सितंबर, 2023
बबीता झा
इस दुनिया में सब कुछ परिवर्तनशील है— केवल एक अटल सत्य को छोड़कर, और वह सत्य है ‘मृत्यु’। मृत्यु अपनी हो या अपनों की, होती यह दुखदायी और भयावह ही है। पर क्या करें? जब यह एक अटल सत्य ही है, तो क्यों न इसका स्वागत उसी सहजता से करें जैसे हम जीवन के आरंभ यानी जन्म का करते हैं!
लेकिन इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि जीवन की शुरुआत अंत की प्रतीक्षा करने के लिए हुई है। जन्म और मृत्यु— दोनों पर ही हमारा कोई नियंत्रण नहीं है; हमारा नियंत्रण केवल उस समय पर है जो इन दोनों के बीच का है। तो क्यों न इस मिले हुए समय को इस तरह जीएँ, जो हमें कुछ सार्थक करने का संतोष और आनंद दे!
जीवन जश्न क्यों है?
कहते हैं— “यह जीवन तो मृत्यु की सौगात है!” अर्थात हमें जो समय मिला है, वह तभी तक हमारा है जब तक मृत्यु इसे हमसे छीन नहीं लेती। यही वह समय है जब हम बहुत कुछ कर सकते हैं— अच्छा या बुरा। जन्म से पहले और मृत्यु के बाद के समय का तो हमें कोई ज्ञान ही नहीं है। तो सौगात में मिले इस समय को—जिसका उपयोग करने की क्षमता हमारे भीतर है—क्यों न एक जश्न के रूप में मनाएँ? और इस जश्न के लिए हम किसी विशेष अवसर की प्रतीक्षा ही क्यों करें?
हम जीवित हैं, जबकि प्रतिदिन न जाने कितने ही लोग इस दुनिया को अलविदा कह रहे हैं। हमारे पास ऐसी अनेक क्षमताएँ हैं जिनका कई अन्य लोगों के पास अभाव है— तो क्या जीवित होना अपने आप में जश्न मनाने का पर्याप्त अवसर नहीं है? हम परीक्षा में सफल होने, नौकरी मिलने, विवाह, व्यापार या कोई संपत्ति खरीदने जैसी छोटी-छोटी उपलब्धियों पर जश्न मनाते हैं; तो उस सबसे बड़ी उपलब्धि— ‘हमारे जीवित होने’— का जश्न क्यों न मनाएँ जिस पर ये तमाम उपलब्धियाँ टिकी हुई हैं?
ज़िंदगी अच्छी है या बुरी, यह गौण है। हो सकता है हम शारीरिक रूप से अस्वस्थ हों, कष्ट में हों, संसाधनों की कमी हो या मानसिक संताप झेल रहे हों; पर फिर भी यदि हम जीवित हैं, तो कुछ-न-कुछ कर सकने की संभावना बनी हुई है। इसीलिए कहा गया है— “जब तक साँस, तब तक आस!”
जश्न मनाएँ कैसे?
पर प्रश्न यह उठता है कि हम जश्न मनाएँ कैसे? हम प्रतिदिन पार्टी या उत्सव तो आयोजित नहीं कर सकते; न ही उतना समय है और न साधन! लेकिन जश्न में ऐसा क्या होता है? उसकी जो विशेषताएँ हैं, क्या उन्हें हम अपने दैनिक जीवन में उतार सकते हैं? वास्तव में, किसी भी जश्न की ये मुख्य विशेषताएँ होती हैं:
1. अपनों का साथ:
कोई भी जश्न अकेले नहीं मनाया जाता; उसमें परिवारजन और मित्रगण एकत्र होते हैं। इसलिए जीवन को जश्न बनाने के लिए इष्ट-मित्रों और परिवार के लिए समय निकालना आवश्यक है। यह किसी विशेष अवसर की औपचारिकता न होकर दैनिक जीवन का एक सहज हिस्सा होना चाहिए।
2. स्वयं को सजाना-संवारना:
जश्न की दूसरी विशेषता यह है कि हम इसमें स्वयं को सँवारकर रखते हैं। हर उम्र का अपना एक अलग सौंदर्य होता है— बच्चों का मासूमियत भरा, युवाओं का जोश भरा, प्रौढ़ों का ज़िम्मेदारी भरा और वृद्धों का गरिमापूर्ण सौंदर्य! शारीरिक बनावट तो हमारे हाथ में नहीं है, इसलिए प्रकृति ने हमें जैसा बनाया है और हमारी जैसी भी आर्थिक स्थिति है, उसके अनुरूप हमेशा स्वयं को स्वच्छ और सुव्यवस्थित रखें। जब हमें लगता है कि हम अच्छे दिख रहे हैं, तो हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है, लोगों से मिलने का मन करता है और जीवन में उत्साह का संचार होता है।
3. परिवेश की सुंदरता:
