बबीता झा
सितंबर, 2024
एक समय की बात है, एक व्यापारी का पुत्र अत्यंत कम आयु में ही व्यापार करने हेतु अफ़ग़ानिस्तान चला गया। वहाँ रहते-रहते वह स्वाभाविक रूप से वहीं की भाषा और संस्कृति में ढल गया और धीरे-धीरे अपनी मूल मातृभाषा को भूल गया।
अनेक वर्षों के पश्चात वह अपने परिजनों से मिलने अपने देश लौटा। यहाँ आकर वह अत्यंत बीमार हो गया और शैयाग्रस्त हो गया। एक बार उसे तीव्र प्यास लगी। अत्यधिक शारीरिक दुर्बलता के कारण वह उठने में भी असमर्थ था। वह उपस्थित लोगों से बार-बार ‘आब’ माँगता रहा, किंतु कोई भी समझ नहीं पाया कि उसे क्या चाहिए। माता-पिता, संबंधी और पड़ोसी सब प्रयास करके हार गए, किंतु बालक एक ही रट लगाता रहा—‘आब, आब’। लोग विभिन्न वस्तुएँ लाकर देते, किंतु वह उन्हें अस्वीकार कर देता था। इस प्रकार तड़पते-तड़पते एक दिन उसका देहांत हो गया। परिजन इस बात से व्यथित थे कि वे उसकी अंतिम इच्छा भी पूर्ण न कर सके।
कुछ समय पश्चात गाँव में काबुल से एक व्यापारी आया। लोगों ने जब उससे ‘आब’ शब्द का अर्थ पूछा, तब ज्ञात हुआ कि फ़ारसी/दरी भाषा में इसका अर्थ ‘पानी’ होता है। तभी से यह कहावत प्रचलित हो गई:
“काबुल गए मुग़ल बनि आए, भूले अपनी बानी।
आब-आब कर पूता मर गए, खटिया के नीचे पानी।।”
यह लोककथा चाहे सत्य हो या कल्पना, किंतु यह एक गहरा सत्य उजागर करती है कि भाषा केवल व्याकरण या पुस्तकों का संग्रह नहीं है, बल्कि यह एक ऐसा पात्र है जिसमें किसी क्षेत्र की संस्कृति, इतिहास, भूगोल और अर्थव्यवस्था समाहित होती है।
अनूठा सौंदर्य: हर भाषा के अपने विशिष्ट शब्द, मुहावरे, सूक्तियाँ और हास्य-व्यंग्य होते हैं, जिन्हें केवल उसी भाषा में सर्वोत्तम रूप से अभिव्यक्त किया जा सकता है।
मानवीय उपलब्धि का कोष: मानव सभ्यता ने अपनी विकास यात्रा में जो कुछ भी ज्ञान-विज्ञान अर्जित किया है, वह भाषा में ही सुरक्षित रहता है।
संकेत बनाम भाषा: पशु-पक्षी भी अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति (इशारों या ध्वनियों से) कर लेते हैं, किंतु ज्ञान और अनुभूतियों को पीढ़ियों तक सँजोकर रखना केवल मानव भाषा के माध्यम से ही संभव है।
भाषा जीवित समाज का प्रतीक है, अतः वह स्वयं भी जीवंत और गतिमान होती है। समय के साथ नवीन शब्दों का समावेश और अन्य भाषाओं से आदान-प्रदान भाषा को समृद्ध बनाता है; अन्यथा बहते जल के स्थान पर ठहरा हुआ जल जैसे दूषित हो जाता है, वैसे ही भाषा भी स्थिर होकर कालवाह्य हो जाती है।
वर्तमान डिजिटल युग में संस्कृतियों के अति-मिश्रण और वैश्वीकरण के कारण अनेक भाषाएँ, बोलियाँ और लिपियाँ तेज़ी से सिमटती जा रही हैं। यद्यपि भाषाओं का क्रमिक रूपांतरण एक स्वाभाविक ऐतिहासिक प्रक्रिया है—जैसे कीलाक्षर (Cuneiform), खरोष्ठी, प्राकृत, पालि आदि लिपियाँ और भाषाएँ, जो कभी साहित्य व प्रशासन का मुख्य माध्यम थीं, कालक्रम में हाशिये पर चली गईं और उनका स्थान अन्य भाषाओं ने ले लिया—किंतु वर्तमान में यह गति अत्यंत चिंताजनक है।
एक चिंताजनक रिपोर्ट: एक वैश्विक अध्ययन के अनुसार, विश्व भर में लगभग 5,000 से 7,000 भाषाएँ हैं।
संकट ग्रस्त भाषाएँ: इनमें से लगभग 3,500 भाषाएँ विलुप्त होने के कगार पर हैं।
भाषाओं का संकुचन: विश्व की लगभग 70% जनसंख्या केवल 23 मुख्य भाषाएँ ही बोलती है।
जब कोई भाषा विलुप्त होती है, तो उसका स्थान कोई अन्य सुगम भाषा तो ले लेती है, किंतु उस भाषा के साथ सदियों का अनुभवजन्य ज्ञान, परंपराएँ और लोक-संस्कृति हमेशा के लिए लुप्त हो जाते हैं।
भौगोलिक ज्ञान का लोप: भारत जैसे मानसून पर आधारित कृषि प्रधान देश में ‘घाघ और भड्डरी’ की कहावतों में निहित मौसम व कृषि का ज्ञान, क्या किसी मरुस्थलीय या बर्फीले क्षेत्र की भाषा समझ पाएगी?
सांस्कृतिक प्रभाव: भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज में ‘गो’ (गाय) का क्या महत्त्व रहा है, यह ‘गोत्र’, ‘गोष्ठी’, ‘गोहन’, ‘गोचर’ जैसे अनगिनत शब्दों से परिलक्षित होता है।
संबंधों की सूक्ष्मता: ‘मासी’ (माँ जैसी), ‘मामा’, ‘पितृ’, ‘पितामह’ जैसे विस्तृत पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता को संयुक्त परिवारों में रहने वाली संस्कृतियाँ ही समझ सकती हैं।
मुहावरों और अभिव्यक्तियों का अनुवाद असंभव: ‘सावन का अंधा’, ‘वैशाख का नंदन (गधा)’, ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ जैसे देशज मुहावरों और ‘चल बसना’, ‘जा बसना’, ‘चाल चलना’, ‘अवकाश ग्रहण करना’ जैसे वाक्यांशों का मूल सौंदर्य और भाव किसी भी अन्य भाषा के अनुवाद में नहीं लाया जा सकता।
आधुनिक हिंदी के पितामह भारतेंदु हरिश्चंद्र ने जब लिखा था:
“निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिनु निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल।।”
तो उनका संकेत स्पष्ट था कि अपनी समस्याओं का मौलिक विचार और स्थायी समाधान केवल अपनी मातृभाषा में ही संभव है, क्योंकि अपनी भाषा के साथ हमारी पीढ़ियों का ज्ञान, विज्ञान और जीवन-अनुभव हमारे साथ संबल बनकर खड़ा होता है।

