दिसंबर, 2023
बबीता झा
हाल ही में एक समाचार ने अनेक लोगों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। प्रसिद्ध मोटिवेशनल स्पीकर संदीप माहेश्वरी ने स्वयं एक पोस्ट के माध्यम से साझा किया कि वे वर्ष 2020 के अंतिम दिनों से अवसाद (Depression) से जूझ रहे हैं और इसका चिकित्सीय उपचार ले रहे हैं। इस बात ने लोगों को आश्चर्यचकित कर दिया कि दूसरों को प्रेरणा और दिशा देने वाला व्यक्ति स्वयं कैसे हताश या अवसादग्रस्त हो सकता है, जबकि बाह्य रूप से उनके पास वे सभी सफलताएँ और उपलब्धियाँ हैं जिनका सपना हर साधारण व्यक्ति देखता है।
1. सफलता और मानसिक स्वास्थ्य का भ्रम
इस घटना ने मानसिक स्वास्थ्य से जुड़े कई पुराने विषयों को पुनः चर्चा में ला दिया है। इससे पूर्व प्रसिद्ध अभिनेत्री दीपिका पादुकोण और अभिनेता ऋतिक रोशन सहित कई सफल हस्तियाँ सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार कर चुकी हैं कि वे भी अवसाद के दौर से गुज़र चुके हैं।
इन उदाहरणों से यह स्पष्ट होता है कि:
परिस्थितियों से परे बीमारी: यदि कोई व्यक्ति अवसाद या चिंता (Anxiety) जैसी मानसिक समस्या से पीड़ित है, तो इसका अर्थ यह कदापि नहीं कि वह बाह्य रूप से किसी विपत्ति में है।
इलाज संभव है: यह एक शारीरिक या जैविक असंतुलन (Chemical Imbalance) अथवा मानसिक बीमारी हो सकती है। सही चिकित्सीय परामर्श, उचित उपचार और सुदृढ़ इच्छाशक्ति के बल पर कोई भी व्यक्ति पुनः पूर्णतः स्वस्थ होकर सामान्य जीवन जी सकता है।
युवाओं में बढ़ती हताशा और कोटा का संकट
हाल के वर्षों में राजस्थान के कोटा में प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे अनेक विद्यार्थियों द्वारा की गई आत्महत्याओं ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि जब सब कुछ सामान्य दिख रहा था और सामने एक उज्ज्वल भविष्य था, तब वे कौन-सी परिस्थितियाँ थीं जिन्होंने इन नवयुवकों को ऐसा अत्यंत खौफनाक और अंतिम कदम उठाने पर विवश कर दिया?
अत्यधिक अपेक्षाओं का दबाव, एकाकीपन और असफल होने का भय हमारे युवाओं की मानसिक स्थिति को दीमक की तरह चाट रहा है।
भारत में स्वास्थ्य संकट के चिंताजनक आँकड़े
विभिन्न क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति के बावजूद, यथार्थ का एक दूसरा पहलू यह भी है कि भारत विश्व के उन देशों में अग्रणी है जहाँ अवसादग्रस्त रोगियों और मानसिक तनाव से जूझते युवाओं की संख्या सर्वाधिक है:
युवा आत्महत्याएँ: भारत उन देशों में शामिल है जहाँ युवाओं में आत्महत्या की दर अत्यंत चिंताजनक स्तर पर है।
शारीरिक बीमारियाँ: भारत में हृदय रोगियों और डायबिटीज (मधुमेह) के मरीज़ों की संख्या दुनिया में सबसे अधिक है।
अंग प्रत्यारोपण में प्रतीक्षा: किडनी और आँखों की कॉर्निया के ट्रांसप्लांट के लिए रोगियों को वर्षों तक प्रतीक्षासूची (Waiting list) में रहना पड़ता है।
ये चिंताजनक आँकड़े तब हैं जब आबादी का एक बड़ा हिस्सा अस्पतालों तक पहुँच ही नहीं पाता अथवा उनकी बीमारियों की सही समय पर पहचान (Diagnosis) नहीं हो पाती।
भारत जिस गति से विश्व की एक बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनने की ओर अग्रसर है, उसी गति से शारीरिक और मानसिक रूप से एक बीमार समाज में भी परिवर्तित हो रहा है। चिकित्सा सुविधाओं के विस्तार की तुलना में रोगियों की संख्या कहीं अधिक तीव्र गति से बढ़ रही है।
दैनिक जीवनशैली में बदलाव और मुख्य कारण
विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और देश के विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, हमारी आधुनिक दिनचर्या में आए तीव्र बदलाव ही इस संकट के मूल कारण हैं:
अस्वास्थ्यकर खान-पान: जंक फूड, प्रोसेस्ड आहार और पोषण की कमी।
अत्यधिक स्क्रीन टाइम (Screen Time): मोबाइल, लैपटॉप और टीवी के सामने घंटों बिताना।
गतिहीन जीवन शैली: शारीरिक परिश्रम, खेलकूद और नियमित व्यायाम का अभाव।
डिजिटल तनाव: सोशल मीडिया का अत्यधिक प्रयोग, जिससे अनावश्यक तुलना, नकारात्मक विचार और अवास्तविक अपेक्षाएँ मस्तिष्क पर हावी हो जाती हैं।
पर्यावरण व सामाजिक दबाव: प्रदूषण और निरंतर बना रहने वाला प्रतिस्पर्धी तनाव।
हमारा दायित्व: स्व-स्वास्थ्य से राष्ट्र-निर्माण
ऐसी स्थिति में हम सभी का यह व्यक्तिगत और सामाजिक दायित्व बनता है कि हम अपने शरीर और मस्तिष्क को स्वस्थ रखने का निरंतर प्रयास करें। मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी भ्रांतियों (Taboo) को तोड़कर उस पर खुलकर बात करना और समय पर विशेषज्ञ की मदद लेना अत्यंत आवश्यक है।
हम स्वयं स्वस्थ रहकर ही अपने परिवार, समाज और देश के विकास में सकारात्मक योगदान दे सकते हैं। हमारे शास्त्रों में भी कहा गया है:
“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्”
अर्थात: सभी कर्तव्यों, धर्म और लक्ष्यों की पूर्ति का प्राथमिक साधन यह शरीर ही है।
