विध्वंस से उपजी सफलता और अंतर्द्वंद्व: ओपेनहाइमर और परशुराम

सितंबर, 2023
बबीता झा

हाल के दिनों में एक हॉलीवुड फ़िल्म बहुत चर्चित रही है— ‘ओपेनहाइमर’। आप लोगों ने इसका नाम ज़रूर सुना होगा, भले ही इसे देखा न हो। जिन्होंने नहीं सुना है, उनके लिए बता दूँ कि यह फ़िल्म अमेरिका के एक प्रसिद्ध भौतिक विज्ञानी प्रो. जूलियस रॉबर्ट ओपेनहाइमर के जीवन पर आधारित है।
वे द्वितीय विश्व युद्ध के समय परमाणु बम के निर्माण के लिए आरंभ की गई ‘मैनहट्टन परियोजना’ (Manhattan Project) के वैज्ञानिक निदेशक थे। उनके निर्देशन में ही वह परमाणु बम बना, जिसे जापान पर गिराया गया था; इसीलिए उन्हें ‘परमाणु बम का जनक’ माना जाता है।
ओपेनहाइमर का बचपन से ही सपना एक बड़ा भौतिक विज्ञानी बनने का था। इसके लिए उन्होंने कठिन परिश्रम किया। उनकी मेहनत और प्रतिभा रंग लाई और वे एक महान (किंतु विनाशकारी) आविष्कार करने में सफल रहे। लेकिन इस सफलता ने उन्हें आत्मसंतोष या प्रसन्ना नहीं दी, बल्कि एक गहरा अपराधबोध और अंतर्द्वंद्व दिया। श्रीमद्भगवद्गीता के ये श्लोक उन्हें स्वयं पर लागू होते प्रतीत होने लगे—
“दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद् भासस्तस्य महात्मनः॥” (११:१२)
“कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्तः॥” (११:३२)
अर्थात— “आकाश में हज़ार सूर्यों के एक साथ उदय होने से उत्पन्न जो प्रकाश हो, वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के तेज के सदृश कदाचित् ही हो।” और तत्पश्चात श्रीभगवान् कहते हैं— “मैं लोकों का नाश करने वाला महाकाल हूँ और इस समय इन लोकों का संहार करने में प्रवृत्त हुआ हूँ।”
अब ओपेनहाइमर को लगने लगा कि सामूहिक मृत्यु का ऐसा महाविनाशक साधन बनाकर वे स्वयं मानो ‘काल’ (मृत्यु) बन गए थे और मानवता का संहार कर रहे थे। वे ऐतिहासिक रूप से सफल होकर भी मन से अशांत थे।
ओपेनहाइमर की यह व्यथा सुनकर अनायास ही ऋषि परशुराम का स्मरण हो आता है। यद्यपि दोनों के युग, स्थान, परिस्थिति और कार्य में बहुत अंतर था— परशुराम एक ब्रह्मर्षि के पुत्र थे और उनका जीवन तप व साधना में बीत रहा था। उनके जीवन में निर्णायक मोड़ तब आया, जब एक अहंकारी क्षत्रिय राजा ने उनके निर्दोष पिता (महर्षि जमदग्नि) की निर्दयता से हत्या कर दी। उनके मन में प्रतिशोध की अग्नि प्रज्वलित हो उठी। इस प्रतिशोध के वशीभूत होकर उन्होंने २१ बार अकेले ही क्षत्रिय सत्ता पर आक्रमण किया और हज़ारों-लाखों क्षत्रियों का संहार कर डाला। उन क्षत्रियों के रक्त से उन्होंने कुरुक्षेत्र (जो उस समय ‘स्यमंतक पंचक’ कहलाता था) में सरोवरों का निर्माण किया और अपने पितरों का तर्पण किया। उनके पूर्वज प्रकट हुए और उनसे वरदान माँगने को कहा।
तब परशुराम ने जो वरदान माँगा, वह उनके आंतरिक मनोभावों और मानसिक पीड़ा को दर्शाता है। वह वरदान सिद्ध करता है कि उनमें और ओपेनहाइमर की मनःस्थिति में अधिक अंतर नहीं था— देश-काल की सीमाएँ मिट जाएँ, तो मानव की मौलिक मनोवृत्ति एक जैसी ही होती है! उन्होंने वरदान माँगा— “मैंने जितने भी निर्दोष क्षत्रियों का संहार किया है, मुझे उस पाप से मुक्ति मिले।”
स्पष्ट है कि प्रचंड पराक्रम और शक्ति का परिचय देने वाले परशुराम भी अंदर से व्यथित थे। उनके भीतर भी कहीं-न-कहीं भारी अपराधबोध और अंतःकरण में गहरा पश्चाताप था। क्या यही पश्चाताप और आत्मग्लानि तमाम सफलता के बावजूद ओपेनहाइमर के भीतर नहीं थी?
विनाश और दूसरों के संहार पर टिकी सफलता व्यक्ति की आंतरिक शांति छीन लेती है। दूसरों को कष्ट देकर प्राप्त की गई सफलता के स्वाद में वह मिठास नहीं होती, जो दूसरों के चेहरे पर मुस्कान लाकर मिली सफलता में होती है। शायद सफलता की हमारी प्रचलित परिभाषा ही त्रुटिपूर्ण है, जहाँ हम अपनी ज़िद और महत्त्वाकांक्षा पूरी होने को ही ‘सफलता’ मान बैठते हैं।
वास्तव में, सबके साथ मिलकर खुशी बाँटने में ही सच्ची सफलता और आनंद निहित है। अपने ही भाई या स्वजनों से लड़कर हम भले ही विशाल संपत्ति प्राप्त कर लें, किंतु उसमें वह शांति नहीं होगी, जो उनके साथ प्रेम से बैठकर सूखी रोटी खाने में होती है!

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