मार्च, 2025

हिन्दी साहित्यकार एवं स्वतंत्र पत्रकार
‘है ठान लिया हमने
सूरज सा जलना है।
सपनों को दो परवाज़
अगर उड़ने की तमन्ना है।’
जब भी मैं इस गीत की पंक्तियां सुनती हूं तो मुझमें एक नयी ऊर्जा शक्ति का संचार होता है और उन समस्त नारी शक्ति के प्रसन्नता से भरे हुए चेहरे मेरे स्मृति पटल पर उभर आते हैं, जिन्होंने अपनी क्षमताओं और दृढ़ निश्चय के बल पर एक ऊंचा मुकाम हासिल किया है।
वर्तमान समय में अगर हम अपने आस-पास के वातावरण पर दृष्टिपात करें तो पायेंगे कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में महिलाएं सफलता के नित नये कीर्तिमान रच रही हैं।
शिक्षा, साहित्य, कला, व्यापार, प्रबंधन, प्रशासन, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, रक्षा, राजनीति, स्वास्थ्य, वित्त और वाणिज्य, खेल, पर्यावरण संरक्षण, सैन्य सेवा, पुलिस सेवा, फिल्म और मनोरंजन, फैशन और वस्त्र उद्योग, परिवार और समाज आदि सभी क्षेत्रों में अपनी सूझबूझ और कौशल के द्वारा वे आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक विकास में अपना महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
राजनीति के क्षेत्र में महिलाएं
आज़ भी अपनी समृद्ध सांस्कृतिक परम्पराओं का पोषण और संरक्षण करते हुए भारतीय महिलाएं नारी सशक्तिकरण की एक अद्भुत मिसाल प्रस्तुत कर रही हैं। राजनीति के क्षेत्र में आज़ हमारे देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद पर एक आदिवासी महिला श्रीमती द्रौपदी मुर्मू विराजमान हैं।
इससे पहले श्रीमती प्रतिभा देवीसिंह पाटिल ने राष्ट्रपति पद संभाला था। हमारे देश की वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण वर्तमान में शक्तिशाली और चर्चित राजनेता हैं। फोर्ब्स की 100 सबसे सशक्त महिलाओं की सूची में लगातार चार वर्षों से उनका नाम आ रहा है। वे सर्वकालिक वित्त मंत्री हैं और इससे पहले उन्होंने रक्षा मंत्रालय का कार्यभार भी संभाला है।
इसी कड़ी में पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी, उत्तर-प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित और सुषमा स्वराज, राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया, तमिलनाडु की पूर्व मुख्यमंत्री जे जयललिता, जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, मध्य प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री उमा भारती, गुजरात की पूर्व मुख्यमंत्री आनंदीबेन पटेल, दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी के नाम उल्लेखनीय हैं। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रियंका गांधी का नाम भी इसमें शामिल है।
अभी-अभी दिल्ली की मुख्यमंत्री बनीं श्रीमती रेखा गुप्ता स्त्री सशक्तीकरण का जीता-जागता उदाहरण हैं।
महिला उद्यमी
आज़ भारतीय महिलाएं अपने स्टार्ट अप्स के माध्यम से हजारों करोड़ टर्न ओवर की कंपनियों की मालिक बन रही हैं। वर्तमान बिजनेस रियलिटी टीवी शो ‘शार्क टैंक इंडिया’ की जज और निवेशक नमिता थापर और विनीता सिंह इसका जीता-जागता उदाहरण हैं।
