसान बड़ी दीन-हीन हालत में खड़ा था। उसके एक हाथ नहीं था और पीठ पर बड़ा सा कूबड़ था।
वह कुछ सोच-बोल पाता तब तक ढाबे के मालिक ने उसके पास आकर कहा ‘क्या बात है बाबूजी। कुछ और आर्डर करना है क्या’?
उसने दीवार पर लिखे रेट कार्ड का पुनः जायजा लिया फिर कुछ सोच कर बोला- ‘हाफ थाली नहीं हो सकती है क्या, या फिर आर्डर बदल दीजिये। वो मेरे पास पहले ही खाने का सामान है मैं उसे भी सिरज लेता’।
“नहीं साहब, आर्डर लग गया तो अब न तो बदला जा सकता है और न ही कैंसिल हो सकता है। अब तो आपको पूरे थाल के पैसे देने पड़ेंगे भले ही आप खाएं या उसे फेंके। और हाँ साहब, हमारे यहाँ बाहर का खाना बिल्कुल अलाउड नहीं है। यह सब सामने दीवार पर लिखा है, आपने पढ़ा नहीं क्या? नहीं पढ़ा है तो फिर से पढ़ लीजिये। कस्टमर सिर्फ रेट-कार्ड देखते और याद रखते हैं और बाकी के नियम-कानून भूल जाते हैं’।
ढ़ाबे वाले द्वारा सख्त लहजे में अप्रिय तरीक़े से कही गयी बात हरिकेश को काफी बुरी लगी।
उसने भी नाराजगी भरी नजरों से ढाबे वाले को देखा।
ढाबे वाले ने हरिकेश से नजरें हटाकर भिखारी की तरफ देखा, उसे कोई गंदी सी गाली दी जिससे सहम कर भिखारी पेड़ के नीचे छिप गया। ढाबे वाला चला तो गया मगर वह भिखारी पेड़ के नीचे बैठ गया।
थोड़ी देर में गर्मागर्म थाल में स्वादिष्ट भोजन हरिकेश के सामने था। उसका मन तो ढाबे वाले के खराब बर्ताव से खराब हो गया था। पर आज उसके बच्चे का जन्मदिन था इसलिये वह इस खुशी के दिन इस मामूली झड़प के कारण अपना दिन खराब नहीं करना चाहता था। उसने अपने मन के सभी बुरे ख्यालों को झटक कर भोजन पर अपना फोकस केंद्रित किया। थाली आते ही हरिकेश ने नाश्ते का पैकेट भी खोल लिया।
अचानक उसने सामने देखा तो पेड़ के पीछे से दो जोड़ी सहमी आंखें सहमी, कातर एवं उम्मीद भरी नजरों से उसे देख रही थीं।
उसने कुछ सोचा और खाने को देखकर अंदाजा लगाया कि उसका पेट तो थाली से ही भर जाएगा तो नाश्ते का पैकेट अतिरिक्त ही बचा रहेगा। कुछ सोच-विचार उसने पेड़ के पीछे से देख रहे भिखारी को इशारे से बुलाया। वह आदमी दौड़ता हुआ आया। उसकी आंखें उम्मीद से चमक रही थीं।
हरिकेश ने उसे नाश्ते वाला पैकेट दे दिया।
तब तक ढाबे वाले ने पीछे से भिखारी को गंदी सी गाली दी। हरिकेश ने पलटकर देखा तो ढाबे वाले ने काउंटर पर बैठे-बैठे ही कहा –
“इन सबको यहाँ मुँह न लगाइए साहब। कोई बात बिगड़ गई तो मैं जिम्मेदार नहीं होऊंगा। खामखां मेरे ढाबे पर तमाशा खड़ा हो जाएगा। बाद में मुझे मत कुछ कहिएगा’।
हरिकेश को ढाबे वाले की बात कुछ अजीब लगी। उसके दिमाग में कई ख्याल आये-गए। उसने इशारे से भिखारी को वहाँ से जाने को कहा। भिखारी तुरंत नाश्ते वाला पैकेट लेकर वहाँ से चला गया। खाने की खुश्बू और भूख की तीव्रता से हरिकेश ने अपने मन के सवालों को झटका और खाने पर टूट पड़ा।
