जून, 2023
बाइबिल में ईसा मसीह द्वारा कही गई एक बहुत ही प्रसिद्ध और उपयोगी कहानी है— “खोई हुई भेड़ की कहानी”। सच में, अगर हमारे पास 10 चीज़ें हों और उनमें से कोई एक खो जाए, तो हमारा ध्यान बची हुई नौ चीज़ों पर नहीं, बल्कि खोई हुई 10वीं चीज़ पर अधिक होता है।
मनोवैज्ञानिकों ने इस पर एक प्रयोग किया। एक आलीशान होटल से लगे आलीशान स्विमिंग पूल में दुनिया की सबसे अच्छी किस्म की टाइल्स लगाई गईं। पूल में प्रत्येक चीज़, प्रत्येक सजावट त्रुटिहीन और सुंदर थी। केवल एक स्थान पर एक टाइल को जान-बूझकर नहीं लगाया गया था। आगंतुकों से पूल के विषय में अपने विचार लिखने के लिए कहा गया। आश्चर्य! अधिकांश लोगों ने पूल की सुंदरता की तारीफ़ नहीं की, बल्कि उस छूटी हुई टाइल की शिकायत करते हुए उसे ठीक करने का सुझाव दिया। इसे ही मनोवैज्ञानिकों द्वारा ‘मिसिंग टाइल सिंड्रोम’ नाम दिया गया।
इसे ‘ब्लैक डॉट थ्योरी’ भी कहते हैं; जिसका अर्थ है कि एक बड़े सफ़ेद कागज़ पर अगर एक छोटा-सा काला धब्बा (ब्लैक डॉट) लगा हो, तो ध्यान पूरे बड़े सफ़ेद कागज़ पर न जाकर केवल उस छोटे काले धब्बे पर जाता है।
हममें से अधिकांश लोगों के सोचने का तरीक़ा ऐसा ही होता है। किसी छोटी-सी नकारात्मक या बुरी चीज़ में हम इस तरह उलझ जाते हैं कि जीवन की बहुत-सी अच्छी चीज़ों पर हमारा ध्यान ही नहीं जाता और हम उनका आनंद नहीं ले पाते।
इसी संदर्भ में एक पुरानी कहानी है— एक दिन एक लड़की ने फूलों की एक बेल लगाई। उस फूल की सुंदरता की तारीफ़ सुनकर उसने बड़े उत्साह से वह बेल रोपी थी। लेकिन कई महीने बीत जाने के बाद भी उस बेल पर कोई फूल नहीं खिला। एक दिन वह निराश और गुस्से में आकर उसे काटने के लिए बढ़ी। तभी दीवार के उस तरफ़ रहने वाली उसकी पड़ोसन बाहर आई और इतने सुंदर फूलों के लिए उसका धन्यवाद करने लगी! लड़की को बात समझ नहीं आई। पड़ोसन के कहने पर जब वह दीवार के उस पार गई, तो चौंक गई— उसके द्वारा लगाई गई बेल की टहनियाँ दीवार के उस पार चली गई थीं और उन पर बेहद खूबसूरत फूल खिले हुए थे! कई बार हम भी ‘दीवार के उस पार’ न देख पाने के कारण अपने प्रयासों और जीवन की वास्तविक सुंदरता को नहीं देख पाते।
भगवान महावीर की मूलभूत शिक्षाओं में से एक है— ‘सम्यक् स्मृति’। हम हमेशा कुछ-न-कुछ सोचते-विचारते रहते हैं, लेकिन यह सोच कैसी है, इस पर कभी ध्यान नहीं देते। ‘सम्यक् स्मृति’ सिखाती है कि हम न केवल अपने शारीरिक कार्यों के प्रति, बल्कि अपने मानसिक विचारों के प्रति भी पूरी तरह सजग और सचेत रहें।
शास्त्रों में 17 मानसिक अवस्थाओं को महापाप कहा गया है, क्योंकि यही आगे चलकर शारीरिक दुष्कर्मों का कारण बनती हैं। ये हैं— काम, क्रोध, लोभ, मोह, ईर्ष्या, मान, मद (मान का ही अतिवादी रूप), शोक, चिंता, उद्वेग, भय, अत्यधिक हर्ष, विषाद, असूया (छिद्रान्वेषण के स्वभाव के कारण दूसरों के गुणों में भी दोष निकालना), दैन्य, मात्सर्य (दूसरों के गुणों को स्वीकार न कर पाना) और दंभ।
आयुर्वेद इन्हें मानसिक विकारों की श्रेणी में रखता है और आधुनिक मनोविज्ञान भी इन्हें रोगों का कारण मानता है। वास्तव में, ये सभी स्वाभाविक मानसिक स्थितियाँ हैं; किंतु एक सीमा से अधिक बढ़ने पर ये विकार या रोग का रूप ले लेती हैं। यह सीमा-रेखा इतनी सूक्ष्म होती है कि जब हम विचारों में लीन होते हैं, तो पता ही नहीं चलता कि कब यह रेखा पार हो गई!
ये नकारात्मक विचार हमारे पारिवारिक, सामाजिक और व्यावसायिक जीवन के साथ-साथ स्वयं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत हानिकारक होते हैं। इनसे हम दूसरों को भी दुखी करते हैं और स्वयं भी पीड़ित रहते हैं।
इसलिए, क्यों न हम महावीर के ‘सम्यक् स्मृति’ के महत्त्व को समझें? क्यों न अपनी सोच को एक ऐसी सकारात्मक दिशा दें, जो हमारे और हमारे अपनों के जीवन में सुख-शांति लाए? वास्तव में, ‘सही दिशा में सोचना भी एक कला है’— एक ऐसी कला जो जीवन को खुशियों से भर देती है। तो क्यों न इस कला को हम अपने भीतर विकसित करें!