जश्न में हम केवल स्वयं को ही नहीं, बल्कि अपने घर और आसपास के परिवेश को भी सजाते हैं ताकि वह सुंदर दिखे। आसपास का वातावरण साफ़ और व्यवस्थित हो, तो मन में स्वतः ही सकारात्मकता आती है।
4. सात्विक और सुस्वादु आहार:
जश्न की चौथी विशेषता है कि उस दिन हम अच्छा खाते-पीते हैं। अपने स्वास्थ्य, रुचि और आर्थिक क्षमता का ध्यान रखते हुए यदि हम प्रतिदिन पौष्टिक, ताज़ा और सुस्वादु आहार लें, तो इससे भीतर एक सकारात्मक ऊर्जा प्रवाहित होती है।
यदि कोई खाद्य पदार्थ स्वास्थ्य के लिए बहुत अनुकूल नहीं है, पर हमारी रुचि उसमें है, तो उसका सेवन कभी-कभार ही करें। यदि उम्र के पड़ाव पर डॉक्टर किसी पसंदीदा चीज़ से मना कर दें, तो इससे भी मन में नकारात्मकता न आने दें। सोचें कि इतने वर्षों तक हमने स्वाद का आनंद लिया है और आज भी दुनिया में बहुत से लोग हमसे कठिन स्थिति में हैं।
एक दृष्टांत: मुझे ८४ वर्ष के एक बुजुर्ग की याद आती है, जिन्हें किडनी की समस्या थी। डॉक्टर ने उन्हें कई चीज़ें खाने से मना किया था। वे जब भी किसी को खाते देखते, तो बुदबुदाते थे कि उन्हें ही यह बीमारी क्यों हुई! एक दिन वे एक रेस्तराँ गए और वहाँ भी इसी तरह खिन्न थे। वहीं उनके साथ एक ऐसा युवक बैठा था, जो स्वस्थ होने के बावजूद अपने धार्मिक नियमों के कारण कई स्वादिष्ट चीज़ों का त्याग कर चुका था। चूँकि उसने स्वेच्छा से उन चीज़ों को छोड़ा था, इसलिए उसे कोई अफ़सोस नहीं था। वह बुजुर्ग ८३ वर्षों तक इतने स्वस्थ रहे थे कि अपनी पसंद का खा-पी सके, जबकि आज अनेक लोग ३५-४० की उम्र में ही डायबिटीज़ और बीपी के कारण संयमित जीवन जीने को विवश हैं!
5. रचनात्मक और आनंददायक गतिविधियाँ:
जश्न में तरह-तरह के शारीरिक और मानसिक आयोजन होते हैं— खेलकूद, रंगोली बनाना, नाचना-गाना, अंत्याक्षरी आदि। तो क्यों न हम अपनी दैनिक दिनचर्या में भी अपनी क्षमतानुसार ऐसे आनंददायक कार्यों के अवसर खोजें?
यदि ये पाँच नियम हम अपने जीवन में उतार लें, तो हमें नित्य प्रसन्नता और सकारात्मक ऊर्जा का अनुभव होगा। जब भी अवसर मिले, कहीं घूमने निकल जाएँ, पिकनिक या साथ मिलकर भोजन पकाने का कार्यक्रम रखें, प्रियजनों के साथ बैठें, खेलें और गाएँ।
अकेले पाई गई खुशियाँ अधूरी होती हैं; इसलिए जितनी हो सके खुशियाँ बाँटें और एक-दूसरे का सहयोग करें। जीवन यदि ऐसा हो जाए, तो यकीन मानिए, जीवन स्वयं में एक अनवरत जश्न बन जाएगा— हमें उत्सव मनाने के लिए अलग से अवसर ढूँढ़ना नहीं पड़ेगा!
प्रकृति भी नव-जीवन का उत्सव मानती है
महाभारत में युधिष्ठिर और यक्ष का संवाद अत्यंत प्रसिद्ध है। उनके कई प्रश्नों में से एक प्रश्न यह भी था— “अधिक आयु के क्या लाभ और क्या हानियाँ हैं?”
युधिष्ठिर उत्तर देते हैं— “अधिक आयु का लाभ यह है कि हमें शुभ कर्म करने के लिए अधिक समय मिलता है; किंतु अत्यधिक आयु की हानि यह है कि हमें अपने प्रियजनों को अपने सामने इस दुनिया से जाते हुए देखना पड़ता है और अंततः हम अकेले रह जाते हैं।”
वास्तव में, दुनिया का सबसे बड़ा दुख अपने प्रिय व्यक्ति को अपनी आँखों के सामने इस संसार से विदा होते देखना है। इसीलिए हमारी संस्कृति में “चिरंजीवी भव” और “यशस्वी भव” का आशीर्वाद दिया जाता है। हमारी संस्कृति मूलतः जीवन का उत्सव मनाने की संस्कृति है!
खेतों में नया अन्न आए, प्रकृति गर्मी की झुलसन छोड़कर नए पत्तों का श्रृंगार करे, या शीत की ठिठुरन मिटाकर वसंत का स्वागत करे— इन सबको ‘नव-जीवन’ का संदेश मानकर हम उत्सव मनाते हैं। फिर इस अमूल्य मानव जीवन का जश्न हम क्यों न मनाएँ!