खाने के बाद उसने भुगतान किया। उसने टाइम और मौसम का जायजा लिया। धूप अभी बहुत तेज थी और उसे थकान भी लग रही थी। उसने सुस्ताने की सोची और वहीं ढाबे की चारपाई पर आराम करने लगा।
शोर से उनकी तन्द्रा टूटी तो उसने देखा कि आठ-दस लोग मैले-कुचैले कपड़ो वाले एक व्यक्ति को पकड़े हुए थे और चीख-चिल्ला रहे थे। वह चौंक कर उठा और ध्यान से देखा कि जमीन पर जो व्यक्ति छटपटा रहा है वह तो वही भिखारी था जिसे उसने खाना दिया था।
भीड़ बढ़ती जा रही थी और तनाव, चीखना, चिल्लाना बढ़ता ही जा रहा था।
ढाबे वाला हरिकेश के पास आकर बोला ‘साहब, क्या दे दिया आपने उसे खाने में? खाना शायद खराब हो गया था। ये लोग तो कह रहे हैं कि जहर था शायद खाने में। कहीं मर-मरा गया वह तो थाना-पुलिस हो जाएगा। मैं भी फंस जाऊंगा साहब। मैंने तो आपको मना भी किया था कि इन लोगों से दूर रहो। पर आप नहीं माने। बहुत बुरी तरह से फंस गए आप। किसी तरह से सेटल कीजिये साहब नहीं तो अनर्थ हो जाएगा’।
हरिकेश हैरान, परेशान और चिंतित हो उठा। उसे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करे? उसके दिमाग में घर-परिवार, अबोध बच्चा, पत्नी, अम्मा-बाबूजी, छोटी बहन, जेल-पुलिस, कोर्ट जैसे कई विचार आये-गए।
उसने ढाबे वाले से कातर स्वर में कहा –
“हाँ भाई, तुम्हारी बात न मानकर मैंने गलती की। पर अब तो मैं फंस गया हूँ। किसी तरह उबारिये मुझको। मैं फैमिली वाला आदमी हूँ। इन सबमें पड़ गया तो मेरा परिवार तबाह हो जाएगा। किसी तरह उबारो आप मुझे इस सब से’।
“देखता हूँ साहब क्या हो सकता है मुझसे? कहीं कुछ ऊंच-नीच हो गयी उस आदमी के साथ तो आपकी वजह से कहीं मैं भी न फंस जाऊं। आप अंदर जाकर काउंटर पर बैठिए। मुझे तो डर है कहीं इन भिखारियों का झुंड आप पर हमला न कर दे’ ढाबे वाले ने धीरे से कहा।
पहले से डरा हुआ हरिकेश यह सुनकर और भी डर गया। वह काउंटर के पीछे जाकर फ्रिज और अन्य सामग्री के बीच छिपकर इस प्रकार बैठ गया कि भिखारियों का झुंड उसे देख न सके।
उससे बात करके ढाबे वाला भिखारियों के पास चला गया। उसके पीछे हरिकेश अपने साथ होने वाली अनिष्ट एवं अनहोनी को सोचकर डरता रहा।
काफी देर तक चीखने-चिल्लाने, रोने-धोने की आवाजें आती रहीं। हरिकेश इस दरम्यान अपने देवता-पित्तर को सुमिरता रहा।
ढाबे वाला जब लौटा तो उसने परेशान स्वर में कहा –
