लीक से हटकर

मार्च 2026

 रिमझिम झा
रिमझिम झा
कटक, ओडिशा

प्रियंका जब से हॉस्टल से आई थी गौर किया था कि उसकी दादी कोई भी काम करना चाहे तो उसकी माँ उन्हें यह कह कर हटा देती थी “माँ जी रहने दीजिए आपसे ना हो पाएगा”, “माँ जी अब आपकी उम्र हो गई आप छोड़ दीजिए”, “माँ जी अब बैठ जाइए”, “माँ जी आप अपने कमरे में जा कर आराम कीजिए।”
प्रियंका की माँ कहती तो बड़े आदर से थी लेकिन कहीं ना कहीं यह सारे कथन प्रियंका की दादी को निठल्लापन और बुढ़ापे की तरफ तेजी से धकेल रहे थे।
माँ से कुछ कहे इतनी उसमें आज भी हिम्मत न थी। लेकिन दादी की स्थिति देखकर उसे बुरा लग रहा था। लेकिन चुप रहकर उस दादी के साथ नाइंसाफी नहीं कर सकती थी। वही दादी, जो बचपन में माँ की व्यवस्ता होने पर चोटी बनाने में, स्कूल बैग सजाने जैसे अन्य कई कामों में मदद किया करती थीं, इतना ही नहीं प्रियंका की गलतियों को छुपाने के लिए माँ के साथ लड़ भी जाती थी।
आखिर कर एक दिन “दादी! प्लीज़ मेरी चोटी कर दीजिए ना आज, जैसा आप बचपन में किया करतीं थीं” प्रियंका ने दादी से आग्रह किया।
माँ बीच में बोलने ही वाली थी की प्रियंका ने रोक दिया।
“माँ! प्लीज मेरी खातिर”।
माँ चुप रह गई।
“दादी! प्लीज मुझे वो वाला हलवा बनाना सीखाइए ना जो आप मेरा टिफिन में पैक करके देती थी और मेरे सारे दोस्त अपना अपना टिफिन भूल कर मेरे टिफिन पर टूट पड़ते थे”। इन सब बातों से प्रियंका का उद्देश्य केवल दादी को व्यस्त रखना होता था।
दादी तो जैसे निहाल हुई जा रही थी। प्रियंका के बोलने से पहले वह काम करने के लिए तैयार हो जाती थी। व्यस्त रहने की वजह से इन दिनों वो अपने आप में नई ऊर्जा महसूस करने लगी थी। अब वह खुद से योग अभ्यास भी करने लगी थी जो लगभग बंद हो चुका था। पार्क में टहलने के लिए निकलने लगी थी जिसकी उन्हें सख्त मनाही थी।
एक शाम दादी जी को आने में थोड़ी देर हो गई। प्रियंका की माँ घर में बैठी परेशान हो रही थी।
“इसीलिए मैं उन्हें बाहर नहीं जाने देती, प्रियंका क्या जरूरत है उन्हें बाहर जाने देने की कहीं कुछ हो गया तो?
“तो माँ आप भी उनके साथ जाया करें न” प्रियंका ने धीरे से कहा।
“समय के अनुरूप वे बुढ़ापे की तरफ बढ़ रही है लेकिन आप तो उन्हें मानसिक शिथिलता की तरफ धकेल रहीं हैं। आप उनका केयर कीजिए लेकिन साथ में खड़े होकर उन्हें जिंदा होने का एहसास भी कराते रहिये न.…।
तब तक दादी बरामदे तक आ चुकी थीं।
“दादी! कहाँ रह गई थीं आप? हमें कितनी चिंता हो रही थी” प्रियंका ने उनका हाथ थामते हुए कहा।
“पता है पीहू, आज मैं ना राहुल की दादी को उनके घर तक हाथ पकड़ कर लेकर गई … दौड़ के मैदान में जीते हुए बच्चे की तरह दादी उल्लसित हो कर सारी बात बता रही थी।
*****

यह भी पढ़ें  उदासी (लघुकथा)

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Scroll to Top