नमिता एमक्योर फार्मास्यूटिकल कंपनी की कार्यकारी निदेशक हैं। विनीता सिंह शुगर कॉस्मेटिक्स की सह संस्थापक और सीईओ हैं। अगर हम कुछ प्रमुख भारतीय महिला उद्यमियों की बात करें तो किरण मजूमदार शॉ, वंदना लूथरा, फाल्गुनी नायर, ऋचा कर, प्रांशु पाटनी, सूची मुखर्जी, वाणी कोला, उपासना टाकू और शायरी चहल के नाम उल्लेखनीय हैं। इन सबने अपनी व्यावसायिक प्रतिभा का उत्कृष्ट उदाहरण प्रस्तुत किया है।
खेलों के क्षेत्र में रिकॉर्ड सफलता
खेल के बारे में बात करें तो पिछले कुछ वर्षों में भारतीय महिला खिलाड़ियों ने अपनी योग्यता के बल पर ओलंपिक खेलों तक में अपनी सफलता के झण्डे गाड़े हैं। कर्णम मल्लेश्वरी, पी. टी. उषा, सानिया मिर्जा, एम. सी. मैरीकॉम, सैखोम मीराबाई चानू, गीता फोगाट, साक्षी मलिक, सायना नेहवाल, पी वी सिंधु, हरमनप्रीत कौर, मनु भाकर ने अपनी योग्यता के बल पर देश का नाम रोशन किया है।
फिर भी इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना बाकी है क्योंकि जब तक महिलाओं के प्रति सामाजिक सोच और स्थितियां नहीं बदलेगी, तब तक उनका सम्पूर्ण विकास नहीं हो पायेगा।
नारी मुक्ति आन्दोलन की भूमिका
स्त्रीवाद, नारीवाद या अंग्रेजी में कहूं तो फैमिनिज्म, भले ही आज़ लोगों को क्रांतिकारी नारे लगते हों लेकिन पूर्व के इतिहास में यह स्त्रियों के शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ एक क्रांतिकारी आह्वान रहा है।
इसे समझने के लिए सिर्फ नारी मुक्ति आन्दोलन को समझना ही काफी नहीं है वरन् सदियों से पुरुष सत्ता से प्रताड़ित उन सभी महिलाओं की अन्तर्वेदना को, सिसकियों को, घुटन और पग-पग पर होने वाले अपमान को महसूस करना जरूरी है, जो धर्म, शास्त्र और सामाजिक वर्जनाओं के नाम पर स्त्रियों पर थोपी जाती रही हैं। इतना ही नहीं, आज़ भी ये वर्जनाएं, ये पाबंदियां अधिकांश आधी आबादी पर लागू हैं।
ग्लोबलाइजेशन के इस युग में हम एक ही तरह की दुनिया में कई अलग-अलग तरह की दुनिया देखते हैं। एक तरफ हैं उच्च शिक्षित आधुनिक नौकरीपेशा और व्यवसायी महिलाएं और दूसरी तरफ हैं हमारी अशिक्षित गरीब और मजदूर बहनें। आज़ शिक्षित महिलाएं मंगल मिशन से जुड़ रही हैं, अंतरिक्ष में जा रही हैं और हम सब जानते हैं कि चंद्रयान-3 की दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक लैंडिंग में इसरो की महिला वैज्ञानिकों का महत्वपूर्ण योगदान रहा है।
आज़ महिलाएं बहुराष्ट्रीय कंपनियों की सीईओ हैं, विकसित देशों की चांसलर और प्रधानमंत्री हैं तो दूसरी ओर घूंघट और बुर्के में रहने वाली स्त्रियों की भी एक अपनी अलग दुनिया है। जहाँ पर आज़ भी उनके भाग्य का फैसला खाप पंचायतें और मौलवी तय करते हैं। वे आज़ भी तालिबानी फरमानों के साये में घुट-घुटकर जी रही हैं।
आज़ भी एक आम भारतीय महिला की स्थिति एक घरेलू नौकरानी से बेहतर नहीं है। उस पर भी विडम्बना यह है कि उसके इस श्रम की कोई कीमत नहीं है। सिर्फ रोटी, कपड़ा और मकान मिल जाए, वही बहुत है। अगर वह बाहर काम करके चार पैसे कमाकर लाती है तो वह भी उसका शराबी पति उससे छीन लेता है। और तो और अधिकांश शिक्षित कामकाजी महिलाओं को भी अपनी तनख्वाह स्वेच्छा से खर्च करने का अधिकार नहीं है।