“साहब ये लोग किसी भी तरह मान नहीं रहे हैं। मैंने हर जतन करके देख लिया। दवा कराने को भी कहा पर नहीं माने। इन लोगों की भी यूनियन है होती है। कुछ लोग उन्हें बुलाने गए हैं। थोड़ी देर में और भी इनके लोग आ जाएंगे। थाना-पुलिस तो होगा ही मगर उससे पहले मार-पीट भी हो सकती है। मैंने इस सबसे बचने की बात की तो बीस हजार रुपये मांगे हैं। अब आप ही बताएं साहब क्या किया जाए। आपसे तो सिर्फ इतने पैसे ही मांगे हैं। मेरा तो न जाने क्या हो अभी। ढाबा बंद करवाने की भी धमकी दे रहे हैं। मेरा तो जो होगा सो होगा। पर आपको पहले बचाऊंगा। आप किसी तरह से ये मामला दस-पंद्रह हजार के बीच सेटल करके यहां से बच के निकलो’।
हरिकेश को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या करे? उसने घर-परिवार के बारे में सोचा। फिर अचानक अपनी सोच को झटकते हुए उसने निर्णय किया। उसने अपनी सभी जेबों को जमा तलाशी लेने के बाद सारे पैसे गिने। कुल आठ हजार आठ सौ सत्तर रुपये निकले।
उसने ढाबे वाले को सारे पैसे देते हुए कहा-
“अब एक फूटी कौड़ी नहीं है मेरे पास। चाहे मेरे बच्चों की कसम ले लो मुझसे। यही सब कुछ था’।
ढाबे वाले ने उससे सारे पैसे ले लिये और धीरे से बोला–
“साहब, वैसे तो ये पैसे पूरे नहीं हैं। लेकिन जब आप अपने बच्चे की कसम खा रहे हैं तो फिर जाइये। अब जो कुछ भी होगा मैं मैनेज कर लूंगा। चाहे मुझे जो भी करना पड़े। अपनी मोटरसाइकिल की चाबी मुझे दीजिये और ढाबे के पीछे खड़े हो जाएं। वहीं दूसरी तरफ की सड़क से निकल जाएं। इधर बहुत बवाल है’।
हरिकेश ने ढाबे वालो को चाबी दी और ढाबे के पीछे चला गया।
थोड़ी देर बाद ढाबे वाला मोटरसाइकिल ढाबे के पीछे ले आया। हरिकेश ने बिना कुछ कहे मोटरसाइकिल स्टार्ट की और पांच-छह कदम चलने के बाद मोटरसाइकिल रोक कर घूम कर ढाबे वाले को निर्विकार भाव को देखते हुए कहा–
“गंगा नाम देखकर मैं यहाँ खाने आया था पर न जाने मुझे मेरे कौन सी पाप की सजा मिली। आपने तो कहा था कि यहाँ कुछ भी गंदा नहीं होता न सर्विस और न ही व्यवहार। पर मेरे साथ तो नेकी करने के बावजूद भी बहुत ही गंदा बर्ताव हुआ। यकीन कीजिये मैंने उस भिखारी को जो खाना खाने को दिया था उसमें कुछ भी गड़बड़ी नहीं थी। मुझे मेरे बच्चे की कसम है। मगर फिर भी फंस गया मैं’ ये कहकर हरिकेश ढाबे वाले की बात का जवाब लिए बिना मोटरसाइकिल लेकर तेजी से आगे बढ़ गया।
ढाबे वाला हरिकेश को जाते हुए तब तक देखता रहा जब तक वह नजरों से ओझल नहीं हो गया।
ढाबे वाला धीरे से बुदबुदाया ‘मैं जानता हूँ साहब कि आपने भिखारी को जो खाना दिया था उसमें कुछ गड़बड़ नहीं था। आज आपका दिया हुआ खाना नहीं बल्कि आपका नसीब गड़बड़ था जो फंस गए। बच्चे की कसम मान ली मैंने आपकी पर क्या करें गंदा ही सही पर ये भी तो हमारा धंधा है’ ये कहते हुए ढाबे वाला कुटिलता से हँसा।
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