दृष्टिकोण, वसंत की अनुभूति और नारी शक्ति

मार्च, 2024
बबीता झा

एक पुरानी कथा है—एक दिन एक कवि मिठाई की दुकान पर बैठकर मिठाई खा रहा था। तभी कहीं से एक कौआ उड़ता हुआ आया और दही की हांडी में चोंच मारकर उड़ने लगा। दुकानदार को अत्यंत क्रोध आ गया और उसने एक पत्थर कौए पर फेंककर मारा। संयोगवश वह पत्थर कौए के सिर पर लगा और उसकी वहीं मृत्यु हो गई। यह देखकर कवि का हृदय करुणा से भर उठा। इसके बाद जब वह पानी पीने कुएँ के पास गया, तो उसने अपनी व्यथा को प्रकट करते हुए कुएँ की दीवार पर कोयले से एक दोहा लिखा:
‘काग दहि पर जान गवायो।’ (अर्थात: कौए ने दही के लोभ में अपनी जान गँवा दी।)
कुछ समय पश्चात वहाँ एक ऐसा युवक आया, जिसकी प्रेमिका ने उसे छोड़ दिया था। वह अत्यंत दुखी था कि जिसके लिए उसने अपना सब कुछ समर्पित किया, वही उसे छोड़कर चली गई। उसकी दृष्टि कुएँ पर लिखी उस पंक्ति पर पड़ी, किंतु उसने शब्दों को अलग ढंग से पढ़ा:
‘का गदही पर जान गवायो!’ (अर्थात: किसी मूर्ख/बेवफ़ा लड़की के लिए अपनी जान गँवाने का क्या औचित्य?)
उसने सोचा कि यह तो उसके लिए ही लिखा गया है, और उसने उस अनुचित विचार को मन से त्याग दिया।
थोड़ी देर बाद वहाँ राजा का एक लेखापाल (क्लर्क) आया। दस्तावेज़ों (कागज़ों) में किसी असावधानी के कारण राजा ने उसे दंडित कर नौकरी से निकाल दिया था। जब उसने वह पंक्ति पढ़ी, तो उसने उसे इस प्रकार समझा:
‘कागद पर ही जान गवायो।’ (अर्थात: कागज़/दस्तावेज़ों के चक्कर में ही जीवन संकट में पड़ गया।)
व्याकरण की दृष्टि से यद्यपि यह कहानी शब्दों के मध्य रिक्त स्थान (Spaces) और चिह्नों के महत्त्व को दर्शाती है, किंतु व्यावहारिक दृष्टि से यह बताती है कि एक ही परिस्थिति या वस्तु को देखने के अनगिनत दृष्टिकोण हो सकते हैं। मनुष्य प्रायः किसी भी घटना या व्यक्ति को अपनी मनःस्थिति और अनुभवों के अनुरूप ही देखता-समझता है।
गोस्वामी तुलसीदास जी के शब्दों में:
“जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत तिन्ह देखि तैसी।”
वास्तव में बाहर दिखने वाली यह दुनिया हमारे आंतरिक मन की ही प्रतिच्छाया (Mirror) है।
यही कारण है कि वसंत के आगमन पर किसी को इसमें नव-जीवन और सृजन का राग दिखाई देता है, किसी को प्रिय के वियोग की कसक और आह अनुभव होती है, किसी को इसमें प्रेम की पुकार सुनाई देती है, तो किसी को कोयल की मधुर तान, और कुछ लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें पता ही नहीं चलता कि वसंत कब आया और कब चला गया!
आधुनिक महानगरों में तो वसंत अब प्रायः गमलों और बालकनी तक ही सीमित होकर रह गया है। कड़कड़ाती ठंड के बाद धूप की गुनगुनी तपिश का आनंद लेने का समय वातानुकूलित (AC) कमरों और कार्यालयों में बैठे लोगों के पास कहाँ है?
फिर भी, कुछ जीवंत लोग गमलों, छतों और सड़कों के किनारे खिले फूलों से वसंत के कुछ आनंददायक क्षण चुरा ही लेते हैं। वे भली-भाँति जानते हैं कि ठिठुरन भरी ठंड के बाद ही यह वसंत आया है। आगे भले ही झुलसाने वाली ग्रीष्म ऋतु हो, किंतु फिर भी अगले वर्ष वसंत के पुनः आगमन को कोई रोक नहीं सकता।
यह एक सुखद संयोग ही है कि जब प्रकृति वसंत के रूप में सृजन और उल्लास का उत्सव मना रही होती है, ठीक उसी समय 8 मार्च को ‘अंतर्राष्ट्रीय नारी दिवस’ भी मनाया जाता है।
वास्तव में, यह सामर्थ्य और चेतना केवल नारी में ही है जो जीवन में एक ऐसा वसंत ला सकती है, जो किसी मौसम या कालखंड का मोहताज नहीं होता। इसी उदात्त भाव को व्यक्त करते हुए छायावाद के महान कवि जयशंकर प्रसाद ‘कामायनी’ में लिखते हैं:
“नारी! तुम केवल श्रद्धा हो,
विश्वास-रजत-नग पगतल में।
पीयूष-स्रोत-सी बहा करो,
जीवन के सुंदर समतल में॥”

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