आज़ भी शिक्षित और आत्मनिर्भर महिलाएं शोषण और उत्पीड़न का शिकार होती हैं, लेकिन जहां उनका मानसिक और बौद्धिक उत्पीड़न ज्यादा होता है, वहीं पर अशिक्षित महिलाओं का शारीरिक और आर्थिक उत्पीड़न ज्यादा देखने को मिलता है।
महानगरों में कामकाजी महिलाओं की अपनी समस्याएं हैं। उन्हें घर और बाहर दोनों जगह दोहरी जिम्मेदारी निभानी पड़ती है। इसका बुनियादी कारण यह है कि महिलाएं तो हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं लेकिन पुरुषों की मानसिकता उस स्तर तक नहीं बदली है।
आज़ भी एक पति अपनी पत्नी को अपने से ऊंची पोस्ट पर देखकर खुश होने की जगह इसे अपने अहम् से जोड़ता है और समय-समय पर तानों की बौछार करके पत्नी को प्रताड़ित करने से नहीं चूकता। अगर एक पुरुष अपने कार्यालय से देरी से घर आता है तो उससे कोई सवाल नहीं किया जाता, वहीं अगर एक स्त्री अपने कार्यालय में काम की अधिकता के कारण घर देरी से पहुंचती है तो उससे सौ सवाल किए जाते हैं। और तो और बिना किसी प्रमाण के उसके घरवाले उसके चरित्र पर लांछन लगाने से भी नहीं चूकते।
बेटे के घर आने पर आज़ भी एक मां यही कहती है कि वह ऑफिस से थका हुआ आया है, उसे चाय बनाकर दो लेकिन बहू के लिए कोई ऐसा नहीं कहता। उसे तो घर आते ही सीधे रसोई में झोंक दिया जाता है और फरमाइशों की लम्बी फेहरिस्त पकड़ा दी जाती है। ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जो आज़ भी महिलाओं और पुरुषों में भेद उत्पन्न करते हैं।
यूं तो स्त्री स्वतंत्रता और शक्ति के आख्यान हमारे प्राचीन ग्रंथों और वेदों में भी खूब मिलते हैं। ऋग्वेद के वाक् सूक्त में देवी विषयक मान्यताओं और गाथाओं में स्त्री की स्थिति और उसकी शक्ति का उद्घोष सुन सकते हैं। लेकिन इस विषय पर विमर्श द्वितीय विश्व युद्ध के पश्चात् पश्चिमी जगत में ही शुरू हुआ। उसके बाद ही स्त्रीवाद ने धीरे-धीरे अपना आकार ग्रहण करना शुरू किया।
नारीवाद की एक मूलभूत धारणा यह है कि स्त्री पैदा नहीं होती अपितु बनाई जाती है। समाज, परम्पराएं, धर्म शास्त्र सब मिलकर उसका निर्माण करते हैं और यहीं से उसका बुनियादी संघर्ष प्रारम्भ होता है।
पारम्परिक मान्यताएं आज़ भी उसे सहज ढंग से आगे बढ़ने नहीं देती। आज़ भी उसे अपने लिए स्वयं निर्णय लेने का अधिकार नहीं है। उसके कदम-कदम पर आज़ भी सामाजिक मान्यताओं और परम्पराओं की बेड़ियां डालकर उसके विकास के मार्ग को अवरूद्ध किया जाता है।
परन्तु अब उसने इन सबको दरकिनार करके उड़ना सीख लिया है। उसके सपनों का दायरा अब घर-परिवार से आगे बढ़कर खुले आसमान में पंख पसार रहा है।
लेकिन ये अभी शुरुआत है, विकास की इस यात्रा में अभी उसे और आगे बढ़ना है। अभी उसे उन्मुक्त आकाश में और ऊंची उड़ान भरनी है। इसके लिए शायर ने सही कहा है-
“मंजिलें उन्हीं को मिलती हैं,
जिनके सपनों में जान होती है
पंखों से कुछ नहीं होता
हौसलों से उड़ान होती है।।”
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